भूमिका: अस्तित्व और अस्मिता की दहलीज पर झारखंड

झारखंड में इस समय परिसीमन (Delimitation) की तलवार लटक रही है। यह सिर्फ एक प्रशासनिक, गणितीय या तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर झारखंड के मूल निवासियों—आदिवासियों—के अस्तित्व, उनकी राजनीतिक पहचान और जल-जंगल-जमीन पर उनके दावों पर एक सोची-समझी चोट है।
संविधान निर्माताओं ने जिस झारखंड की कल्पना की थी, आज वह प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की वेदी पर बलि चढ़ने को तैयार है। राज्य के 13 पूर्ण जिले और 2 आंशिक जिले पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) के अंतर्गत अनुच्छेद 244 के दायरे में आते हैं। ये क्षेत्र संविधान सभा के समय से ही आदिवासी बहुल रहे हैं, जिनकी सुरक्षा, विशिष्ट पहचान और सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए देश के संविधान ने विशेष प्रावधान किए थे। लेकिन आज इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें, तो यह संरक्षण सिर्फ कागजों तक ही सीमित नजर आता है।
पांचवीं अनुसूची और राज्यपालों की रहस्यमयी चुप्पी
संविधान के तहत पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों के राज्यपालों को असाधारण और स्वायत्त शक्तियां दी गई थीं। यह कोई सामान्य प्रशासनिक पद नहीं था, बल्कि आदिवासियों के हितों के लिए एक ‘संवैधानिक संरक्षक’ (Constitutional Guardian) की भूमिका थी।
राज्यपाल के मुख्य संवैधानिक दायित्व थे:
- बाहरी आबादी पर नियंत्रण: अनुसूचित क्षेत्रों में बाहरी आबादी के अनियंत्रित और अवैध बसाव को रोकना।
- भूमि हस्तांतरण पर अंकुश: आदिवासियों की जमीन को गैर-आदिवासियों के हाथों में जाने से रोकने के लिए कड़े नियम (जैसे CNT और SPT एक्ट) का कड़ाई से पालन कराना।
- स्थानीय संस्कृति का संरक्षण: जनजातीय समाज की भाषा, संस्कृति, परंपराओं और उनके पारंपरिक ज्ञान को अक्षुण्ण बनाए रखना।
संवैधानिक विफलता का कड़वा सच: 1950 से लेकर 2026 तक का लंबा समय बीत चुका है। इस दौरान चाहे एकीकृत बिहार का दौर रहा हो या साल 2000 के बाद बना अलग झारखंड राज्य, राजभवन में बैठने वाले हर राज्यपाल ने इस गंभीर मुद्दे पर रहस्यमयी चुप्पी साधे रखी। किसी भी राज्यपाल ने अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए न तो कोई ऐतिहासिक अधिसूचना जारी की, न कोई कड़ा विनियम बनाया और न ही केंद्र सरकार या राष्ट्रपति को यहां की जमीनी हकीकत से रूबरू कराने वाली कोई वास्तविक रिपोर्ट भेजी। नतीजा यह हुआ कि रक्षक ही भक्षक की नीति का मूकदर्शक बन गया।
विकास के नाम पर विस्थापन और अनियंत्रित डेमोग्राफिक चेंज
जब रक्षक मौन हो, तो लुटेरों के हौसले बुलंद हो ही जाते हैं। राज्यपालों की इसी निष्क्रियता का परिणाम यह हुआ कि अनुच्छेद 244 के तहत आने वाले संरक्षित इलाकों में डेमोग्राफिक चेंज (Demographic Change – जनसांख्यिकीय बदलाव) का एक भयानक, अनियंत्रित और विनाशकारी सिलसिला शुरू हो गया।
झारखंड का आदिवासी समाज आजादी के बाद से ही दोहरे-तीहरे शोषण का शिकार होता रहा है। जिसे मुख्यधारा का मीडिया और सरकारें ‘विकास’ और ‘औद्योगिकीकरण’ कहती हैं, वह वास्तव में आदिवासियों के लिए तबाही का पैगाम लेकर आया। बड़े-बड़े कारखानों, खदानों और बांधों ने आदिवासियों को उनकी ही पैतृक जमीन से बेदखल कर दिया।
विस्थापन के तीन काले कालखंड:
| कालखंड | विकास परियोजनाएं | आदिवासी समाज पर प्रभाव |
