डहर 2.0 सर्वे में जुड़ा ‘अन्य’ कॉलम, आदिवासी बच्चों को अब मिलेगी धार्मिक पहचान

Subhash Shekhar
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Ranchi | झारखंड में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े डहर (डिजिटल हैबिटेशन मैपिंग एंड रियल-टाइम मॉनिटरिंग) 2.0 सर्वे में बड़ा और अहम बदलाव किया गया है। शिक्षा विभाग ने धर्म कॉलम में ‘अन्य’ (Others) विकल्प जोड़ दिया है। इस फैसले से अब वे आदिवासी बच्चे, जो स्वयं को किसी प्रमुख संगठित धर्म से नहीं जोड़ते, सरना या आदिवासी धर्म के रूप में अपनी पहचान दर्ज करा सकेंगे।

यह संशोधन लंबे समय से उठ रही मांगों और आपत्तियों के बाद किया गया है। इससे आदिवासी समाज के बच्चों की वास्तविक धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान अब सरकारी आंकड़ों में दर्ज हो सकेगी।

डहर 2.0 सर्वे: पूरी खबर विस्तार से

डहर 2.0 सर्वे केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त पहल है। इसका उद्देश्य 3 से 18 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों का डिजिटल डेटा तैयार करना है। इस सर्वे के तहत विद्यालय में नामांकित और ड्रॉपआउट, दोनों श्रेणियों के बच्चों की जानकारी एकत्र की जाती है।

अब तक सर्वे फॉर्म में धर्म के रूप में केवल हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध जैसे विकल्प मौजूद थे। इससे वे आदिवासी बच्चे, जो सरना या अन्य पारंपरिक जनजातीय आस्था से जुड़े हैं, अपनी वास्तविक पहचान दर्ज नहीं करा पा रहे थे।

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शिक्षा विभाग ने इस कमी को स्वीकार करते हुए 11 दिसंबर 2025 से पोर्टल पर ‘अन्य’ कॉलम को सक्रिय कर दिया है।

क्यों जरूरी था ‘अन्य’ कॉलम जोड़ना

आदिवासी संगठनों का लगातार कहना था कि सीमित धर्म विकल्पों के कारण आदिवासी बच्चों की गलत या अधूरी गणना हो रही है। इससे न केवल आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही थी, बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ भी सही वर्ग तक नहीं पहुंच पा रहा था।

विशेषज्ञों के अनुसार, जब किसी समुदाय की पहचान सही तरीके से दर्ज नहीं होती, तो नीति निर्माण और बजट आवंटन में भी असंतुलन पैदा होता है। ‘अन्य’ कॉलम जुड़ने से यह समस्या काफी हद तक दूर होगी।

आदिवासी समाज की प्रतिक्रिया

इस फैसले का स्वागत करते हुए आदिवासी नेता अजय तिर्की ने कहा कि डहर 2.0 सर्वे में ‘अन्य’ कॉलम जोड़ना आदिवासी समाज के लिए ऐतिहासिक और सकारात्मक कदम है।

उन्होंने कहा कि इससे बच्चों की सही पहचान दर्ज होगी और सरकार के सामने वास्तविक आंकड़े सामने आएंगे। यह केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व और अस्मिता की स्वीकारोक्ति है। सही गणना से ही शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सही लाभुकों तक पहुंच सकेगा।

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शिक्षा विभाग और प्रशासन का पक्ष

शिक्षा पदाधिकारी बादल ने स्पष्ट किया कि डहर 2.0 सर्वे पूरी तरह विभागीय और उच्चस्तरीय निर्देशों के तहत संचालित हो रहा है। उन्होंने बताया कि योजना में किए जाने वाले सभी संशोधन राज्य स्तर से प्राप्त दिशा-निर्देशों के अनुसार लागू होते हैं।

धर्म कॉलम में ‘अन्य’ विकल्प जोड़ना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। विभाग ने सभी स्कूलों और संबंधित कर्मियों को निर्देश दिया है कि वे संशोधित प्रारूप के अनुसार ही प्रविष्टियां सुनिश्चित करें, ताकि किसी भी बच्चे की पहचान छूटे नहीं।

नामांकित और ड्रॉपआउट बच्चों का डेटा होगा मजबूत

डहर 2.0 सर्वे की खास बात यह है कि इसमें केवल स्कूल जाने वाले बच्चे ही नहीं, बल्कि ड्रॉपआउट और स्कूल से बाहर रह गए बच्चों को भी शामिल किया जाता है। इसी डेटा के आधार पर हर वर्ष समग्र शिक्षा अभियान की वार्षिक कार्य योजना और बजट तय किया जाता है।

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‘अन्य’ कॉलम जुड़ने से अब आदिवासी बच्चों की सही संख्या और स्थिति सामने आएगी, जिससे भविष्य की योजनाएं अधिक समावेशी और प्रभावी बन सकेंगी।

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की राय

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस बदलाव से आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति और धार्मिक पहचान को सरकारी नीतियों में उचित स्थान मिलेगा।

अधिकारियों के अनुसार, जब सरकारी रिकॉर्ड में समुदाय की सही पहचान दर्ज होगी, तभी शिक्षा, संस्कृति संरक्षण और जनजातीय कल्याण से जुड़ी योजनाएं ज़मीन पर प्रभावी ढंग से लागू हो सकेंगी।

शिक्षा विभाग आने वाले दिनों में डहर 2.0 सर्वे की प्रगति की समीक्षा करेगा। यह भी देखा जाएगा कि संशोधित धर्म कॉलम के तहत प्रविष्टियां सही तरीके से हो रही हैं या नहीं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है, तो भविष्य में अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं को भी सर्वे में शामिल किया जा सकता है।

डहर 2.0 सर्वे में ‘अन्य’ कॉलम का जुड़ना आदिवासी समाज के बच्चों के लिए पहचान, सम्मान और अधिकार की दिशा में एक अहम कदम है। इससे न केवल आंकड़ों की सटीकता बढ़ेगी, बल्कि सरकार को भी नीति निर्माण में सही दिशा मिलेगी। यह बदलाव झारखंड की शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी और संवेदनशील बनाने की ओर बढ़ता कदम माना जा रहा है।

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सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।
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