Ranchi | झारखंड के 12 अति नक्सल प्रभावित जिलों की सुरक्षा में तैनात करीब ढाई हजार सहायक पुलिसकर्मियों के सिर पर एक बार फिर बेरोजगारी की तलवार लटक गई है। साल 2017 में संविदा पर बहाल हुए इन जवानों की सेवा विस्तार अवधि अगस्त 2026 के पहले हफ्ते में खत्म हो रही है। नौकरी जाने के डर से हजारों परिवारों की रात की नींद और दिन का चैन छिन गया है।
हर साल सेवा विस्तार के नाम पर मिलने वाले ‘एक-एक साल के जीवनदान’ से तंग आ चुके ये जवान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। इस बार का संकट इसलिए भी भावनात्मक रूप से भारी है क्योंकि अगस्त में जहां एक तरफ रक्षाबंधन का त्योहार है, वहीं दूसरी तरफ जवानों को पुलिस अधीक्षकों (SP) द्वारा सेवा विमुक्ति (हटाने) का लेटर थमाए जाने की आशंका है।

रक्षाबंधन पर राखी या विमुक्ति पत्र? जवानों की आंखें नम
मैदान पर स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। चतरा, लातेहार और पश्चिमी सिंहभूम जैसे घोर नक्सल प्रभावित इलाकों में अपनी जान हथेली पर रखकर ड्यूटी करने वाले ये जवान आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। झारखंड सहायक पुलिस प्रदेश संगठन के बैनर तले जवानों ने अपनी इस पीड़ा को लेकर सरकार के दरवाजे खटखटाए हैं।
हाल ही में सहायक पुलिसकर्मियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने झारखंड सरकार के वित्त मंत्री माननीय राधा कृष्ण किशोर से मुलाकात कर उन्हें एक लिखित और मौखिक आवेदन सौंपा। जवानों ने रुंधे गले से वित्त मंत्री के सामने अपना दर्द बयां किया कि त्योहार के महीने में उनके हाथों में रोजगार की गारंटी होनी चाहिए, न कि नौकरी से निकाले जाने का फरमान।
वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर का आश्वासन: “कैबिनेट में उठेगा मामला”
जवानों की पूरी बात सुनने के बाद वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने इस मामले की गंभीरता को समझा। ग्राउंड से आ रही रिपोर्ट के अनुसार, वित्त मंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त करते हुए कहा:
”यह पूरी तरह से एक पॉलिसी मेकिंग (नीतिगत) मैटर है। इस विषय को लेकर हम जल्द ही कैबिनेट स्तर की मीटिंग में मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के साथ बात रखेंगे। सरकार इस समस्या के स्थाई समाधान हेतु सकारात्मक प्रयास करेगी।”
12 महीनों का विस्तार, लेकिन वेतन सिर्फ 8 महीने का! जानिए पूरा गणित
सहायक पुलिसकर्मियों का दर्द सिर्फ नौकरी जाने के डर तक सीमित नहीं है, बल्कि सिस्टम की सुस्ती ने उनकी आर्थिक कमर तोड़ दी है। ग्राउंड जीरो पर पड़ताल करने से एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है, जो प्रशासनिक विफलता को उजागर करती है।
- कागजी विस्तार बनाम जमीनी हकीकत: सरकार हर साल 1 वर्ष (12 महीने) का सेवा विस्तार तो दे देती है, लेकिन उसकी फाइल पास होने में ही 2 से 3 महीने की देरी हो जाती है।
- ड्यूटी से वंचित रहने का दर्द: जब तक एक्सटेंशन की फाइल क्लियर नहीं होती, तब तक इन जवानों को ड्यूटी से वंचित रख दिया जाता है।
- 8 महीने की सैलरी में सालभर का गुजारा: तकनीकी कमियों के कारण जवानों को साल में केवल 8 से 9 महीने ही ड्यूटी करने का मौका मिलता है, जिससे उनका भरण-पोषण और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पूरी तरह प्रभावित हो जाती है।
वर्दी का सम्मान और भरण-पोषण का संकट
झारखंड के 12 जिलों (पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, दुमका, सिमडेगा, गुमला, खूंटी, गिरिडीह, चतरा, लातेहार, गढ़वा, पलामू और लोहरदगा) में उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में इन सहायक पुलिसकर्मियों ने ढाल की तरह काम किया है। बेहद ही अल्प वेतन (मानदेय) पर काम करने वाले इन जवानों को अब मानसिक और आर्थिक तनाव से मुक्ति चाहिए।
संगठन के नेताओं का कहना है कि वे पिछले 9 वर्षों से सरकार से न्याय की आस लगाए बैठे हैं। सरकार को इन अल्प वेतनभोगी जवानों के प्रति सहानुभूति और उदारता दिखाते हुए सम्मानजनक वेतन और स्थाई नीति बनानी चाहिए, ताकि पुलिस की गरिमा और खाकी की वर्दी का सम्मान सुरक्षित रह सके।
निष्कर्ष / What Next?
सिस्टम की परीक्षा और आगे का रास्ता: अगस्त का महीना नजदीक है और सरकार के पास समय बेहद कम है। वित्त मंत्री के आश्वासन के बाद अब गेंद पूरी तरह से हेमंत सोरेन कैबिनेट के पाले में है। अगर सरकार समय रहते कैबिनेट की बैठक में इसके स्थाई समाधान या बिना किसी रुकावट के सेवा विस्तार की नीति पर मुहर नहीं लगाती, तो राज्य के 12 संवेदनशील जिलों की कानून व्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। देखना होगा कि इस रक्षाबंधन पर सरकार इन ‘खाकी वाले भाइयों’ को सुरक्षा का क्या उपहार देती है।











