Ranchi | राजधानी रांची के प्रतिष्ठित सैंफोर्ड मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल (Samford Hospital Ranchi) में पिछले कुछ दिनों से चल रहा हाई-वोल्टेज ड्रामा अब एक नया मोड़ ले चुका है। एक तरफ मरीज के परिजनों और ‘संपूर्ण संकट मोचन फाउंडेशन’ ने अस्पताल पर इलाज के नाम पर लूट और बाउंसरों से मारपीट का सनसनीखेज आरोप लगाया है। वहीं दूसरी तरफ, मामले के 48 घंटे बाद अस्पताल प्रबंधन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन आरोपों को पूरी तरह भ्रामक बताया है।
अस्पताल का दावा है कि मरीज का इलाज ‘कैशलेस’ (Cashless) था, तो फिर 12 लाख की लूट कैसे हुई? Local Khabar की इस ग्राउंड रिपोर्ट में जानिए दोनों पक्षों के दावे और इस पूरे विवाद की असली इनसाइड स्टोरी।
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
- मरीज की स्थिति: सरोज देवी (55 वर्ष) को 5 जून को गंभीर हालत (मल्टी-ऑर्गन फेलियर) में गांधीनगर अस्पताल से सैंफोर्ड रेफर किया गया था।
- परिजनों का आरोप: 12 दिन के अंदर करीब 12 लाख रुपये का ‘एप्रोक्स’ (Approx) बिल थमाया गया और छुट्टी मांगने पर बाउंसरों ने महिलाओं से मारपीट की।
- अस्पताल का पलटवार: मरीज के पति CMPDI में कार्यरत हैं, इसलिए इलाज पूरी तरह ‘कैशलेस’ था। परिजनों से एक भी रुपया नहीं लिया गया।
- NGO पर FIR: अस्पताल का आरोप है कि NGO प्रमुख अमीषा प्रसाद ने 50 लोगों की भीड़ के साथ ओपीडी और आईसीयू में हंगामा किया, जिससे एक अन्य मरीज की जान चली गई।
परिजनों और NGO के गंभीर आरोप
परिजनों और संपूर्ण संकट मोचन फाउंडेशन की डायरेक्टर अमीषा प्रसाद का आरोप है कि अस्पताल ने इलाज के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की और मरीज को बेवजह वेंटिलेटर पर रखा।
- मेडिकल लूट और धमकी: परिजनों का कहना है कि जब उन्होंने 12 लाख का एस्टीमेट बिल देखकर मरीज को डिस्चार्ज करने की गुहार लगाई, तो डराने के लिए मरीज का वेंटिलेटर मास्क हटा दिया गया और बाउंसरों से मरवाने की धमकी दी गई।
- महिलाओं से बदसलूकी: एनजीओ का आरोप है कि जब वे लोग मरीज के समर्थन में वहां पहुंचे, तो अस्पताल के स्टाफ और बाउंसरों ने महिलाओं को लिफ्ट में घसीटा, उनके कपड़े फाड़े और बीच-बचाव करने आए पुरुषों को लहूलुहान कर दिया।
- पुलिस पर सवाल: पीड़ितों का यह भी आरोप है कि वहां मौजूद पुलिस ने अस्पताल प्रबंधन पर कार्रवाई करने के बजाय, न्याय मांग रही महिलाओं को ही जेल भेजने की धमकी दी।
सैंफोर्ड अस्पताल का ‘कैशलेस’ दांव और पलटवार
हंगामे के 48 घंटे बाद सैंफोर्ड अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. घनश्याम सिंह, सुपरिटेंडेंट डॉ. शरीन खंडेरकर और आईसीयू इंचार्ज डॉ. राव ने मीडिया के सामने आकर एनजीओ के दावों की हवा निकाल दी।
- इलाज पूरी तरह FREE था: डॉ. राव ने स्पष्ट किया कि कोल इंडिया (CMPDI) के साथ अस्पताल का टाई-अप है। बिल सीधे कंपनी को भेजा जाना था, परिजनों से न तो कोई पैसा मांगा गया और न ही लिया गया। 11 लाख रुपये सिर्फ एक ‘अनुमानित’ (Estimated) बिल था, जबकि फाइनल बिल 8 लाख के करीब बना।
- अस्पताल में तोड़फोड़: मैनेजमेंट का दावा है कि 17 जून को अमीषा प्रसाद के नेतृत्व में 30-50 लोगों की भीड़ ने अस्पताल को 3 घंटे तक बंधक बनाए रखा। उन्होंने सीटी स्कैन और एमआरआई रोक दिए, गमले तोड़े और लेडी डॉक्टरों के साथ बदतमीजी की।
- हंगामे से गई एक जान! अस्पताल ने सबसे गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इस हंगामे के कारण अस्पताल की एंबुलेंस सेवा बाधित हुई। एंबुलेंस 1 घंटा लेट पहुंची, जिसके कारण एक अन्य क्रिटिकल मरीज की मौत हो गई। अस्पताल ने पूछा है कि क्या इस मौत की जिम्मेदारी वह NGO लेगा?
इस पूरे विवाद में अब दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ पुलिस में FIR दर्ज करा दी है। एक तरफ गरीब मरीजों के साथ प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी का मुद्दा है, तो दूसरी तरफ ‘फ्री इलाज’ के बावजूद अस्पताल में राजनीतिक चमकाने के लिए की गई गुंडागर्दी का आरोप है।
रांची पुलिस अब अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज (CCTV Footage) खंगाल रही है, जिसके बाद ही साफ हो पाएगा कि आखिर 12 लाख के इस ‘खूनी’ ड्रामे में पहला पत्थर किसने फेंका।
आपकी राय: क्या प्राइवेट अस्पतालों में बाउंसरों का होना जायज है? या फिर एनजीओ द्वारा अस्पताल परिसर में हंगामा करना सही था? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं और ऐसी ही निष्पक्ष खबरों के लिए जुड़े रहें Local Khabar के साथ।











