हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू: एक थकी हुई हंसी की कोशिश

हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू: एक थकी हुई हंसी की कोशिश

भूमिका: क्या ‘हाउसफुल 5’ अपने नाम को जस्टिफाई कर पाई?

हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू को लेकर दर्शकों में खासा उत्साह था। यह फ़िल्म एक मशहूर कॉमेडी फिल्म फ्रैंचाइज़ी की अगली कड़ी है, जिसमें फिर से वही गड़बड़झाले, हास्य, और सितारों की चमक देखने को मिलती है। लेकिन इस बार, यह चमक दर्शकों की आंखों को चौंकाने में नाकाम रही।

जहां दर्शकों को उम्मीद थी कि हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू एक और मजेदार यात्रा पर ले जाएगी, वहीं यह फिल्म पुरानी चुटकुलों की पुनरावृत्ति, कमजोर पटकथा, और थकी हुई कॉमिक टाइमिंग के कारण अपनी पकड़ खो बैठती है।

कहानी और स्क्रिप्ट: हंसी के पीछे बिखरती स्क्रिप्ट

हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू में कहानी एक बार फिर पहचान की गड़बड़ी, शादी-ब्याह की गलतफहमी, और अजीब परिस्थितियों के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन इस बार, न तो इन परिस्थितियों में कोई नयापन है और न ही चुटकुलों में कोई ताजगी।

पटकथा कमजोर, बिखरी हुई और दोहराव से भरी हुई लगती है। कई जगह ऐसा लगता है जैसे संवाद सिर्फ हंसी खींचने के लिए घुसेड़े गए हैं – वो भी बिना किसी प्रभाव के

  • फोकस कीवर्ड “हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू” के लिहाज़ से देखा जाए, तो स्क्रिप्ट शून्य इनोवेशन और बिना गहराई वाले किरदारों की शिकार है।
कहानी और स्क्रिप्ट: हंसी के पीछे बिखरती स्क्रिप्ट

निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी: भव्यता में छिपी दिशाहीनता

तरुण मनसुखानी, जो इससे पहले “स्टूडेंट ऑफ द ईयर” जैसी फिल्मों से खुद को साबित कर चुके हैं, इस बार हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू में अपनी पकड़ बनाए नहीं रख सके।

  • उन्होंने भव्य सेट्स, विदेशी लोकेशन्स और कलरफुल सिनेमैटोग्राफी के ज़रिये एक दर्शनीय अनुभव देने की कोशिश की, लेकिन जब तक कहानी और निर्देशन में तालमेल न हो, तब तक सिर्फ दृश्य सौंदर्य से फिल्म नहीं चलती।
  • फिल्म की एडिटिंग भी कई जगह बेतरतीब लगती है, जहां सीन जबरदस्ती जोड़े गए हैं।

अभिनय: सितारे दमकते हैं पर चिंगारी नहीं दिखती

हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू में मुख्य कलाकारों की फेहरिस्त काफ़ी बड़ी और प्रभावशाली है – अक्षय कुमार, रितेश देशमुख, अभिषेक बच्चन, चंकी पांडे, और अन्य कई नाम।

🔹 अक्षय कुमार

उनकी कॉमिक टाइमिंग अभी भी काफ़ी हद तक प्रभावी है। लेकिन जब स्क्रिप्ट कमज़ोर हो, तो कोई भी कलाकार दर्शकों को ज़्यादा देर तक नहीं बांध सकता।

🔹 रितेश देशमुख

अपने किरदार को ईमानदारी से निभाते हैं, लेकिन पुराने हावभाव और एक्सप्रेशन्स को ही दोहराते नज़र आते हैं।

🔹 अभिषेक बच्चन

उनकी वापसी दिलचस्प हो सकती थी, लेकिन उनके किरदार को न तो स्क्रिप्ट में जगह मिली और न ही स्क्रीन टाइम।

🔹 चंकी पांडे

“आखरी पास्ता” का किरदार अब थका हुआ मज़ाक बन गया है – वो मज़ा अब नहीं आता जो पहली फिल्मों में था।

म्यूज़िक और बैकग्राउंड स्कोर: कोई नई धुन नहीं

हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू के गानों में न तो कोई यादगार लिरिक्स हैं, और न ही कोई ऐसा ट्रैक जो आप फिल्म से बाहर आकर गुनगुनाएं।

  • बैकग्राउंड स्कोर भी सामान्य है और कहानी को कोई भावनात्मक गहराई नहीं देता।
  • अगर हम पिछले हिस्सों की बात करें तो “Papa Toh Band Bajaye” या “Dhanno” जैसे गाने लोगों की ज़ुबां पर थे, लेकिन हाउसफुल 5 के गाने उत्साहहीन और औसत दर्जे के हैं।

फिल्म की कमियां: हंसी जब बन जाए मजबूरी

हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू की सबसे बड़ी कमी है उसका कॉमेडी के नाम पर सिर्फ़ शोरगुल पैदा करना।

कमज़ोरियां इस प्रकार हैं:

  • स्क्रिप्ट में नयापन नहीं
  • किरदारों की गहराई गायब
  • पुरानी फिल्मों की नकल
  • क्लाइमैक्स बेहद सतही
  • हंसी के लिए बनाए गए सीन बोरिंग
  • महिला किरदारों का उपयोग सिर्फ ग्लैमर के लिए
फिल्म की कमियां: हंसी जब बन जाए मजबूरी

हाउसफुल ब्रांड की गिरती विश्वसनीयता

इस फ्रैंचाइज़ी ने पहले तीन हिस्सों में काफी मनोरंजन दिया था। लेकिन चौथा और अब हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू साबित करता है कि ब्रांड का नाम ही काफी नहीं होता

  • कॉमेडी अब भीड़ में खो गई है
  • स्क्रिप्ट अब फॉर्मूला-बेस्ड हो गई है
  • रचनात्मकता की जगह बॉक्स ऑफिस के फॉर्मूले ने ले ली है

बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन: नाम बड़ा, काम फीका

पहले दिन की कमाई से ज़ाहिर है कि फिल्म ने ओपनिंग तो अच्छी ली, लेकिन माउथ ऑफ वर्ड और सोशल मीडिया रिएक्शन से इसका ग्राफ गिरता गया।

  • सोशल मीडिया रिव्यूज़ ने फिल्म को “टाइम वेस्ट” बताया
  • IMDb स्कोर अब तक सिर्फ़ 4.1/10 है
  • सिनेमाघरों में भी दर्शकों की संख्या में गिरावट आई है
बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन: नाम बड़ा, काम फीका

हाउसफुल नहीं, खालीपन ज़्यादा

हाउसफुल 5 मूवी रिव्यू एक ऐसा अनुभव है जो ज्यादा उम्मीदों के साथ शुरू होता है, लेकिन अंत तक आते-आते थकान और बोरियत में बदल जाता है।

कॉमेडी का मतलब सिर्फ़ चेहरे बनाना और ऊँची आवाज़ में चिल्लाना नहीं होता। स्क्रिप्ट, डायलॉग्स और किरदारों में जब तक मौलिकता नहीं होगी, तब तक ये फ्रैंचाइज़ी अपने गौरवशाली अतीत को नहीं दोहरा पाएगी

Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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