Ranchi | झारखंड की सियासत में ‘अवैध घुसपैठ’ के मुद्दे पर एक बार फिर भूचाल आ गया है। केंद्र सरकार द्वारा घुसपैठ की जांच के लिए कमेटी बनाने और भाजपा की ओर से सीमावर्ती जिलों में डिटेंशन सेंटर खोलने की मांग पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बेहद तल्ख तेवर दिखाए हैं। मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि यह सब सिर्फ महंगाई और बेरोजगारी जैसे असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की क्रोनोलॉजी है।
प्रोजेक्ट भवन में मीडिया से बातचीत के दौरान सीएम हेमंत सोरेन के चेहरे पर तल्खी साफ दिख रही थी। उन्होंने सीधे केंद्र की भाजपा सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सवाल दागा कि 2014 से लगातार घुसपैठ का शोर मचाने वाली भाजपा बताए कि इतने सालों में इसका नतीजा क्या निकला?

‘असम में खूब शोर मचाया, वहां क्या हुआ?’ – मैदान से लाइव रिपोर्ट
प्रोजेक्ट भवन के गलियारों में आज सुबह से ही हलचल तेज थी। जैसे ही मुख्यमंत्री मीडिया के कैमरों के सामने आए, उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे केंद्र की नीतियों पर प्रहार शुरू कर दिया।
भाजपा के डिटेंशन सेंटर वाले बयान पर तंज कसते हुए सोरेन ने कहा,
“असम में भी इस मुद्दे पर खूब शोर मचाया गया था, लेकिन वहां आखिरकार क्या हुआ? डिटेंशन सेंटर कोई नई बात नहीं है, यह पहले भी खुले हैं। लेकिन अब भाजपा की मंशा क्या है? क्या ये सीमावर्ती जिलों के अलावा अब रांची और राज्य की हर पंचायत में डिटेंशन सेंटर खोलेंगे?”
इस बयान के बाद झारखंड के राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। ग्राउंड जीरो पर मौजूद विश्लेषकों का मानना है कि सीएम ने इस बयान के जरिए आदिवासियों और मूलवासियों के बीच भाजपा के नैरेटिव को काउंटर करने की कोशिश की है।
“घुसपैठ रोकना केंद्र का काम, अपनी नाकामी हम पर क्यों मढ़ रहे?”
मुख्यमंत्री ने पत्रकारिता की तय सीमाओं के भीतर रहते हुए एक बड़ा तकनीकी और संवैधानिक मुद्दा भी उठाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर सीमा पार से कोई अवैध गतिविधि या घुसपैठ हो रही है, तो वह निश्चित रूप से गलत है।
लेकिन, इसके साथ ही उन्होंने केंद्र को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाते हुए कहा:
- अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा पूरी तरह केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों के हाथ में है।
- अगर घुसपैठ हो रही है, तो यह केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों की विफलता है।
- अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर राज्य सरकार पर ठीकरा फोड़ना सिर्फ राजनीति है।
महंगाई और डीजल-पेट्रोल पर घेरा: “झारखंड के मूलवासी गुजरात के नहीं हैं”
हेमंत सोरेन सिर्फ घुसपैठ के मुद्दे पर ही नहीं रुके, बल्कि उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर भी केंद्र को बुरी तरह घेरा। सीएम ने कहा कि आज देश में महंगाई, बेरोजगारी और पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतें सबसे बड़े संकट हैं, लेकिन इन पर कोई बात नहीं करना चाहता।
उन्होंने तीखा हमला बोलते हुए कहा,
“हम खुद को विश्वगुरु कहते हैं, दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्था बनने का दावा करते हैं, लेकिन हकीकत सबके सामने है। सस्ते दाम पर कच्चा तेल बेचने वाले देशों से ईंधन खरीदने में इन्हें क्या दिक्कत आ रही है, इस पर कोई मुंह नहीं खोलता।”
आर्टिकल के इस मोड़ पर सोरेन ने ‘झारखंडी अस्मिता’ का कार्ड खेलते हुए साफ कह दिया कि हर राज्य और समाज की जरूरतें अलग होती हैं। झारखंड के मूलवासी गुजरात के नहीं हैं। उनकी सरकार यहां के जल-जंगल-जमीन और स्थानीय लोगों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाती है, जबकि केंद्र सरकार कुछ खास उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने में व्यस्त है।
निष्कर्ष: क्या होगा अगला कदम? (What Next)
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस कड़े रुख से साफ है कि आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में स्थानीयता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा और गरमाने वाला है। जहां एक तरफ केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति झारखंड के डेमोग्राफिक चेंज की जांच को आगे बढ़ाएगी, वहीं राज्य की सत्तारूढ़ जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन सरकार इसे ‘झारखंड विरोधी’ और मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने वाली साजिश करार देकर जनता के बीच जाएगी। अब देखना यह है कि प्रशासन और राजनीतिक दल इस टकराव के बीच आम जनता की बुनियादी जरूरतों को कितना तरजीह देते हैं।
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