रांची। झारखंड की वीर धरा के गौरवशाली ‘चुआड़ विद्रोह’ के इतिहास को कथित तौर पर गलत तरीके से पेश करने का मामला अब तूल पकड़ चुका है। पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो की पुस्तक ‘झारखंड की समर गाथा’ को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में रांची सिविल कोर्ट ने एक ऐसा कड़ा फैसला सुनाया है, जिसने लेखकों और प्रकाशकों के बीच हड़कंप मचा दिया है। कोर्ट की बार-बार की अवहेलना करने वाले प्रतिवादियों के खिलाफ अब ‘एकतरफा कार्रवाई’ (Ex-parte) का आदेश जारी हो गया है।
अदालत में क्यों नहीं आए प्रकाशक? रडार पर ‘निधि बुक्स’ और डिस्ट्रीब्यूटर्स
रांची सिविल कोर्ट में सोमवार (20 अप्रैल) को हुई सुनवाई के दौरान मामले में नया मोड़ आ गया। आदिवासी भूमिज मुंडा चुआड़ सेना द्वारा दायर इस मुकदमे में प्रतिवादी संख्या 2 से 4 (निधि बुक्स, इसके मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रोप्राइटर दानिश डिस्ट्रीब्यूटर्स) एक बार फिर नदारद रहे।
हैरानी की बात यह है कि अदालत ने इन्हें पेश होने के लिए 20 फरवरी को विशेष नोटिस जारी किया था और मार्च में अखबारों में इश्तेहार भी निकलवाया था। कोर्ट ने अब उनकी चुप्पी को गंभीरता से लेते हुए जवाब दाखिल करने का अधिकार छीन लिया है। इसका सीधा मतलब है कि अब यह केस केवल वादी पक्ष की दलीलों पर आगे बढ़ेगा, जो शैलेंद्र महतो और उनके प्रकाशकों के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।
Jharkhand Kee Samargathaचुनौती देकर पीछे हटे? आदिवासी समाज में भारी आक्रोश
आदिवासी नेता लक्ष्मीनारायण मुंडा ने इस स्थिति पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने कहा, “पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो ने खुद मीडिया में सीना ठोककर कहा था कि अगर उनकी किताब में तथ्यों की गलती है तो कोर्ट जाएं। हमने उनकी चुनौती स्वीकार की, लेकिन अब उनके प्रकाशक और सहयोगी अदालत की दहलीज पर आने से डर रहे हैं। यह न केवल कोर्ट का अपमान है, बल्कि पूरे आदिवासी समाज की अस्मिता के साथ खिलवाड़ है।”
विवाद की मुख्य जड़ क्या है?
- इतिहास का ‘महतोकरण’?: आरोप है कि किताब में ‘चुआड़ विद्रोह’ के नायक रघुनाथ भूमिज को रघुनाथ महतो के रूप में पेश किया गया है।
- अस्मिता की लड़ाई: भूमिज मुंडा समुदाय का दावा है कि यह विद्रोह पूरी तरह से भूमिज आदिवासियों का था, जिसे जबरन कुड़मी/महतो समुदाय से जोड़ने की कोशिश की गई है।
- तथ्यों की तोड़-मरोड़: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पूर्व सांसद ने अपनी किताब में ऐतिहासिक साक्ष्यों को अपनी सुविधा अनुसार बदल दिया है।
ग्राउंड रिपोर्ट: रांची से दिल्ली तक क्यों मचेगा हड़कंप?
झारखंड में आदिवासी इतिहास और पहचान एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। 2026 के राजनीतिक परिवेश में, जहाँ जनजातीय गौरव को लेकर नई बहस छिड़ी है, यह अदालती फैसला आग में घी का काम कर सकता है। अगर अदालत का फैसला आदिवासी सेना के पक्ष में आता है, तो न केवल इस पुस्तक पर प्रतिबंध लग सकता है, बल्कि इतिहास के पुनर्लेखन की मांग भी तेज हो सकती है।
विजुअल सजेस्टशन: लेख के साथ रांची सिविल कोर्ट की तस्वीर और विवादित पुस्तक ‘झारखंड की समर गाथा’ का कवर पेज लगाएं, जिसमें रघुनाथ भूमिज बनाम रघुनाथ महतो के दावों का ग्राफिक्स हो।
निष्कर्ष: अब आगे क्या?
कोर्ट के ‘एकतरफा कार्रवाई’ के आदेश के बाद अब गेंद पूरी तरह से आदिवासी भूमिज मुंडा चुआड़ सेना के पाले में है। अब गवाहों के बयान और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर सुनवाई तेजी से आगे बढ़ेगी। क्या पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो इस कानूनी चक्रव्यूह से निकल पाएंगे? या फिर झारखंड के इतिहास की इस किताब को वापस लेना होगा? पूरे राज्य की नजरें अब अगली सुनवाई पर टिकी हैं।








