Ranchi | झारखंड कांग्रेस इन दिनों सत्ता में रहते हुए भी गंभीर आंतरिक संकट से जूझ रही है। पार्टी के विधायक, मंत्री और संगठन एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कांग्रेस हाईकमान को प्रभारी के. राजू को रांची भेजना पड़ा, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पहल पार्टी की अंदरूनी कलह को थाम पाएगी।
झारखंड में कांग्रेस सत्तारूढ़ गठबंधन का अहम हिस्सा है। इसके बावजूद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ चुका है।
विधायक संगठन से नाराज़ हैं, मंत्री दबाव में हैं और नेतृत्व पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विधानसभा से लेकर सार्वजनिक मंचों तक कांग्रेस नेताओं की बयानबाजी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा रही है।
स्थिति यह है कि कांग्रेस के आंतरिक विवाद अब केवल संगठन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली और साख पर भी असर डालने लगे हैं।
सत्ता में रहते हुए असंतोष क्यों?
कांग्रेस विधायकों का आरोप है कि सरकार में उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।
कई फैसले बिना परामर्श के लिए जा रहे हैं और संगठनात्मक बैठकें औपचारिकता बनकर रह गई हैं।
विधायकों का कहना है कि क्षेत्रीय समस्याओं, विकास कार्यों और जनता से जुड़े मुद्दों पर उनकी अनदेखी हो रही है। यही उपेक्षा धीरे-धीरे नाराज़गी और फिर खुली असहमति में बदल गई।
विधायक बनाम मंत्री: टकराव की असली जड़
पार्टी के भीतर सबसे बड़ा टकराव विधायकों और मंत्रियों के बीच दिखाई दे रहा है।
विधायक मंत्रियों पर आरोप लगा रहे हैं कि वे सत्ता का लाभ उठा रहे हैं, लेकिन संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं से दूरी बना रहे हैं।
वहीं मंत्री यह तर्क दे रहे हैं कि कुछ विधायक केवल राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं।
यह आपसी अविश्वास अब सार्वजनिक बहस में तब्दील हो चुका है।
इरफान अंसारी–प्रदीप यादव विवाद ने बढ़ाई मुश्किलें
कांग्रेस की अंदरूनी कलह का सबसे स्पष्ट उदाहरण स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी और विधायक दल के नेता प्रदीप यादव के बीच टकराव रहा।
यह विवाद विधानसभा के भीतर भी खुलकर सामने आया।
थैलेसीमिया, सिकल सेल और रक्त संबंधी बीमारियों के मुद्दे पर दोनों नेताओं के बीच तीखी बहस हुई।
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि स्पीकर को हस्तक्षेप करना पड़ा।
प्रदीप यादव ने सदन में बताया कि राज्य में लगभग 11 हजार बच्चे इन गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं और उन्हें हर महीने रक्त की आवश्यकता होती है, लेकिन ठोस नीति का अभाव है।
सदन को दिग्भ्रमित करने के आरोप
मंत्री इरफान अंसारी ने प्रदीप यादव पर सदन को दिग्भ्रमित करने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि हंसडीहा अस्पताल में कथित 25 करोड़ की चोरी का मामला गलत तथ्यों पर आधारित था।
मंत्री ने यह भी कहा कि गलत ब्लड ट्रांसफ्यूजन की घटनाओं के बाद राज्य में रक्तदान में कमी आई, लेकिन मुख्यमंत्री समेत कई लोगों के रक्तदान से 10 हजार यूनिट ब्लड जमा किया गया।
ऑडियो-वीडियो लीक प्रकरण से पार्टी की किरकिरी
रामगढ़ विधायक ममता देवी और मंत्री इरफान अंसारी से जुड़ा कथित ऑडियो वायरल होना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका साबित हुआ।
इस ऑडियो को लेकर विधानसभा में भी विवाद गरमा गया।
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने ऑडियो की पेन ड्राइव सदन के पटल पर रखकर फोरेंसिक जांच की मांग की।
ममता देवी ने स्पष्ट किया कि वायरल ऑडियो में आवाज़ उनकी नहीं है।
बाबूलाल मरांडी का हमला और कांग्रेस की मुश्किलें
बाबूलाल मरांडी ने इस पूरे मामले को भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला।
उन्होंने कहा कि ऑडियो की जांच से सच्चाई सामने आनी चाहिए।
इस हमले से कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान हुआ और विपक्ष को पार्टी की अंदरूनी कलह उजागर करने का अवसर मिला।
हेमंत सोरेन से बढ़ती नजदीकियां, नेतृत्व पर सवाल
कांग्रेस के कई विधायक अब संगठन के बजाय सीधे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से संवाद कर रहे हैं।
यह स्थिति पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय बन गई है।
राजनीतिक जानकार इसे कांग्रेस संगठन की कमजोर पकड़ और नेतृत्व संकट का संकेत मान रहे हैं।
प्रभारी के. राजू की एंट्री: डैमेज कंट्रोल की कोशिश
बढ़ते विवाद को देखते हुए कांग्रेस हाईकमान ने प्रभारी के. राजू को झारखंड भेजा।
उनका उद्देश्य नाराज़ विधायकों से संवाद स्थापित करना और मंत्रियों व संगठन के बीच संतुलन बनाना है।
हालांकि, पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अब संवाद से हालात संभल पाएंगे या नहीं।
जनता और सरकार पर असर
कांग्रेस की अंदरूनी कलह का सीधा असर सरकार की छवि पर पड़ रहा है।
विपक्ष लगातार इसे मुद्दा बना रहा है, जबकि जनता के बीच सरकार की स्थिरता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
राजनीतिक अस्थिरता का असर विकास कार्यों और प्रशासनिक फैसलों पर भी दिख सकता है।
आने वाले दिनों में प्रभारी के. राजू की बैठकों पर सभी की नजरें रहेंगी।
यदि संगठनात्मक सुधार और स्पष्ट नेतृत्व नहीं हुआ, तो यह कलह और गहराने की आशंका है।
झारखंड कांग्रेस इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां समय पर लिए गए फैसले ही पार्टी को संभाल सकते हैं।
झारखंड कांग्रेस की अंदरूनी कलह अब छिपी नहीं रही।
विधायक, मंत्री और संगठन के बीच बढ़ती दूरी पार्टी के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।
प्रभारी के. राजू के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को टूट से बचाने और विश्वास बहाल करने की है।
अब यह देखना होगा कि कांग्रेस इस संकट से उबरती है या यह विवाद आने वाले समय में और बड़ा राजनीतिक संकट बनता है।









