रांची | झारखंड की राजधानी रांची से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो टूटते हुए रिश्तों के बीच उम्मीद की नई किरण जगाती है। एक साल का अलगाव, अदालती चक्कर और तलाक की कगार पर खड़ा एक परिवार आज फिर से एक हो गया। 5 साल की मासूम बेटी, जो अब तक माता-पिता के झगड़े के बीच नानी के घर रहने को मजबूर थी, अब अपने पिता के कंधे और मां के आंचल की छांव में वापस लौटेगी।
जिला विधिक सेवा प्राधिकार (DLSA), रांची के मध्यस्थता केंद्र में बुधवार को वह भावुक पल देखने को मिला जब एक पति-पत्नी ने अपने सारे पुराने विवादों को भुलाकर एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। अधिवक्ता मध्यस्थ नीलम शेखर की सूझबूझ और दोनों पक्षों के वकीलों के अथक प्रयासों ने एक घर को पूरी तरह तबाह होने से बचा लिया।
दहेज केस से तलाक तक: कैसे उलझ गया था रिश्ता?
पूरा मामला वाद संख्या O.M. 574/2025 से जुड़ा है। पति-पत्नी पिछले एक साल से अलग रह रहे थे। तल्खी इतनी बढ़ गई थी कि बात पुलिस और कोर्ट तक पहुंच गई। पत्नी ने पति के खिलाफ रांची की अदालत में धारा 498A (दहेज प्रताड़ना) का केस (No. 38911/2025) दर्ज कराया था। वहीं, जवाब में पति ने भी बिहार के आरा स्थित कोर्ट में तलाक (Divorce Case) का मुकदमा ठोक दिया था।
इन दोनों की 5 साल की बेटी अपनी मां के साथ नानी घर में रह रही थी। कानूनी दांव-पेंच के बीच इस मासूम का भविष्य दांव पर लगा था, लेकिन मध्यस्थता केंद्र में हुई सिर्फ दो बैठकों ने सब कुछ बदल कर रख दिया।
मध्यस्थता की मेज पर खुली दिल की गांठें
मामले को सुलझाने की जिम्मेदारी अधिवक्ता मध्यस्थ श्रीमती नीलम शेखर को सौंपी गई थी। इस दौरान दोनों पक्षों के अधिवक्ता अपराजिता मिश्रा और प्रकाश रंजन ने भी सकारात्मक भूमिका निभाई।
- गहन बातचीत: मध्यस्थता केंद्र में हुई बैठकों के दौरान दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठाकर उनकी शिकायतों को गहराई से सुना गया।
- बेटी का भविष्य: काउंसलिंग के दौरान जब 5 साल की बेटी के भविष्य का जिक्र आया, तो दोनों माता-पिता भावुक हो गए।
- स्वेच्छा से समझौता: लंबी बातचीत के बाद वादी और प्रतिवादी ने स्वेच्छा से फैसला किया कि वे अब पुरानी बातों को पीछे छोड़ देंगे और दोबारा कभी कलह नहीं करेंगे।
समझौते के बाद अब क्या होगा?
इस समझौते के साथ ही दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ दर्ज सभी केस वापस लेने की सहमति जताई है। अब पति-पत्नी एक साथ मिलकर रहेंगे और अपनी बेटी के भविष्य को संवारेंगे।
एक्सपर्ट कमेंट: “कानूनी लड़ाई में अक्सर जीत किसी की नहीं होती, नुकसान सिर्फ बच्चों और शांति का होता है। रांची DLSA की यह पहल साबित करती है कि अगर संवाद सही दिशा में हो, तो कोर्ट के बाहर भी बड़े से बड़े विवाद सुलझाए जा सकते हैं।”
आम आदमी के लिए सबक: क्यों जरूरी है मध्यस्थता?
आज के दौर में जहां अदालतों में सालों-साल केस चलते हैं, वहां DLSA (जिला विधिक सेवा प्राधिकार) एक वरदान साबित हो रहा है।
- पैसों की बचत: कोर्ट कचहरी के भारी खर्च से मुक्ति।
- समय की बचत: सालों चलने वाला केस महज दो-तीन बैठकों में खत्म।
- मानसिक शांति: आपसी रजामंदी से होने वाले फैसले में कोई पक्ष हारता नहीं, दोनों की जीत होती है।
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