Ranchi | झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी रांची का बेड़ो इलाका एक बार फिर इतिहास रचने जा रहा है। आदिवासियों की पौराणिक स्व-शासन व्यवस्था और अखंड एकता का प्रतीक ‘बेड़ो पड़हा जतरा महोत्सव’ इस साल अपनी स्थापना के गौरवशाली 60 वर्ष पूरे कर रहा है।
इस ऐतिहासिक हीरक जयंती (Diamond Jubilee) महोत्सव का भव्य आयोजन आगामी 3 जून को बेड़ो बाजार टांड़ में दोपहर 12:00 बजे से होने जा रहा है। इस बार के सांस्कृतिक महाकुंभ में राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होकर आदिवासी अस्मिता के इस उत्सव को और भव्य बनाएंगे।
अदम्य साहस और दमन के खिलाफ लड़ाई की गवाह रही बेड़ो की यह पावन धरा इस बार 60 वर्षों की साझी विरासत को समेटे नजर आएगी। आयोजन समिति के मुताबिक, इस हीरक जयंती वर्ष को लेकर पूरे छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासी समाज में अभूतपूर्व उत्साह देखा जा रहा है।
1968 का वह ऐतिहासिक विद्रोह: जब बंदूक की गोलियों पर भारी पड़ा था आदिवासियों का साहस
बेड़ो पड़हा जतरा महोत्सव का इतिहास सिर्फ नाच-गाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अन्याय और ब्रिटिश काल जैसी दमनकारी नीतियों के खिलाफ आदिवासियों के अदम्य साहस की जीती-जागती मिसाल है। मैदान से मिली जानकारी के मुताबिक, इस महोत्सव की नींव 3 जून 1967 को पड़ी थी, जब जननेता स्व. करमचंद भगत पहली बार विधायक चुने गए थे। उनकी इस ऐतिहासिक जीत की खुशी में पड़हा राजाओं ने अपने पारंपरिक प्रतीकों के साथ एक विजय जुलूस निकाला था।
लेकिन असली परीक्षा अगले ही साल 1968 में हुई। चाला जनजाति संस्था के सचिव और स्व. करमचंद भगत के सुपुत्र डॉ. रविन्द्र नाथ भगत ने भावुक होते हुए बताया:
“2 जून 1968 को चीरी गांव में एक आदिवासी महिला के सम्मान की रक्षा के लिए हुए आंदोलन पर पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी थी, जिसमें 6 आदिवासी युवा शहीद हो गए थे। तत्कालीन प्रशासन ने डरकर पूरे रांची में धारा 144 लगा दी और 3 जून के बेड़ो जतरा पर रोक लगा दी। लेकिन मेरे पिता स्व. करमचंद भगत ने उस दमनकारी आदेश को चुनौती देते हुए धारा 144 तोड़ी और हजारों पड़हा राजाओं के साथ मिलकर पारंपरिक हथियारों, हाथी-घोड़ों और गाजे-बाजे के साथ मेले का सफल आयोजन किया। प्रशासन को आदिवासियों के साहस के आगे झुकना पड़ा था।”

परंपरा का जीवंत रूप: PESA एक्ट और पाँचवीं अनुसूची का असली आधार
यह महोत्सव केवल एक मेला नहीं, बल्कि उरांव जनजाति की पौराणिक स्व-शासन ‘पड़हा व्यवस्था’ का साक्षात प्रमाण है। जानकारों की मानें तो यही व्यवस्था भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची, पंचायती राज और पेसा कानून (PESA Act) का मुख्य वैधानिक आधार रही है।
अतीत में जब खेती का सीजन खत्म होने के बाद आजीविका के लिए लोग पलायन कर जाते थे, तब यह ‘जतरा’ उनके घर वापसी और अपनों से जुड़ने का सबसे मजबूत जरिया बनता था।
आस्था और संस्कृति के अनोखे प्रतीक
- लकड़ी के हाथी और घोड़े: जतरा में शामिल होने वाले विशालकाय लकड़ी के हाथी-घोड़े महज खिलौने या प्रदर्शन की वस्तु नहीं हैं।
- रम्पा-चम्पा: ये गांवों के आराध्य देवताओं के जीवंत प्रतीक माने जाते हैं, जिनकी महोत्सव के दौरान पूरे विधि-विधान से पारंपरिक पूजा-अर्चना की जाती है।
पद्मश्री मुकुंद नायक और मधु मंसूरी बिखेरेंगे सुरों का जादू
इस बार का सांस्कृतिक महासंगम बेहद खास होने वाला है। हीरक जयंती के इस विशेष पड़ाव पर झारखंड के दो महान संगीत पुरोधा—पद्मश्री मुकुंद नायक और पद्मश्री मधु मंसूरी जी एक ही मंच पर अपने कंठ से पारंपरिक लोक गीतों की गंगा बहाएंगे। इसके साथ ही धमाकेदार नागपुरी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होगा, जो युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक को थिरकने पर मजबूर कर देगा।
ग्राउंड रिपोर्ट: बेड़ो बाजार टांड़ में युद्ध स्तर पर चल रही हैं तैयारियां
ग्राउंड जीरो से मिली रिपोर्ट के अनुसार, बेड़ो बाजार टांड़ में इन दिनों उत्सव जैसा माहौल है। क्षेत्र के 21 पड़हा के राजा महादेव उराँव, 22 पड़हा के दीवान अमृता मुंडा और 10 पड़हा के राजा रोहित उरांव समेत दर्जनों गांवों के पारंपरिक अगुआ (पाहन, महतो और मुंडा) खुद बैठकर तैयारियों की कमान संभाल रहे हैं। आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. मंगा उराँव और संयोजक गोयन्दा उराँव ने संयुक्त रूप से समस्त पड़हा प्रेमियों से एक विशेष अपील की है।
“सभी पड़हा प्रेमी अपनी पारंपरिक वेशभूषा में हजारों की संख्या में गाजा-बाजा, निशान, रम्पा-चम्पा, छाता, झंडा, ढोल और नगाड़ों के साथ बेड़ो बाजार टांड़ पहुंचें। यह हमारी 60 वर्षों की साझी विरासत और अखंड एकता को दुनिया के सामने दिखाने का समय है।”
निष्कर्ष और आगे की राह (What Next)
बेड़ो पड़हा जतरा महोत्सव के 60 वर्ष पूरे होना इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में भी झारखंड के आदिवासी समाज ने अपनी जड़ों, अपनी स्व-शासन व्यवस्था और अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी में इस मंच से आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन और सांस्कृतिक अधिकारों को लेकर कोई बड़ा संदेश या घोषणा निकलकर सामने आ सकती है। जिला प्रशासन ने भी सुरक्षा और ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर पुख्ता इंतजाम किए हैं। अब देखना यह होगा कि 3 जून को जब संस्कृति का यह महाकुंभ सजेगा, तो बदलते दौर में यह नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से जोड़ने में कितना कामयाब रहता है।