| 1950-60 का दशक | बड़े बांध (Dams), रेलवे नेटवर्क, सड़कों का निर्माण | लाखों आदिवासियों का पहली बार बड़े पैमाने पर विस्थापन। |
| 1970-80 का दशक | कोयला, लोहा, यूरेनियम और बॉक्साइट की भारी खदानें | उपजाऊ जमीनों का अधिग्रहण, पारंपरिक आजीविका का विनाश। |
| 1990 के बाद | उदारीकरण (Liberalization) और निजी कॉर्पोरेट नीतियां | निजी कंपनियों को खुली छूट, आदिवासियों का जबरन पलायन। |
इस चौतरफा विस्थापन का सीधा असर यह हुआ कि स्थानीय आदिवासी रोजगार, रोटी और सम्मान की तलाश में असम के चाय बागानों, दिल्ली-मुंबई के महानगरों या अन्य राज्यों में बंधुआ मजदूरी करने के लिए मजबूर हो गए। दूसरी ओर, उनकी खाली हुई जमीन और रोजगार के अवसरों पर कब्जा करने के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों से आए मजदूर, ठेकेदार, व्यापारी और नौकरशाह आकर बसते गए। आज सरकारी आंकड़ों में भी ST (अनुसूचित जनजाति) आबादी का प्रतिशत लगातार घटता साफ दिखाई दे रहा है। इसके साथ ही आदिवासियों की भाषा, संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराएं विलुप्त होने की कगार पर हैं।
परिसीमन 2026: “करे कोई, भरे कोई” का अन्याय
अब बात करते हैं उस तात्कालिक संकट की, जो इस समय आदिवासियों के सिर पर मंडरा रहा है—परिसीमन 2026। वर्तमान व्यवस्था के तहत झारखंड में 5 लोकसभा सीटें और 28 विधानसभा सीटें आदिवासियों (ST) के लिए आरक्षित हैं। नए परिसीमन में राज्य की कुल विधानसभा सीटें (वर्तमान में 81) को बढ़ाकर बढ़ाने की बात की जा रही है, लेकिन समस्या यह है कि इसमें आदिवासी आरक्षित सीटों का अनुपात नहीं बढ़ाया जा रहा है। बल्कि, कई क्षेत्रों में आदिवासियों की सीटें घटने की प्रबल आशंका है।
यह न्याय के किस सिद्धांत के तहत सही ठहराया जा सकता है?
- दोष किसका, सजा किसे? जब संवैधानिक नियमों की धज्जियां उड़ने से रोकने की जिम्मेदारी राजभवन, राष्ट्रपति भवन और केंद्र सरकारों की थी, तो उनकी इस ऐतिहासिक विफलता और आपराधिक लापरवाही की कीमत आदिवासी समाज अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी खोकर क्यों चुकाए?
- अवैध को वैध बनाने का खेल: शासन-प्रशासन की मिलीभगत और निष्क्रियता ने जिस बाहरी आबादी को यहां ‘वैध’ नागरिक और वोटर बनने दिया, अब उसी बदली हुई जनसांख्यिकी (ST जनसंख्या प्रतिशत कम होने) को आधार बनाकर आदिवासियों का हक छीना जा रहा है। यह “करे कोई, भरे कोई” की नीति नहीं तो और क्या है? पहले आदिवासियों के संसाधन छीने गए, फिर उनकी जमीन छीनी गई, और अब उसी छीने जाने को आधार बनाकर उनकी राजनीतिक आवाज को दबाया जा रहा है।
कॉर्पोरेट-राजनीतिक गठजोड़ और कागजी शेर बनता संविधान
संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर पांचवीं अनुसूची का निर्माण किया था ताकि यह आदिवासियों के लिए एक सुरक्षा कवच (Shield) का काम कर सके। लेकिन राजनीति और कॉर्पोरेट जगत के नापाक गठजोड़ ने इसे एक ‘कागजी शेर’ बनाकर रख दिया।
साल 2000 में जब लंबे संघर्ष और शहादत के बाद झारखंड अलग राज्य बना, तब राज्य के आदिवासियों को लगा था कि अब उनके दिन बदलेंगे। लेकिन चाहे आईएएस (IAS) पृष्ठभूमि से आए राज्यपाल रहे हों या राजनीतिक नियुक्तियों के जरिए आए नेता—सबने केंद्र के इशारों पर काम किया। खनन लॉबी और वोट बैंक की गंदी राजनीति के सामने आदिवासियों के हितों को बेरहमी से कुचल दिया गया।
