Ranchi | झारखंड के मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के अध्यक्ष Hemant Soren की राजनीतिक सक्रियता अब राज्य की सीमाओं से आगे बढ़ती दिख रही है। असम और पश्चिम बंगाल में अगले वर्ष प्रस्तावित विधानसभा चुनावों को लेकर झामुमो ने रणनीतिक तैयारी शुरू कर दी है। आदिवासी राजनीति के राष्ट्रीय विस्तार की संभावनाओं को परखते हुए पार्टी ने दोनों राज्यों में जमीनी आकलन के निर्देश दिए हैं।
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सूत्रों के अनुसार, झामुमो नेतृत्व का मानना है कि पूर्वोत्तर और बंगाल के आदिवासी बहुल इलाकों में पार्टी के लिए राजनीतिक अवसर मौजूद हैं। इसी सोच के तहत हेमंत सोरेन ने संगठन को निर्देश दिया है कि सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाए। पार्टी यह जानना चाहती है कि किन क्षेत्रों में आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं और वहां स्थानीय संगठनों का प्रभाव कितना है।
झामुमो के भीतर इसे केवल चुनावी विस्तार नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की राजनीति को राष्ट्रीय मंच पर ले जाने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी का फोकस दीर्घकालिक सांगठनिक मजबूती पर भी है।
असम में झारखंडी मूल के आदिवासी और एसटी दर्जे का सवाल
असम में झामुमो की बढ़ती दिलचस्पी का मुख्य कारण वहां बड़ी संख्या में बसे झारखंडी मूल के आदिवासी हैं। करीब एक सदी पहले झारखंड क्षेत्र से हजारों आदिवासी मजदूर असम के चाय बागानों में काम के लिए गए थे। आज उनकी कई पीढ़ियां वहीं रह रही हैं, लेकिन अब तक उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा नहीं मिल सका है।
हाल ही में असम में रह रहे झारखंडी मूल के आदिवासियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात कर अपनी समस्याएं रखीं। इस मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने के संकेत दिए। झारखंड सरकार की ओर से असम में आदिवासियों की सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक उच्चस्तरीय शिष्टमंडल भेजने का निर्णय लिया गया है।
हिमंत बिस्व सरमा पर सियासी जवाब?
असम में झामुमो की सक्रियता को केवल सामाजिक सरोकार तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसके पीछे स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी है। असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा के सह-प्रभारी थे और उन्होंने महीनों तक झारखंड में सक्रिय रहकर राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश की थी।
अब हेमंत सोरेन की असम में संभावित राजनीतिक भूमिका को उसी का जवाब माना जा रहा है। झामुमो के रणनीतिकार इसे आदिवासी अधिकारों के सवाल पर भाजपा को घेरने का अवसर मानते हैं। इसी क्रम में पार्टी नेताओं को असम में आदिवासी वोटरों की संख्या, प्रभाव और संभावित गठजोड़ का विस्तृत अध्ययन करने को कहा गया है।
जनवरी के पहले सप्ताह में मंत्री चमरा लिंडा, सांसद विजय हांसदा और विधायक एमटी राजा असम दौरे पर जाएंगे। यह दौरा आगे की रणनीति तय करने में अहम माना जा रहा है।
बंगाल के आदिवासी इलाकों पर झामुमो का फोकस
पश्चिम बंगाल में भी झामुमो की नजर झारखंड से सटे आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर है। पुरुलिया, बांकुड़ा, पश्चिम मिदनापुर और जंगलमहल जैसे इलाकों में आदिवासी मतदाताओं की संख्या प्रभावशाली है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, झामुमो करीब एक दर्जन विधानसभा सीटों पर गंभीर तैयारी कर रहा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में भाजपा ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया था। ऐसे में झामुमो खुद को एक मजबूत क्षेत्रीय विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है। पार्टी का मानना है कि झारखंड से सटे इलाकों में उसकी सामाजिक पहचान और सांगठनिक अनुभव उसे बढ़त दिला सकते हैं।
तृणमूल कांग्रेस के साथ संभावित तालमेल
बंगाल में झामुमो की रणनीति Trinamool Congress के साथ संभावित तालमेल पर भी टिकी है। पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच औपचारिक गठबंधन नहीं हो पाया था, हालांकि हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के आग्रह पर तृणमूल उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया था।
इस वर्ष की शुरुआत में हेमंत सोरेन और ममता बनर्जी की मुलाकात भी हुई थी। दोनों नेताओं के बीच बेहतर संबंध माने जाते हैं। झामुमो रणनीतिकारों का मानना है कि आदिवासी इलाकों में पार्टी की पकड़ का हवाला देकर तृणमूल पर सीटों के तालमेल का दबाव बनाया जा सकता है।
असम और बंगाल में झामुमो की बढ़ती सक्रियता से आदिवासी समुदाय के बीच नई उम्मीदें भी जगी हैं। खासकर एसटी दर्जे जैसे लंबे समय से लंबित मुद्दों को लेकर लोगों को लग रहा है कि उनकी आवाज अब राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यदि झामुमो सीमित सीटों पर भी प्रभावी प्रदर्शन करता है, तो यह आदिवासी राजनीति में नए संतुलन की शुरुआत हो सकती है। इससे राष्ट्रीय दलों की रणनीति पर भी असर पड़ सकता है।
फिलहाल असम और बंगाल दोनों में झामुमो की तैयारियां प्रारंभिक स्तर पर हैं। जमीनी रिपोर्ट, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक संभावनाओं के विस्तृत आकलन के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा। संगठन विस्तार, स्थानीय नेतृत्व और संभावित गठबंधन—इन सभी बिंदुओं पर विचार जारी है।
असम और बंगाल की ओर झामुमो का बढ़ता कदम केवल चुनावी विस्तार नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीति को राष्ट्रीय पहचान देने की रणनीति का हिस्सा है। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो हेमंत सोरेन का यह कदम उन्हें झारखंड से बाहर भी एक प्रभावशाली आदिवासी नेता के रूप में स्थापित कर सकता है।









