Ranchi | झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने हेमंत सोरेन सरकार द्वारा अधिसूचित नई ‘पेसा नियमावली’ (PESA Rules) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भाजपा प्रदेश कार्यालय में एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए उन्होंने इसे आदिवासी अधिकारों के साथ धोखा और पेसा एक्ट की मूल आत्मा पर कुठाराघात बताया है।
हेमंत सरकार की पेसा नियमावली पर भाजपा का हमला
अर्जुन मुंडा ने राज्य सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि लंबे संघर्ष और अदालती हस्तक्षेप के बाद कैबिनेट से जो नियमावली पास होकर आई है, वह निराशाजनक है। उन्होंने कड़े शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा, “हेमंत सरकार ने पेसा नियमावली के जरिए एक्ट के मूल विषय का एक प्रकार से ‘कोल्ड ब्लडेड मर्डर’ (Cold Blooded Murder) करने का प्रयास किया है।”
मुंडा ने आरोप लगाया कि यह नियमावली पन्नों की संख्या में भले ही बड़ी है, लेकिन ‘भाव’ के मामले में शून्य है। सरकार ने जानबूझकर आदिवासी समाज के पारंपरिक स्वशासन की व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश की है।
‘ग्राम सभा’ की परिभाषा से छेड़छाड़ का आरोप
अर्जुन मुंडा ने नियमावली की तकनीकी खामियों को उजागर करते हुए सबसे बड़ा सवाल ‘ग्राम सभा’ की परिभाषा पर उठाया। उनके अनुसार:
- केंद्रीय एक्ट बनाम राज्य नियम: पेसा एक्ट 1996 (PESA Act 1996) में ग्राम सभा को रूढ़िजन्य विधि, धार्मिक प्रथाओं और पारंपरिक व्यवस्थाओं के आधार पर परिभाषित किया गया है।
- परिभाषा का लोप: मुंडा का दावा है कि झारखंड सरकार की नियमावली में 1996 के एक्ट वाली परिभाषा को छुपा दिया गया है और प्रस्तावना में केवल ‘परंपरा’ की बात कहकर खानापूर्ति की गई है।
- अन्य राज्यों से तुलना: देश के जिन 9 अन्य राज्यों में पेसा एक्ट लागू है, वहां ग्राम सभा की परिभाषा केंद्रीय एक्ट के अनुरूप ही रखी गई है, लेकिन झारखंड में इसे बदल दिया गया है।
आदिवासी अस्मिता और चरित्र बदलने का प्रयास
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी रूढ़िवादी व्यवस्था और स्वशासन से है, जो आदिकाल से चली आ रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने “दिमाग लगाकर” आदिवासी समाज के इस चारित्रिक पहचान को बदलने का प्रयास किया है।
मुंडा ने कहा, “जिस तरह व्यक्ति की पहचान उसके परिवार से होती है, वैसे ही जनजाति समाज की पहचान उसकी परंपराओं से है। लेकिन यह सरकार आदिवासियों के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन है।”
देर से बनी, लेकिन दुरुस्त नहीं बनी
भाजपा नेता ने कहा कि झारखंड में पेसा नियमावली की मांग लंबे समय से हो रही थी। जनता ने सरकार को बाध्य किया, लोग कोर्ट तक गए, लेकिन जो परिणाम सामने आया वह ‘देर आए दुरुस्त आए’ की कहावत पर भी खरा नहीं उतरा।
उन्होंने आशंका जताई कि इस अस्पष्ट नियमावली का फायदा उठाकर प्रशासन और संस्थाएं अपने हिसाब से व्याख्या करेंगी। इससे शासन तंत्र का संस्थागत विकास धराशायी हो जाएगा और भविष्य में यह आदिवासी समाज के लिए बड़ा संकट पैदा करेगा।
आगे क्या? (राजनीतिक मायने)
अर्जुन मुंडा के इस बयान के बाद झारखंड की राजनीति में उबाल आना तय माना जा रहा है। भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस मुद्दे को सड़क से लेकर सदन तक उठाएगी। इस प्रेस वार्ता में उनके साथ प्रदेश महामंत्री डॉ. प्रदीप वर्मा, मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक और अन्य पदाधिकारी भी मौजूद थे। अब देखना यह होगा कि हेमंत सरकार इन तकनीकी और राजनीतिक आरोपों का क्या जवाब देती है।
निष्कर्ष
अर्जुन मुंडा का यह बयान स्पष्ट करता है कि भाजपा पेसा नियमावली को आगामी चुनावों और आदिवासी विमर्श का मुख्य मुद्दा बनाने जा रही है। ‘कोल्ड ब्लडेड मर्डर’ जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।








