Cluster System in Jharkhand: आखिर क्या है यह नया नियम जिसे लेकर पूरे राज्य में भारी बवाल मचा हुआ है? क्यों कॉलेज के छात्र और प्रोफेसर्स इसके खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं? जानिए ग्राउंड जीरो से हमारी यह एक्सक्लूसिव रिपोर्ट।
झारखंड के उच्च शिक्षा विभाग में इन दिनों एक नया शब्द गूंज रहा है—क्लस्टर सिस्टम। इस एक व्यवस्था ने राज्य के पूरे कॉलेज कैंपस, यूनिवर्सिटी और सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। स्थिति यह हो गई है कि Cluster System in Jharkhand को लेकर छात्रों का गुस्सा इस कदर भड़क उठा है कि वे अब राजनीतिक दलों का दामन थामकर बड़े आंदोलन की रणनीति बना रहे हैं।
रांची के प्रतिष्ठित राम लखन सिंह यादव (RLSY) कॉलेज के दर्जनों छात्र-छात्राओं ने मंगलवार को ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) की सदस्यता ले ली। छात्रों का साफ कहना है कि सरकार की यह नई नीति उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
दूसरी तरफ, मामला इतना गंभीर हो चुका है कि सूबे के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू को खुद कमान संभालनी पड़ी है। उन्होंने विभाग के प्रधान सचिव राहुल कुमार पुरवार और निदेशालय के आला अधिकारियों के साथ मंगलवार को एक हाई-लेवल इमरजेंसी मीटिंग की। इस बैठक में राज्य के सभी सरकारी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों (VCs) और अंगीभूत (Constituent) कॉलेजों के प्राचार्यों (Principals) को बुलाया गया ताकि यह समझा जा सके कि आखिर इस क्लस्टर सिस्टम का इतना विरोध क्यों हो रहा है।
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क्लस्टर सिस्टम क्या है? (What is Cluster System in Jharkhand)
सरल शब्दों में समझें तो क्लस्टर सिस्टम का मतलब है ‘कॉलेजों का एक समूह या गुच्छा बनाना’। इस नई व्यवस्था के तहत सरकार राज्य के अलग-अलग कॉलेजों को भौगोलिक स्थिति (Location) के आधार पर एक क्लस्टर (समूह) में बांटने की तैयारी कर रही है।
नियम के मुताबिक: मान लीजिए किसी शहर या जिले में 4 से 5 सरकारी कॉलेज हैं। सरकार उन सभी को मिलाकर एक ‘क्लस्टर’ बना देगी। इसके बाद इन कॉलेजों के संसाधन, जैसे—लाइब्रेरी, लैबोरेट्री, खेल का मैदान और सबसे जरूरी यानी शिक्षकों (Faculty) को आपस में शेयर किया जाएगा।
सरकार का तर्क है कि इससे उन कॉलेजों को फायदा होगा जहां इंफ्रास्ट्रक्चर या शिक्षकों की कमी है। उदाहरण के लिए, अगर कॉलेज ‘ए’ में फिजिक्स के प्रोफेसर नहीं हैं, तो क्लस्टर के तहत कॉलेज ‘B’ के प्रोफेसर वहां जाकर क्लास ले सकेंगे। सुनने में यह योजना जितनी अच्छी और सुलभ लगती है, धरातल पर इसका उतना ही कड़ा विरोध हो रहा है।
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मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू की हाई-लेवल मीटिंग में क्या हुआ?
बढ़ते बवाल को देखते हुए उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने रांची में कुलपतियों और प्राचार्यों के साथ लंबी चर्चा की। मंत्री खुद यह जानना चाहते थे कि अगर यह व्यवस्था शिक्षा में सुधार के लिए है, तो फिर कॉलेज कैंपस सुलग क्यों रहे हैं?
