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प्रणव झा के नाम पर लोग बोले ‘लोकल जाये तेल लेने’.. खेला होना तय है

Ranchi | झारखंड की सियासत में उस वक्त अचानक हड़कंप मच गया, जब कांग्रेस ने आगामी राज्यसभा चुनाव 2026 के लिए अपने सबसे बड़े और गुप्त चेहरे के नाम का एलान कर दिया। दिल्ली से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) द्वारा जारी आधिकारिक सूची के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेहद करीबी और संकटमोचक माने जाने वाले प्रणव झा को झारखंड से प्रत्याशी बनाया गया है।

इस घोषणा के बाद से ही दोनों राज्यों के राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर एक नई जंग छिड़ गई है। विधानसभा के भीतर और बाहर जोड़-तोड़ का गणित अब बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच चुका है।

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गठबंधन सरकार में शामिल दल जहां इस फैसले को आलाकमान की सोची-समझी रणनीति बता रहे हैं, वहीं सोशल मीडिया पर ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ और ‘खेला होने’ के दावों के साथ तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। आइए जानते हैं कि इस एक नाम ने झारखंड और बिहार की राजनीति का तापमान अचानक क्यों बढ़ा दिया है।

खड़गे के ‘सिपहसालार’ पर दांव: दिल्ली की पसंद, झारखंड में परीक्षा

प्रणव झा कोई आम राजनीतिक चेहरा नहीं हैं। वे कांग्रेस के केंद्रीय संगठन में एक बेहद कद्दावर और प्रभावशाली रणनीतिकार माने जाते हैं। वर्तमान में वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यालय में बतौर AICC कोऑर्डिनेटर (समन्वयक) काम कर रहे हैं। इससे पहले वे लंबे समय तक AICC के संचार विभाग (Communication Department) में सेक्रेटरी इंचार्ज भी रह चुके हैं।

पार्टी के भीतर चर्चा है कि राहुल गांधी और खड़गे की कोर टीम के इस अहम सदस्य को संसद भेजने के लिए कांग्रेस ने इस बार झारखंड की जमीन को चुना है। राजनीति में आने से पहले एक लंबा कॉर्पोरेट और मीडिया मैनेजमेंट का शानदार सफर तय करने वाले प्रणव झा को पार्टी का ‘थिंक टैंक’ माना जाता है।

“रांची के सियासी हलकों में इस बात की सुगबुगाहट तेज है कि केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई को पूरी तरह भरोसे में लिए बिना ही इस नाम को फाइनल किया है, जिससे प्रदेश के कुछ स्थानीय नेताओं के भीतर दबी जुबान में असंतोष पनप रहा है।”

सोशल मीडिया पर ‘खेला होने’ का दावा और स्थानीयता पर गुस्सा

प्रणव झा का नाम सामने आते ही सोशल मीडिया मंच एक्स (ट्विटर) पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है। वरिष्ठ पत्रकार कुणाल सिंह (@Ibn7Kunal) ने एक्स पर तंज कसते हुए लिखा, “Congress ने प्रणव झा को झारखंड से राज्य सभा का टिकट दिया… अब तो खेला होना तय है..Local जाए तेल लेने।” यह ट्वीट साफ दर्शाता है कि झारखंड के कोटे से बाहरी चेहरों को तरजीह दिए जाने पर पत्रकारों और स्थानीय हलकों में कितनी नाराजगी है।

“पत्रकार से राजनेता तक का सफर”: जमीनी यादों से मिली बधाई

वहीं दूसरी ओर, प्रणव झा के पुराने साथी और राजनीति से जुड़े लोग उनके संघर्ष के दिनों को याद कर भावुक भी हैं। 2014 लोकसभा चुनाव के पूर्व प्रत्याशी और विश्लेषक राजीव रंजन (@YuvasochRajeev) ने उनके शुरुआती दिनों को याद करते हुए एक लंबा पोस्ट लिखा:

“मुझे आज भी याद है जब मैं अपने पत्रकारिता काल के दौरान कांग्रेस पार्टी कवर करता था तो शुरू-शुरू में प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक इंसान को देखता जो बिज़ रंग का हाफ शर्ट, रस्ट रेड की पैंट पहने आधी काली आधी पकी हुई दाढ़ी में अगली पंक्ति में बैठा हुआ है… परिचय हुआ तो नाम जाना प्रणव झा।”

उन्होंने आगे लिखा कि एक साधारण परिवार से आने वाले व्यक्ति, जो पहले पत्रकार थे और फिर कांग्रेस से जुड़कर काम किया, उन्हें राहुल गांधी और पार्टी ने राज्यसभा उम्मीदवार बनाकर जमीनी कार्यकर्ताओं का सम्मान किया है।

मिथिलांचल में जश्न: “माटी के लाल” को मिला सम्मान

चूंकि प्रणव झा मूल रूप से बिहार के मधुबनी जिले (मिथिला क्षेत्र) के रहने वाले हैं, इसलिए बिहार के सियासी गलियारों में भी इसे लेकर भारी उत्साह है। सोशल मीडिया पर सोनू मिश्रा (@SonyMis08883138) जैसे कांग्रेस समर्थकों ने मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ प्रणव झा की तस्वीर साझा करते हुए उन्हें “मिथिलांचल का बेटा” बताया और झारखंड से राज्यसभा प्रत्याशी बनने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दीं।

क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) देगी खुला समर्थन?

राज्यसभा चुनाव पूरी तरह से विधानसभा के संख्या बल और गणित का खेल है। झारखंड की मौजूदा स्थिति में कांग्रेस अपने अकेले के दम पर अपने प्रत्याशी को संसद नहीं भेज सकती। उसे हर हाल में अपने सबसे बड़े सहयोगी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के एकमुश्त वोटों की जरूरत होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली में हेमंत सोरेन और मल्लिकार्जुन खड़गे के बीच हुए उच्च स्तरीय समझौते के बाद ही इस सीट पर कांग्रेस ने अपना दावा ठोका है। ऐसे में गठबंधन धर्म को निभाते हुए झामुमो (JMM) और राजद (RJD) का समर्थन मिलना तय माना जा रहा है। लेकिन सोशल मीडिया पर ‘लोकल बनाम बाहरी’ की जो बहस छिड़ी है, वह वोटिंग के दिन कुछ बड़ा ‘खेला’ भी करा सकती है।

संपत्ति और साख की लड़ाई

प्रणव झा की पहचान हमेशा से एक बेदाग और बौद्धिक नेता के रूप में रही है। चूंकि उन्होंने इससे पहले कभी कोई प्रत्यक्ष लोकसभा या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा है, इसलिए उनकी संपत्तियों का सटीक लेखा-जोखा अभी सामने नहीं आया है। रांची में नामांकन दाखिल करने के दौरान वे भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के समक्ष जो आधिकारिक चुनावी हलफनामा (Affidavit) जमा करेंगे, उसके बाद ही उनकी चल-अचल संपत्ति, बैंक बैलेंस और निवेश की वास्तविक तस्वीर साफ हो पाएगी।

कांग्रेस आलाकमान ने सूची जारी कर अपना काम कर दिया है, लेकिन सोशल मीडिया पर फूटा यह गुस्सा अब रांची की जमीन पर क्या गुल खिलाएगा, यह देखने वाली बात होगी। गठबंधन के रणनीतिकारों का अगला कदम विधानसभा के भीतर असंतुष्ट स्थानीय विधायकों को साधना और विपक्ष की किसी भी संभावित सेंधमारी को रोकना होगा। यदि झामुमो अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल रहती है, तो प्रणव झा की संसद की राह आसान हो जाएगी, वरना झारखंड की राजनीति में एक बार फिर ‘खेला’ होना तय है।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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