सरकारी आदेश: भगदड़ के 285 वीडियो हटाने का फैसला—क्या यह सेंसरशिप है?

Subhash Shekhar
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हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा लिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय के तहत भारतीय रेल मंत्रालय ने 285 सोशल मीडिया लिंक्स हटाने का निर्देश दिया है। सरकार का कहना है कि ये वीडियो कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन सकते हैं, लेकिन यह फैसला कई सवाल खड़े करता है।

खबरों पर बढ़ती सेंसरशिप का मुद्दा

मीडिया के सीमित होने और समाचारों के स्वरूप में बदलाव पर पत्रकार रविश कुमार ने चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि मुख्यधारा की मीडिया में अब जनता की असल समस्याएं कम दिखाई देती हैं। ऐसे में आम नागरिक ही वीडियो बनाकर घटनाओं की सच्चाई उजागर कर रहे हैं, लेकिन सरकार इसे रोकने के लिए नए-नए नियम लागू कर रही है।

क्या सोशल मीडिया वीडियो वाकई खतरनाक हैं?

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, रेलवे ने ट्विटर (अब X) को नोटिस भेजकर 285 वीडियो हटाने के निर्देश दिए। कारण बताया गया कि ये “नैतिक मानकों” का उल्लंघन करते हैं और “कानून-व्यवस्था के लिए खतरा” बन सकते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर ये वीडियो वास्तव में अवैध हैं, तो सरकार को सार्वजनिक रूप से यह दिखाना चाहिए कि इनमें ऐसा क्या है जो नियमों के खिलाफ है।

भगदड़ के वीडियो पर रोक—क्या जनता को सच्चाई से वंचित किया जा रहा है?

बीते दिनों दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ की एक बड़ी घटना हुई थी। वहां मौजूद आम लोगों ने अपने कैमरों से इस भयावह स्थिति को रिकॉर्ड किया और सोशल मीडिया पर साझा किया। लेकिन सरकार अब इन वीडियो को हटवा रही है। क्या यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है ताकि प्रशासन की अक्षमता उजागर न हो?

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मीडिया की चुप्पी और विपक्ष की नई भूमिका

रविश कुमार का मानना है कि मुख्यधारा के समाचार चैनल और अखबार सरकार के पक्ष में काम कर रहे हैं, जिससे विपक्ष को खुद पत्रकारिता करनी पड़ रही है। राहुल गांधी जैसे नेता आम जनता से मिलकर उनके मुद्दों को वीडियो के माध्यम से उजागर कर रहे हैं। जब मीडिया अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएगा, तो जनता और विपक्ष को ही इस भूमिका में आना पड़ेगा।

सेंसरशिप के इस दौर में जनता क्या करे?

सरकार सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। अगर कोई दुर्घटना होती है और लोग अपने कैमरों से सच्चाई रिकॉर्ड करते हैं, तो उन्हें गलत ठहराया जाता है। एफआईआर दर्ज होती हैं, नोटिस भेजे जाते हैं और वीडियो हटवाए जाते हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो आने वाले समय में सच्चाई को उजागर करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

निष्कर्ष: क्या यह लोकतंत्र के लिए खतरा है?

अगर 285 वीडियो हटाए जा सकते हैं, तो कल हजारों वीडियो गायब किए जा सकते हैं। यह सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। जनता को सतर्क रहना होगा और सरकार से जवाब मांगना होगा कि आखिर इन वीडियो में ऐसा क्या था जिसे हटाने की जरूरत पड़ी? क्या यह सच को छिपाने की कोशिश नहीं है?

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सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।
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