इस बैठक में कुलपतियों और प्राचार्यों ने जमीनी हकीकत को बयां किया। उन्होंने मंत्री को बताया कि Cluster System in Jharkhand लागू करने से पहले कई तकनीकी और व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करना बेहद जरूरी है।
- समीक्षा की मांग: कई यूनिवर्सिटी के कुलपतियों ने मंत्री से साफ तौर पर कहा कि इस योजना को फिलहाल एक साल के लिए टाल दिया जाना चाहिए।
- मंत्री का आश्वासन: सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने भरोसा दिलाया है कि सरकार जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाएगी। योजना की एक बार फिर से गहन समीक्षा की जाएगी, उसके बाद ही कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा।
छात्रों के विरोध के 5 सबसे बड़े कारण
छात्रों का गुस्सा आसमान पर है। उनका कहना है कि इस सिस्टम को लागू करने से उनकी पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाएगी। आइए जानते हैं कि छात्रों को इस Cluster System in Jharkhand से क्या दिक्कतें हैं:
| क्र.सं. | छात्रों की मुख्य चिंताएं | इसका सीधा असर |
| 1 | भौगोलिक दूरी (Geographical Location) | अलग-अलग कॉलेजों की दूरी बहुत ज्यादा है, जिससे आने-जाने में समय और पैसा बर्बाद होगा। |
| 2 | मनपसंद विषय चयन में दिक्कत | क्लस्टर की वजह से छात्रों को उनके पसंदीदा विषय के लिए दूसरे दूर-दराज के कॉलेज में भेजा जा सकता है। |
| 3 | तकनीकी खामियां (Technical Issues) | चांसलर पोर्टल और ऑनलाइन एडमिशन सिस्टम में इस नए क्लस्टर को लेकर भारी कन्फ्यूजन है। |
| 4 | जीईआर (GER) में गिरावट का डर | झारखंड का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो पहले ही कम है, इस झंझट से छात्र पढ़ाई छोड़ सकते हैं। |
| 5 | निजी कॉलेजों की चांदी | सरकारी कॉलेजों की इस अव्यवस्था से तंग आकर छात्र प्राइवेट यूनिवर्सिटी का रुख करेंगे। |
1. भौगोलिक परेशानी और आवागमन का संकट
झारखंड एक आदिवासी और ग्रामीण बहुल राज्य है। यहां दूर-दराज के गांवों से छात्र-छात्राएं कई किलोमीटर का सफर तय करके जिला मुख्यालय या नजदीकी शहर के कॉलेज में पढ़ने आते हैं। अगर क्लस्टर सिस्टम के तहत उन्हें एक क्लास के लिए अपने मुख्य कॉलेज और दूसरी क्लास के लिए 15 किलोमीटर दूर किसी दूसरे कॉलेज में जाना पड़ा, तो वे कैसे मैनेज करेंगे? खासकर छात्राओं के लिए सुरक्षा और ट्रांसपोर्टेशन एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगी।
2. मनपसंद विषय न मिल पाना
छात्रों को डर है कि इस सिस्टम के लागू होने से विषय चुनने की उनकी आजादी छिन जाएगी। अगर किसी कॉलेज में सीटें भरी होंगी, तो क्लस्टर के नाम पर उन्हें किसी ऐसे कॉलेज का विकल्प दे दिया जाएगा जो उनके घर से बहुत दूर है।
प्रोफेसर्स और प्रिंसिपल्स को किस बात का डर है?
सिर्फ छात्र ही नहीं, बल्कि कॉलेजों के शिक्षक भी इस Cluster System in Jharkhand के सख्त खिलाफ हैं। प्राचार्यों और शिक्षक संघों ने मंत्री के सामने अपनी कई चिंताएं रखी हैं:
- शिक्षकों के स्थानांतरण (Transfer) की आशंका: प्रोफेसर्स को डर है कि क्लस्टर सिस्टम की आड़ में सरकार उनका बार-बार ट्रांसफर करेगी। आज एक कॉलेज में पढ़ा रहे हैं, तो कल क्लस्टर के दूसरे कॉलेज में भेज दिया जाएगा। इससे उनका सर्विस ट्रैक और अकादमिक माहौल खराब होगा।
- फैकल्टी की कमी का शॉर्टकट: शिक्षकों का कहना है कि सरकार यूनिवर्सिटीज में खाली पड़े हजारों पदों पर स्थायी बहाली करने के बजाय क्लस्टर सिस्टम जैसा शॉर्टकट अपना रही है। एक ही प्रोफेसर से तीन-तीन कॉलेजों में काम लेने की कोशिश की जा रही है, जिससे पढ़ाई की क्वालिटी गिरेगी।
[UGC Guidelines on Faculty Recruitment and NEP]
एडमिशन प्रोसेस पर संकट: 12वीं के बाद क्यों अटकी गाड़ियां?
