“गजनी-लोदी लुटेरे नहीं, हिंदुस्तानी थे…” पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान पर छिड़ा महासंग्राम, क्या इतिहास बदलने की हो रही कोशिश?

"गजनी-लोदी लुटेरे नहीं, हिंदुस्तानी थे..." पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान पर छिड़ा महासंग्राम, क्या इतिहास बदलने की हो रही कोशिश?

Aligarh | पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी एक बार फिर अपने बयानों के चलते विवादों के केंद्र में हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक ताजा वीडियो इंटरव्यू में अंसारी ने इतिहास की प्रचलित धारणाओं को चुनौती देते हुए महमूद गजनी और लोदी जैसे आक्रमणकारियों को ‘विदेशी’ मानने से इनकार कर दिया है। उनके इस दावे ने न केवल इतिहासकारों बल्कि आम जनता और राजनीतिक गलियारों में भी एक नई बहस छेड़ दी है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह हकीकत है या महज एक खास नैरेटिव सेट करने की कोशिश?

इतिहास पर सवाल: आखिर हामिद अंसारी ने ऐसा क्या कह दिया?

इंटरव्यू की शुरुआत भारत और ईरान के ऐतिहासिक रिश्तों से हुई थी, लेकिन देखते ही देखते यह चर्चा सल्तनत काल के आक्रमणकारियों पर टिक गई। हामिद अंसारी ने तर्क दिया कि जिन्हें हम किताबों में ‘विदेशी लुटेरा’ पढ़ते आए हैं, वे वास्तव में ‘हिंदुस्तानी लुटेरे’ थे।

उनका कहना है कि उस दौर में हिंदुस्तान की सल्तनत आधे अफगानिस्तान तक फैली हुई थी, इसलिए उन्हें विदेशी कहना गलत है। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिरों को तोड़ने की घटनाएं महज एक ‘राजनैतिक नजरिया’ हैं। इस बयान के बाद इंटरनेट पर यूजर्स का गुस्सा फूट पड़ा है।

एएमयू से लेकर सोशल मीडिया तक ‘अग्निपरीक्षा’

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के पूर्व कुलपति रहे हामिद अंसारी के इस बयान पर सोशल मीडिया वॉर छिड़ गई है। प्रख्यात टीवी पत्रकारों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने उनके ‘इतिहास बोध’ पर कड़े प्रहार किए हैं।

  • नेहरू कोटे का तंज: वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि 1961 में आईएफएस (IFS) बने अंसारी का इतिहास बोध नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ से प्रभावित लगता है।
  • तुलना पर विवाद: कुछ यूजर्स ने तो उनकी तुलना उनके चचेरे भाई और बाहुबली मुख्तार अंसारी तक से कर दी है, जिससे मामला और भी ज्यादा गरमा गया है।

क्या कहता है इतिहास? दावों की असलियत

इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि महमूद गजनी का मूल स्थान ‘गजनी’ (वर्तमान अफगानिस्तान) था और उसका उद्देश्य भारत की संपदा को लूटकर अपनी मध्य एशियाई सल्तनत को मजबूत करना था। सोमनाथ मंदिर पर हमले को इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिना जाता है। ऐसे में उन्हें ‘हिंदुस्तानी’ कहना कई लोगों को गले नहीं उतर रहा है।

आम आदमी पर असर: क्यों जरूरी है यह खबर?

यह सिर्फ एक बयान नहीं है, बल्कि उस शिक्षा व्यवस्था पर प्रहार है जिसे करोड़ों भारतीयों ने स्कूल में पढ़ा है। अगर एक पूर्व उपराष्ट्रपति स्तर का व्यक्ति इतिहास की नई व्याख्या करता है, तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ी की सोच और देश के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है।

हामिद अंसारी के इस बयान पर अभी तक किसी बड़े राजनैतिक दल की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन सोशल मीडिया पर ‘बहिष्कार’ और ‘विरोध’ का दौर शुरू हो चुका है। आने वाले दिनों में यह विवाद संसद से लेकर सड़क तक देखने को मिल सकता है। क्या इतिहास को वर्तमान की राजनीति के चश्मे से देखना सही है? यह सवाल अब हर भारतीय के जेहन में है।

Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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