झारखंड की राजनीति में इस समय भारी उथल-पुथल है। पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक शिबू सोरेन तथा शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन के निधन ने सियासी समीकरणों को गहराई से प्रभावित किया है। इन दोनों कद्दावर नेताओं की गैरमौजूदगी ने न केवल सत्ता संतुलन पर प्रश्नचिह्न लगाया है, बल्कि पार्टी और गठबंधन के भीतर नए समीकरण भी जन्म दिए हैं।
राज्यसभा सीट पर नई स्थिति
गुरुजी के निधन से राज्यसभा की एक सीट खाली हो गई है। हालांकि, चूंकि उनका कार्यकाल अप्रैल 2026 तक ही था और अब सिर्फ कुछ महीनों का समय बचा है, ऐसे में उपचुनाव की संभावना बहुत कम है। यह सीट अब अप्रैल 2026 में होने वाले नियमित चुनाव तक खाली रह सकती है। उस समय राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव होंगे – एक शिबू सोरेन की और दूसरी भाजपा सांसद दीपक प्रकाश की।
मौजूदा विधानसभा समीकरण को देखें तो JMM-कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन के पास 55 विधायक हैं, जबकि बीजेपी और उसके सहयोगी करीब 25 पर सिमटते हैं। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए 28 वोटों की आवश्यकता होती है। ऐसे में साफ संकेत है कि दोनों सीटें गठबंधन के खाते में ही जाएंगी।
जेएमएम के संभावित चेहरे
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि गुरुजी की विरासत किसे मिलेगी। पार्टी के भीतर कई नाम चर्चाओं में हैं।
सीता सोरेन, जो इस समय बीजेपी में हैं, लेकिन दिवंगत दुर्गा सोरेन की पत्नी होने के कारण उनके JMM में वापसी की अटकलें हैं। भावनात्मक जुड़ाव के चलते उनका नाम सामने आ रहा है।
इसके अलावा, पूर्व विधायक कुणाल साड़ंगी, जो हेमंत सोरेन के करीबी हैं, भी मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। पूर्व मंत्री मिथिलेश ठाकुर का नाम भी गंभीरता से लिया जा रहा है क्योंकि वे लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं। वहीं, पार्टी प्रवक्ता विनोद पांडे और सुप्रियो भट्टाचार्य भी सूची में शामिल हैं, लेकिन जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के कारण उनकी संभावना सीमित दिखाई देती है।
कांग्रेस की सीट पर दौड़
गठबंधन समझौते के तहत दूसरी राज्यसभा सीट कांग्रेस को मिलेगी। यहां धीरज साहू की वापसी की चर्चाएं तेज हैं। वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश भी संभावित दावेदारों में शामिल हैं। कांग्रेस के भीतर इस सीट को लेकर खींचतान और रस्साकशी देखने को मिल सकती है।
घाटशिला उपचुनाव और मंत्री पद
रामदास सोरेन के निधन से घाटशिला विधानसभा सीट खाली हो गई है। परंपरा रही है कि दिवंगत मंत्री के परिवार से किसी सदस्य को कैबिनेट में जगह दी जाती है। संभावना जताई जा रही है कि उनके बेटे सोमेश सोरेन को मंत्री बनाया जा सकता है। सोमेश स्थानीय स्तर पर सक्रिय हैं और उनका जनाधार भी मजबूत है।
आगे की सियासत
झारखंड की आने वाली राजनीति पूरी तरह से राज्यसभा चुनाव और उपचुनाव पर टिकी होगी। JMM को यह तय करना है कि गुरुजी की विरासत किसे सौंपी जाए और कांग्रेस अपने दावेदारों में किसे प्राथमिकता देती है। फिलहाल तस्वीर साफ है कि राज्यसभा की दोनों सीटें गठबंधन के खाते में जाएंगी और सोमेश सोरेन की कैबिनेट में एंट्री लगभग तय है।
आगे के महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि परिवारवाद और संगठनात्मक संतुलन के बीच JMM और कांग्रेस कौन-सा रास्ता अपनाते हैं। सत्ता का यह संतुलन ही आने वाले विधानसभा चुनावों पर भी गहरा असर डालेगा।










