सिलीगुड़ी/कूचबिहार | पश्चिम बंगाल में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) कार्यक्रम को लेकर राज्य के कुछ हिस्सों में गहरा तनाव व्याप्त है। इस प्रक्रिया से जुड़े कथित मानसिक दबाव के चलते दो अलग-अलग घटनाओं में दो व्यक्तियों की मौत की खबर सामने आई है। कूचबिहार और सिलीगुड़ी में हुई इन मौतों ने स्थानीय निवासियों के बीच डर और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। परिजनों का सीधा आरोप है कि मतदाता सूची सत्यापन की जटिल प्रक्रिया और नागरिकता से जुड़े डर ने उनकी जान ले लिया।
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सिलीगुड़ी घटना: सुनसान क्वार्टर में मिला मोहम्मद खादेम का शव
सिलीगुड़ी के पास चूनाभट्टी क्षेत्र में मंगलवार को उस वक्त सनसनी फैल गई, जब 57 वर्षीय मोहम्मद खादेम का शव संदिग्ध परिस्थितियों में बरामद हुआ। पुलिस सूत्रों के अनुसार, उनका शव फूलबारी इलाके में स्थित एक सुनसान और खाली पड़े पुलिस क्वार्टर के पास मिला।
मृतक के परिवार ने पुलिस और प्रशासन के सामने चौंकाने वाले दावे किए हैं। परिजनों के मुताबिक, मोहम्मद खादेम पिछले कुछ दिनों से बेहद परेशान थे। इसका मुख्य कारण एसआईआर (SIR) की सुनवाई थी। बताया जा रहा है कि खादेम का नाम 2002 की मतदाता सूची में नहीं था, जिसके चलते उन्हें सत्यापन (Verification) के लिए नोटिस भेजा गया था और सुनवाई में शामिल होना पड़ा था।
सुनवाई के बाद से थे गहरे सदमे में
मोहम्मद खादेम के परिवार के एक सदस्य ने मीडिया को बताया, “जब से उन्हें एसआईआर की सुनवाई के लिए बुलाया गया, वे काफी डरे हुए थे। 2002 की लिस्ट में नाम न होने के कारण उन्हें लग रहा था कि उनका नाम वोटर लिस्ट से कट जाएगा या उन्हें नागरिकता संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इसी मानसिक तनाव (Mental Stress) के चलते उन्होंने यह आत्मघाती कदम उठाया या उनकी जान गई।”
कूचबिहार: दिल का दौरा पड़ने से मालिन रॉय की मौत
तनाव की दूसरी घटना कूचबिहार जिले के बोरो हल्दीबारी इलाके से सामने आई है। यहां 55 वर्षीय मालिन रॉय की मौत का कारण भी कथित तौर पर एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ा तनाव बताया जा रहा है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, मालिन रॉय भी अपने दस्तावेजों और वोटर लिस्ट में नाम के सत्यापन को लेकर चिंतित थे। इसी चिंता के बीच उन्हें अचानक दिल का दौरा (Cardiac Arrest) पड़ा। आनन-फानन में उन्हें जलपाईगुड़ी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मालिन रॉय के परिजनों का भी यही कहना है कि एसआईआर प्रक्रिया को लेकर वे अत्यधिक भयभीत थे, जो उनकी मौत का कारण बना।
पुलिस और प्रशासन की प्रतिक्रिया
इन घटनाओं के बाद प्रशासनिक खेमे में भी हलचल तेज हो गई है। सिलीगुड़ी में मोहम्मद खादेम की मौत के मामले में पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज व अस्पताल भेज दिया है।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “हमने अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज किया है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है ताकि मौत के सही कारणों का चिकित्सकीय प्रमाण मिल सके। हम इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि क्या वाकई किसी तरह का बाहरी दबाव या मानसिक प्रताड़ना थी।”
महापौर गौतम देब ने की मुलाकात
मामले की गंभीरता को देखते हुए सिलीगुड़ी के महापौर गौतम देब (Mayor Gautam Deb) ने तुरंत संवेदनशीलता दिखाई। उन्होंने चूनाभट्टी जाकर पीड़ित परिवार से मुलाकात की। महापौर ने परिवार को ढाढ़स बंधाया और प्रशासन की तरफ से हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। हालांकि, उन्होंने अभी मौत के कारणों पर कोई आधिकारिक राजनीतिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उनकी यह यात्रा मामले की गंभीरता को दर्शाती है।
क्या है SIR और क्यों है लोगों में इतना डर?
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) अभियान चलाया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची में कोई फर्जी नाम न हो और सभी वैध नागरिकों का नाम शामिल हो।
हालांकि, हाल के वर्षों में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी (NRC) को लेकर मचे राजनीतिक घमासान के कारण आम लोगों, विशेषकर सीमावर्ती जिलों के निवासियों में दस्तावेजों को लेकर एक अजीब सा डर बैठ गया है।
मुख्य चिंताएं:
- पुरानी मतदाता सूचियों (जैसे 2002 या 1971) में नाम न मिलना।
- दस्तावेजों में नाम की स्पेलिंग में मामूली गलती होना।
- सुनवाई (Hearing) के दौरान अधिकारियों के सामने पेश होने का डर।
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी प्रक्रिया को आम जनता तक सरल भाषा में न समझा पाने के कारण अफवाहें फैलती हैं, जो जानलेवा तनाव का रूप ले लेती हैं।
आम जनता पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव
लगातार हो रही इन मौतों ने एसआईआर प्रक्रिया के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर एक नई बहस छेड़ दी है। कूचबिहार और सिलीगुड़ी जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में लोग यह सोचने पर मजबूर हैं कि अगर पुराने दस्तावेजों में कोई कमी रह गई, तो उनका भविष्य क्या होगा।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन को केवल नोटिस भेजने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि लोगों को यह समझाने के लिए जागरूकता अभियान चलाना चाहिए कि यह केवल एक रूटीन प्रक्रिया है, नागरिकता छीनने की साजिश नहीं।
फिलहाल, पुलिस की विस्तृत जांच रिपोर्ट का इंतजार है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि मोहम्मद खादेम की मौत आत्महत्या थी या सामान्य मृत्यु। वहीं, प्रशासन पर यह दबाव बढ़ रहा है कि एसआईआर की प्रक्रिया को अधिक मानवीय और सरल बनाया जाए।
यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग इन घटनाओं का संज्ञान लेते हुए क्या कदम उठाते हैं, ताकि भविष्य में किसी और व्यक्ति को दस्तावेजों के डर से अपनी जान न गंवानी पड़े।
मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन जब यह प्रक्रिया आम आदमी के लिए ‘जीवन और मरण’ का प्रश्न बन जाए, तो सिस्टम को पुनर्विचार की आवश्यकता होती है। मालिन रॉय और मोहम्मद खादेम की मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासनिक सख्ती के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का भी ध्यान रखा जा रहा है या नहीं।