झारखंड में झारखंड एकेडमिक काउंसिल (JAC), CBSE और ICSE के 12वीं के बोर्ड परीक्षा के परिणाम जारी हो चुके हैं। अमूमन मई के इस महीने तक कॉलेजों में स्नातक (UG) यानी ग्रेजुएशन के एडमिशन की प्रक्रिया जोरों पर होती है। लेकिन इस बार कहानी बिल्कुल अलग है।
Cluster System in Jharkhand को लेकर जारी असमंजस के कारण अभी तक राज्य के प्रमुख सरकारी विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर पर नामांकन (Enrollment) की प्रक्रिया सुचारू रूप से शुरू नहीं हो सकी है।
बड़ा नुकसान: एडमिशन में हो रही इस देरी का सीधा असर राज्य के शैक्षणिक सत्र (Academic Session) पर पड़ रहा है। सत्र पहले ही लेट होने की कगार पर है। प्राचार्यों ने चेतावनी दी है कि अगर यही स्थिति रही, तो झारखंड के मेधावी छात्र राज्य से बाहर दिल्ली, बेंगलुरु या ओडिशा के विश्वविद्यालयों का रुख कर लेंगे, जिससे राज्य का ‘ब्रेन ड्रेन’ होगा।
आजसू (AJSU) की एंट्री: छात्र राजनीति क्यों गरमाई?
इस पूरे विवाद ने अब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ ले लिया है। छात्र संगठनों को इस आंदोलन में अपना भविष्य और छात्रों का हित दोनों नजर आ रहा है। रांची के राम लखन सिंह यादव (RLSY) कॉलेज में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद कई छात्र आजसू पार्टी में शामिल हो गए।

आजसू के महानगर अध्यक्ष अमन साहू और प्रदेश सचिव राजेश सिंह के नेतृत्व में हुई इस बैठक में छात्रों ने एक सुर में कहा कि वे सरकार की इस ‘थोप जाने वाली’ नीति को बर्दाश्त नहीं करेंगे।
- नेतृत्व: इस पूरे कॉलेज विस्तार और छात्र आंदोलन का नेतृत्व लक्ष्मी कुमारी और मोहन रविदास कर रहे हैं।
- संकल्प: बैठक में कोमल कुमारी, खुशी कुमारी, कुसुम यादव, लक्ष्मी प्रिया सिंह समेत दर्जनों छात्र-छात्राओं ने संकल्प लिया कि वे क्लस्टर सिस्टम के खिलाफ चरणबद्ध तरीके से आंदोलन करेंगे।
क्या नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के खिलाफ है यह सिस्टम?
विरोध कर रहे छात्र नेताओं और कुछ शिक्षाविदों का दावा है कि झारखंड सरकार का यह क्लस्टर सिस्टम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) की मूल भावना के विपरीत है।
NEP 2020 छात्रों को ‘मल्टीडिसीप्लिनरी एजुकेशन’ (बहुविषयक शिक्षा) और ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ (लचीलापन) देने की बात करता है, ताकि छात्र अपनी मर्जी से विषय चुन सकें और उनके पास संसाधनों की कमी न हो। लेकिन छात्रों का तर्क है कि बुनियादी ढांचा (Infrastructure) सुधारे बिना, बिना नई बसें चलाए, बिना नए क्लासरूम बनाए सिर्फ कागजों पर क्लस्टर बना देने से लचीलापन नहीं बल्कि ‘अव्यवस्था’ फैलेगी।
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लोकल खबर इनसाइट्स (Local Khabar Insights): ग्राउंड रिपोर्ट और एक्सपर्ट एनालिसिस
लोकल खबर (localkhabar.com) की टीम ने जब रांची यूनिवर्सिटी के कुछ वरिष्ठ प्रोफेसरों और शिक्षा विशेषज्ञों से बात की, तो कई चौंकाने वाले पहलू सामने आए।
एक्सपर्ट व्यू: नाम न छापने की शर्त पर एक सीनियर प्रोफेसर ने बताया, “सरकार की मंशा बुरी नहीं है। वे चाहते हैं कि अगर किसी सुदूर इलाके के कॉलेज में किसी विषय के टीचर नहीं हैं, तो बगल के कॉलेज से मदद मिल जाए। लेकिन झारखंड जैसे राज्य में जहां दो कॉलेजों के बीच की दूरी पहाड़ों, जंगलों या खराब रास्तों की वजह से तय करना मुश्किल होता है, वहां यह मॉडल फ्लॉप हो सकता है। सरकार को पहले पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इसे किसी एक जिले में लागू करके देखना चाहिए था।”
इसके अलावा, सबसे बड़ा संकट ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) का है। झारखंड में उच्च शिक्षा में ड्रॉपआउट रेट पहले ही चिंताजनक है। अगर एडमिशन की प्रक्रिया को और जटिल बनाया गया, तो गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्र पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे।
आगे क्या होगा? क्या सरकार वापस लेगी फैसला?
