Ranchi | झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने हर किसी को चौंका दिया है। सत्ताधारी महागठबंधन के दावों के विपरीत वोटिंग के दौरान ऐसी सेंधमारी हुई कि कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा को करारी हार का सामना करना पड़ा। वहीं, एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार नाथवानी ने बाजी मार ली है।
इस चुनावी नतीजे के बाद रांची से लेकर दिल्ली तक सियासी भूचाल आ गया है। विधानसभा के भीतर हुई इस स्मार्ट क्रॉस वोटिंग ने गठबंधन के भीतर फैले अविश्वास को सार्वजनिक कर दिया है, जिसके बाद अब कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

प्रणव झा की हार के 3 बड़े कारण: कहाँ चूका महागठबंधन?
ग्राउंड जीरो से मिल रही रिपोर्ट और राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस चुनाव में कांग्रेस की रणनीति पूरी तरह फेल साबित हुई। मुख्य रूप से तीन कारणों ने प्रणव झा की हार की कहानी लिखी:
1. गोलबंद नहीं रहे विधायक और कमजोर घेराबंदी
महागठबंधन अपने विधायकों को एकजुट रखने में पूरी तरह नाकाम रहा। चुनाव से पहले विपक्ष की तरह न तो कोई ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ दिखी और न ही विधायकों पर कोई कड़ा पहरा था। इसी ढिलाई का पूरा फायदा एनडीए समर्थित खेमे ने उठा लिया।
2. झामुमो का ‘सेफ गेम’ और कांग्रेस से दूरी
झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने अपने उम्मीदवार बैजनाथ राम को सुरक्षित करने के चक्कर में पूरी ताकत लगा दी। बैजनाथ राम को जरूरत से 2 ज्यादा यानी कुल 30 वोट दिला दिए गए, जिसके कारण सहयोगी कांग्रेस के खाते में जाने वाले वोट कट गए।
3. अमान्य वोटों का गहरा रहस्य
वोटिंग के दौरान 3 वोट अमान्य (रिजेक्ट) हो गए। गलियारों में चर्चा है कि यह कोई गलती नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट क्रॉस वोटिंग’ का हिस्सा था, जिसे महागठबंधन के ही कुछ विधायकों ने जानबूझकर अंजाम दिया ताकि व्हिप की कार्रवाई से भी बचा जा सके।
शक के दायरे में राजद और माले: 6 रहस्यमयी वोटों का गणित
भास्कर इनसाइट के मुताबिक, जीत के लिए जादुई आंकड़ा 28 वोटों का था। निर्दलीय प्रत्याशी नाथवानी के पास एनडीए के घोषित केवल 24 वोट थे। लेकिन जब बक्सा खुला तो उनके खाते में उम्मीद से ज्यादा यानी पूरे 30 वोट निकले। दो वोट अमान्य होने के बाद भी वह 28 का आंकड़ा छूकर जीत गए।
अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि महागठबंधन के कुनबे से खिसके वे 6 माननीय कौन हैं, जो बैठे तो सरकार के पाले में थे लेकिन दिल नाथवानी से लगा बैठे? फिलहाल शक की सूई राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के 4 वोटों और भाकपा माले के 2 विधायकों के इर्द-गिर्द घूम रही है।
दिल्ली में किरकिरी और भाजपा की रणनीति की जीत
इस परिणाम का असर झारखंड की राजनीति पर लंबे समय तक दिखने वाला है:
- दिल्ली आलाकमान को झटका: प्रणव झा की इस हार से दिल्ली में कांग्रेस की भारी किरकिरी हुई है और प्रदेश नेतृत्व पर गाज गिरना तय माना जा रहा है।
- नाथवानी का कॉर्पोरेट मैनेजमेंट: सत्ताधारी गठबंधन में सेंध लगाकर 28 वोट पा जाना नाथवानी के मजबूत पॉलिटिकल और कॉर्पोरेट नेटवर्किंग की बड़ी जीत है।
- भाजपा का मास्टरस्ट्रोक: भाजपा ने अपना प्रत्याशी न उतारकर नाथवानी को समर्थन दिया और अपनी अचूक रणनीति को एक बार फिर सही साबित कर दिखाया।
हॉर्स-ट्रेडिंग के आरोपों के बीच अब क्या होगा?
मुख्यमंत्री की मौजूदगी में दो दिन तक मॉक पोल होने के बावजूद वोट अमान्य कैसे हो गए, यह इंटेलिजेंस फेल्योर है या सोची-समझी मिलीभगत? झारखंड में एक बार फिर पैसा और पावर का खेल चलने के आरोप लग रहे हैं। अब देखना यह है कि इस दाग को साफ करने और बिखरते कुनबे को बचाने के लिए महागठबंधन का अगला कदम क्या होता है।
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