सत्ता से तीखे सवाल: क्या कभी राष्ट्रपति भवन ने राज्यपालों से उनकी सालाना रिपोर्ट पर कड़े सवाल किए? क्या कभी देश की संसद में झारखंड के इस जनसांख्यिकीय बदलाव और आदिवासियों के विस्थापन पर कोई गंभीर बहस हुई? क्या केंद्र सरकारों ने कभी पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में बाहरी बसावट को लेकर कोई निष्पक्ष सर्वे कराया? इन सबका जवाब एक ही है—नहीं। सब चुप रहे, क्योंकि तथाकथित राष्ट्रीय विकास और मुनाफे के लिए आदिवासियों की बलि चढ़ाना सबसे आसान और सस्ता सौदा था।
आदिवासी समाज की 5 सूत्रीय निर्णायक मांगें
झारखंड का आदिवासी समाज अब जाग चुका है। वह परिसीमन की इस प्रक्रिया को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगा। परिसीमन तभी और उसी शर्त पर स्वीकार्य होगा, जब आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्यायों की भरपाई की जाएगी। इस संबंध में हमारी निम्नलिखित स्पष्ट और न्यायसंगत मांगें हैं:
- 1951 या 1971 की जनगणना को बनाया जाए आधार: वर्तमान एसटी जनसंख्या प्रतिशत के बजाय पुराने आंकड़ों के आधार पर ही सीटों का आरक्षण तय हो। क्योंकि इसके बाद का जो भी जनसांख्यिकीय बदलाव है, वह अवैध और असंवैधानिक बसावट का नतीजा है।
- 40% सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हों: परिसीमन के बाद राज्य में जो भी कुल बढ़ी हुई सीटें होंगी, उनमें से कम से कम 40 प्रतिशत सीटें अनिवार्य रूप से आदिवासी समाज के लिए आरक्षित की जाएं।
- विशेष “आडीवासी बहुल क्षेत्र” आरक्षण नीति: पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले सभी क्षेत्रों में एक विशेष आरक्षण नीति लागू की जाए, ताकि स्थानीयता और मूल पहचान सुरक्षित रहे।
- ऐतिहासिक विफलता की संसदीय जांच: 1950 से लेकर अब तक के सभी राज्यपालों और पूर्व राष्ट्रपतियों की निष्क्रियता व लापरवाही की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय संसदीय समिति (Parliamentary Committee) का गठन हो और दोषियों की जवाबदेही तय की जाए।
- बाहरी बसावट का तुरंत रिव्यू: पांचवीं अनुसूची वाले जिलों में बाहरी लोगों की नई बसावट पर तुरंत रोक लगाई जाए और पुरानी बसावटों की कानूनी व संवैधानिक वैधता की सघन समीक्षा (Review) हो।
अब चुप नहीं रहेगा झारखंड, यह अस्तित्व का उलगुलान है
संविधान ने आदिवासियों से जो वादे किए थे, इस देश की व्यवस्था, राजभवन और सरकारों ने उन तमाम वादों को तार-तार कर दिया है। अब परिसीमन के बहाने आदिवासियों के गले पर अंतिम वार करने की तैयारी चल रही है, जिसे झारखंड का समाज किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा।
यह लड़ाई अब महज कुछ सीटों के जोड़-घटाव या राजनीतिक प्रतिनिधित्व की नहीं है; यह लड़ाई आदिवासी समाज के अस्तित्व, अस्मिता और उनकी आने वाली पीढ़ियों की पहचान की लड़ाई है। यदि केंद्र और राज्य सरकारों ने इन न्यायसंगत और संवैधानिक मांगों को अनसुना करने की कोशिश की, तो पूरे झारखंड में परिसीमन का व्यापक बहिष्कार किया जाएगा और एक ऐसा जन-आंदोलन (उलगुलान) खड़ा होगा जिसकी गूंज दिल्ली के गलियारों तक सुनाई देगी।
झारखंड के आदिवासियों को अब एकजुट होना होगा। उनकी आवाज को संसद से लेकर सड़क और अदालत तक मजबूती से उठाना होगा। “करे कोई, भरे कोई” का यह घिनौना खेल अब बंद होना चाहिए। परिसीमन की तलवार आदिवासियों के गले पर नहीं, बल्कि उन संवैधानिक अपराधियों के गले पर लटकनी चाहिए जिन्होंने 75 साल तक चुप रहकर इस संकट को आमंत्रित किया है। इतिहास गवाह है कि जब-जब झारखंड के आदिवासियों को दबाने और मिटाने की कोशिश की गई है, इस वीर भूमि से विद्रोह का शंखनाद हुआ है। यह अन्याय अब खत्म होना ही चाहिए!