फिलहाल गेंद अब मुख्यमंत्री और उच्च शिक्षा मंत्री के पाले में है। कुलपतियों और प्राचार्यों से फीडबैक मिलने के बाद मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू बैकफुट पर नजर आ रहे हैं। उन्होंने साफ संकेत दिए हैं कि छात्रों और शिक्षकों के हितों की अनदेखी करके कोई भी व्यवस्था लागू नहीं की जाएगी।
संभावित कदम:
- एक साल के लिए स्थगन: पूरी संभावना है कि सरकार इस सत्र (2026-27) में क्लस्टर सिस्टम को लागू न करे और इसे एक साल के लिए टाल दे।
- कमेटी का गठन: मामले की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई जा सकती है, जिसमें छात्र प्रतिनिधियों और शिक्षक संघों को भी शामिल किया जाए।
- पोर्टल में सुधार: चांसलर पोर्टल को पुराने ढर्रे पर ही खोलकर जल्द से जल्द स्नातक के एडमिशन शुरू कराए जा सकते हैं ताकि छात्रों का साल बर्बाद न हो।
झारखंड की शिक्षा व्यवस्था और इस आंदोलन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी लाइव अपडेट के लिए पढ़ते रहिए लोकल खबर (localkhabar.com)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. Cluster System in Jharkhand का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: सरकार का उद्देश्य राज्य के कॉलेजों के संसाधनों और शिक्षकों का आपस में तालमेल बिठाकर कमी को दूर करना है, ताकि किसी भी कॉलेज में पढ़ाई प्रभावित न हो।
Q2. छात्र इस क्लस्टर सिस्टम का विरोध क्यों कर रहे हैं?
उत्तर: छात्रों को डर है कि इससे उन्हें क्लास करने के लिए अलग-अलग और दूर-दराज के कॉलेजों में भटकना पड़ेगा, जिससे उनका समय और पैसा बर्बाद होगा। साथ ही मनपसंद सब्जेक्ट मिलने में भी दिक्कत होगी।
Q3. क्या क्लस्टर सिस्टम की वजह से ग्रेजुएशन (UG) एडमिशन में देरी हो रही है?
उत्तर: हां, इस सिस्टम को लेकर मचे बवाल और तकनीकी कन्फ्यूजन के कारण राज्य के सरकारी विश्वविद्यालयों में स्नातक नामांकन प्रक्रिया अब तक पूरी तरह शुरू नहीं हो सकी है।
Q4. शिक्षकों को इस व्यवस्था से क्या परेशानी है?
उत्तर: शिक्षकों को आशंका है कि इस व्यवस्था के लागू होने से उनका मनमाना स्थानांतरण (Transfer) किया जा सकता है और एक ही शिक्षक पर कई कॉलेजों का बोझ डाला जाएगा।
Q5. शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का इस पर क्या फैसला है?
उत्तर: शिक्षा मंत्री ने कुलपतियों और प्राचार्यों के साथ बैठक के बाद कहा है कि इस योजना की दोबारा गहन समीक्षा की जाएगी और छात्रों के हित में ही फैसला लिया जाएगा। तब तक इसे स्थगित रखने का सुझाव भी मिला है।











