
आधुनिक भारत में महिला का जीवन बहुआयामी संघर्ष का प्रतीक है। वह राजनीति में अपनी जगह बनाना चाहती है, सामाजिक भूमिकाओं को सशक्त तरीके से निभाती है और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ भी अपने कंधों पर उठाती है। यह राह आसान नहीं है। इसमें सामाजिक पूर्वाग्रह, पारिवारिक दबाव, व्यावसायिक चुनौतियां और नीतिगत देरी—सब शामिल हैं। फिर भी यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखें तो यह संघर्ष निराशा नहीं, बल्कि सकारात्मकता, प्रगति और आत्मनिर्भरता की राह है। वर्तमान तथ्यों पर आधारित यह यात्रा दर्शाती है कि चुनौतियां भारी हैं, लेकिन दृढ़ता और सामूहिक प्रयास से इन्हें पार किया जा सकता है।
राजनीति में महिलाओं की वर्तमान स्थिति
2024 के लोकसभा चुनावों में 543 सीटों पर मात्र 74 महिलाएं सांसद चुनी गईं, जो कुल संख्या का लगभग 13.6-13.8% है। यह 2019 की 78 महिलाओं (14.4%) की तुलना में थोड़ा कम है। राज्य विधानसभाओं में स्थिति और भी चिंताजनक है; कुल 4,123 विधायकों में केवल 390 महिलाएं (लगभग 9%) हैं। उम्मीदवारों के रूप में भी महिलाओं की भागीदारी मात्र 9.6-10% रही। 2024 लोकसभा चुनाव में 8,360 उम्मीदवारों में सिर्फ 800 (9.6%) महिलाएं थीं। कुल मिलाकर लोकसभा और विधानसभाओं के लगभग 51,000 उम्मीदवारों में केवल 10% महिलाएं थीं।
दिलचस्प तथ्य यह है कि महिलाओं की जीत की दर अक्सर पुरुषों से बेहतर होती है। 2024 में महिलाओं की ‘विनेबिलिटी’ दर लगभग 9% रही, जबकि पुरुषों की 6%। पंचायत स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व सराहनीय है, जहाँ वे जल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी योजनाओं में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (33% आरक्षण) 2023 में पारित तो हुआ, लेकिन इसका पूर्ण कार्यान्वयन अभी लंबित है। इसके 2029 के बाद प्रभावी होने की संभावना है, जब परिसीमन (Delimitation) के बाद लोकसभा सीटें बढ़कर करीब 850 हो सकती हैं। वर्तमान में देरी निराशाजनक है, लेकिन यह कानून भविष्य में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को नई ऊंचाई दे सकता है।
सामाजिक भूमिका और कार्यबल भागीदारी
सामाजिक क्षेत्र में महिलाएं शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और सामुदायिक कार्यों में अग्रणी हैं। ‘पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे’ (PLFS) 2025 के अनुसार, महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर (Female LFPR) में सुधार हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह 45.9% तक पहुंची है, जबकि कुल LFPR करीब 34-40% के आसपास है। शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा अभी भी अपेक्षा से कम है।
हालांकि, चुनौतियां अब भी बरकरार हैं। महिलाएं मुख्य रूप से अनौपचारिक क्षेत्र, कृषि और छोटे उद्योगों में कार्यरत हैं। वेतन असमानता, पदोन्नति (Promotion) में बाधाएं और कार्यस्थल पर सुरक्षा की कमी उन्हें प्रभावित करती है। खासकर ग्रामीण भारत में सामाजिक भूमिका निभाते हुए वे कई बार पारंपरिक बंधनों से जूझती हैं।
पारिवारिक जिम्मेदारियां: ‘डबल बर्डन’
सबसे बड़ी चुनौती ‘डबल बर्डन’ (दोहरा बोझ) है—सवैतनिक कार्य (Paid Work) के साथ अवैतनिक देखभाल (Unpaid Care Work)। ‘टाइम यूज़ सर्वे’ 2024 के अनुसार, 15-59 वर्ष की महिलाएं अवैतनिक घरेलू कार्यों पर औसतन 305 मिनट (लगभग 5 घंटे) प्रतिदिन बिताती हैं, जबकि पुरुष केवल 88 मिनट। देखभाल (Caregiving) में महिलाएं 140 मिनट और पुरुष 74 मिनट खर्च करते हैं।
शहरी कामकाजी महिलाओं पर यह बोझ और भी भारी है। वे ऑफिस में 6-8 घंटे बिताती हैं, फिर घर लौटकर रसोई, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और घरेलू काम संभालती हैं। इससे तनाव, बर्नआउट, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं और करियर में रुकावट आती है। कई महिलाएं मातृत्व के बाद करियर ब्रेक ले लेती हैं या कम चुनौतीपूर्ण नौकरियां स्वीकार कर लेती हैं। परिवार में समान भागीदारी की कमी और सामाजिक अपेक्षाएं कि “घर संभालना केवल महिला का काम है”, इस संघर्ष को और कठिन बनाती हैं।
संघर्ष के बीच प्रेरणा और आशा
इतना सब होते हुए भी आज की महिलाएं हार नहीं मान रही हैं। इंदिरा गांधी, सरोजिनी नायडू, मायावती और जयललिता जैसी नेत्रियों ने कठिन राहें तय करके अपनी जगह बनाई थी। आज भी कई महिलाएं राजनीति, कॉर्पोरेट, स्टार्टअप और सामाजिक कार्यों में नेतृत्व कर रही हैं। पंचायतों में लाखों महिला प्रतिनिधि सुशासन का बेहतरीन उदाहरण पेश कर रही हैं।
प्रेरणादायक पहलू यह है कि संघर्ष आपकी नियति नहीं, बल्कि आपकी ताकत है। हर दिन उठकर एक महिला न केवल परिवार चलाती है, बल्कि समाज और राष्ट्र का भविष्य भी गढ़ती है। शिक्षा प्राप्त करना, कौशल विकसित करना, नेटवर्किंग, परिवार से समान जिम्मेदारी की मांग और नीतिगत समर्थन (बेहतर चाइल्डकेयर, फ्लेक्सिबल वर्किंग, सुरक्षा कानून) जैसे कदम बड़ी क्रांति ला सकते हैं।
अब समाज को बदलना होगा। पुरुषों को घरेलू जिम्मेदारियों में बराबर का भागीदार बनना चाहिए। सरकार को बेहतर चाइल्डकेयर सुविधाएं, पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) और कार्यस्थल पर जेंडर समानता सुनिश्चित करनी चाहिए। 33% आरक्षण का शीघ्र कार्यान्वयन मील का पत्थर साबित होगा।
आज की भारतीय महिला जानती है कि संतुलन संभव है, बशर्ते उसे आत्मविश्वास, परिवार का सहयोग और नीतिगत समर्थन मिले। वह इतिहास रच रही है और उसका हर संघर्ष सार्थक होगा। धैर्य, साहस और निरंतर प्रयास से वह न केवल अपनी राह बनाएगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त करेगी। क्योंकि सच्ची शक्ति संघर्ष में ही निहित है।
संदर्भ: ADR रिपोर्ट्स, PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च, PLFS 2025, टाइम यूज़ सर्वे 2024 और संबंधित सरकारी आंकड़ों पर आधारित।









