RANCHI | झारखंड राज्य गठन के 24 साल बाद एक ऐसा कड़वा सच सामने आया है जिसने राज्य की पूरी कार्यपालिका और नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या झारखंड में आरक्षण केवल कागजों पर है? अनुसूचित जाति-जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ और ‘पढ़ा समन्वय परिषद’ ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि साल 2000 से लेकर अब तक राज्य के सरकारी विभागों और स्वशासी निकायों में ‘आरक्षण रोस्टर रजिस्टर’ का सही पालन ही नहीं किया गया। इसका सीधा असर प्रदेश के लाखों ओबीसी, एसटी और एससी अभ्यर्थियों के भविष्य पर पड़ा है, जो आज भी स्थायी नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
Unreserved या General? एक ‘चिट्ठी’ ने बिगाड़ा खेल
परिसंघ के प्रदेश अध्यक्ष एल.एम. उराव के मुताबिक, विवाद की जड़ बिहार सरकार की 1998 की एक पुरानी चिट्ठी (नंबर 117) है। इसमें ‘अनारक्षित वर्ग’ (Unreserved) की जगह ‘सामान्य वर्ग’ (General) शब्द का इस्तेमाल किया गया था। झारखंड बनने के बाद अधिकारियों ने इसी को आधार बना लिया।
नतीजा यह हुआ कि:
- अनारक्षित सीटों को सिर्फ ‘सामान्य वर्ग’ की जागीर समझ लिया गया।
- नियम के मुताबिक, अगर आरक्षित वर्ग (ST/SC/OBC) का अभ्यर्थी मेरिट में ऊपर है, तो उसे अनारक्षित सीट मिलनी चाहिए, लेकिन झारखंड में उन्हें उनकी कैटेगरी में ही सीमित रखा गया।
- साल 2012 तक सीधी नियुक्तियों में यह भेदभाव चलता रहा, और पदोन्नति (Promotion) में तो आज भी विसंगतियां बरकरार हैं।
RIMS में बड़ा खुलासा: जब ‘जीरो’ वैकेंसी को 88 में बदलना पड़ा
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान रिम्स (RIMS) का एक चौंकाने वाला उदाहरण सामने आया। साल 2019 में नर्स ग्रेड-ए की 362 वैकेंसी निकलीं, जिसमें एसटी (ST) के लिए ‘शून्य’ पद दिखाए गए। जब परिसंघ ने आरटीआई (RTI) के जरिए रोस्टर रजिस्टर निकाला, तो पता चला कि नियमतः वहां 88 पद अनुसूचित जनजाति के बनते थे। भारी दबाव के बाद 2021 में विज्ञापन सुधार कर ये पद वापस दिए गए। यह इस बात का सबूत है कि विभागों में रोस्टर मेंटेन ही नहीं हो रहा है।
प्रमोशन में भी ‘धोखाधड़ी’ का शक? पुलिस विभाग पर गंभीर सवाल
सिर्फ नियुक्तियां ही नहीं, प्रमोशन में भी भारी घालमेल के आरोप हैं।
- पुलिस विभाग: डीओपीटी के आदेशों के बावजूद लंबे समय तक आरक्षित वर्ग को अनारक्षित कोटे में प्रमोशन नहीं मिला।
- 2024 का अपडेट: पहली बार दबाव में 51 डीएसपी के प्रमोशन में 18 एसटी और 9 एससी अधिकारियों को अनारक्षित कोटे में जगह मिली, लेकिन आरोप है कि निचले स्तर (हवलदार पद) पर अब भी एलिजिबल अभ्यर्थियों को ड्रॉप किया जा रहा है।
- EWS का अजब मामला: जहां आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण 2019 में लागू हुआ, वहीं रिम्स और विनोबा भावे यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में दशकों पुराने रिकॉर्ड्स में इसके संकेत मिल रहे हैं, जो भारी प्रशासनिक विसंगति की ओर इशारा करते हैं।
3.5 लाख पद खाली, लेकिन बहाली क्यों नहीं?
झारखंड के सरकारी विभागों में आज केवल 10 से 20 प्रतिशत कर्मचारी ही कार्यरत हैं। मैनपावर की इस भारी कमी के कारण एक अधिकारी पर 5 से 12 विभागों का बोझ है।
- भ्रष्टाचार का रास्ता: रोस्टर रजिस्टर अपडेट न होने से स्थायी बहाली नहीं हो रही, जिससे बैकडोर एंट्री और ‘बंधुआ मजदूरी’ जैसी अनुबंध नियुक्तियों को बढ़ावा मिल रहा है।
- सिस्टम फेल्योर: बोकारो और हजारीबाग ट्रेजरी में हुए फ्रॉड इसी मैनपावर की कमी का नतीजा माने जा रहे हैं।
क्या विधानसभा की विशेष समिति करेगी जांच?
बाबा कार्तिक उराव ने कहा था— “न्याय कोई देता नहीं, लेना पड़ता है।” इसी तर्ज पर अब पढ़ा समन्वय परिषद और परिसंघ ने मुख्यमंत्री, राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष से गुहार लगाई है। मांग स्पष्ट है: विधानसभा की एक विशेष समिति बने, जो साल 2000 से अब तक के रोस्टर रजिस्टर की जांच करे और 3.5 लाख रिक्त पदों पर न्यायसंगत बहाली सुनिश्चित करे। यदि सरकार अब भी नहीं जागती, तो झारखंड के युवाओं का आक्रोश सड़कों पर दिखना तय है।









