रांची: आरआरडीए और रांची नगर निगम में भवन नक्शा स्वीकृति में देरी और वसूली के आरोपों को लेकर दायर जनहित याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई। कोर्ट के स्वत: संज्ञान मामले में रांची नगर निगम ने विस्तृत शपथ पत्र दायर कर अपनी कार्यप्रणाली की पूरी जानकारी दी। निगम ने अदालत को बताया कि भवन नक्शा अनुमोदन की प्रक्रिया अब पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल माध्यम से की जा रही है।
बीपीएएमएस सिस्टम से अब तक 2529 आवेदन हुए प्रोसेस
नगर निगम ने अपने शपथ-पत्र में कहा कि 3 जुलाई 2023 से अब तक बीपीएएमएस (Building Plan Approval Management System) के माध्यम से कुल 2529 भवन नक्शा आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से 2068 भवन नक्शा प्लान को सफलतापूर्वक स्वीकृत किया जा चुका है।
सिर्फ 461 आवेदन ही लंबित हैं, जिनमें तकनीकी त्रुटियां या दस्तावेजों की कमी पाई गई है। निगम ने कहा कि इन लंबित आवेदनों में भी सुधार की प्रक्रिया जारी है और आवेदकों को आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा गया है।
30 दिनों से अधिक लंबित नहीं रहता कोई भी आवेदन
रांची नगर निगम ने हाईकोर्ट को यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के निर्धारित फॉर्मेट के तहत ऑनलाइन बिल्डिंग प्लान अप्रूवल मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से ही सभी नक्शा स्वीकृत किए जा रहे हैं।
निगम ने बताया कि—
- किसी भी भवन योजना आवेदन को 30 दिनों तक किसी भी टेबल पर लंबित नहीं रखा जाता।
- पूरे सिस्टम को पारदर्शी एवं भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने के लिए डिजिटल प्रक्रिया लागू की गई है।
- भवन नक्शा स्वीकृत करने की गति पहले की तुलना में काफी तेज हुई है।
कोर्ट ने नगर निगम की रिपोर्ट पर जताया संतोष
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने निगम की रिपोर्ट और कार्यप्रणाली से संतुष्ट होकर सुनवाई को समाप्त कर दिया। अदालत ने माना कि रांची नगर निगम भवन नक्शा स्वीकृति प्रक्रिया को सुधारने और डिजिटल करने की दिशा में प्रभावी कदम उठा रहा है।
सुनवाई के दौरान रांची नगर निगम की ओर से अधिवक्ता एलसीएन सहदेव ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता शाहबाज़ अख्तर उपस्थित रहे।
क्या है पूरा मामला?
आरआरडीए और रांची नगर निगम में भवन नक्शा पास कराने में देरी, मनमानी और अवैध वसूली के आरोपों को लेकर यह मुद्दा अदालत की निगाह में आया था। मामले को स्वत: संज्ञान में लेते हुए हाईकोर्ट ने निगम से पारदर्शिता एवं कार्यप्रणाली पर जवाब मांगा था।
निगम द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों, डिजिटल सिस्टम और स्वीकृति प्रक्रिया की रिपोर्ट के बाद कोर्ट ने जनहित याचिका को निष्पादित कर दिया।








