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हेमंत का ‘हल्ला बोल’: पीएम मोदी को चिट्ठी लिखी, क्या 2027 में ‘सरना’ के बॉक्स पर टिक मारेंगे आदिवासी?

Ranchi | झारखंड की राजनीति में जब भी सन्नाटा छाने लगता है, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कोई न कोई ऐसी गुगली फेंकते हैं कि दिल्ली तक के फील्डर पसीने छोड़ने लगते हैं। इस बार सोरेन ने अपनी पुरानी ‘सरना धर्म कोड‘ वाली तलवार की धार तेज की है और सीधा पत्र भेज दिया है—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को।

मतलब साफ़ है, सोरेन ने कह दिया है कि “साहब, 2027 की जनगणना में अगर आदिवासियों को अलग कॉलम नहीं मिला, तो फिर बात जमने वाली नहीं है!”

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क्या है ये ‘सरना धर्म कोड’ वाली लड़ाई?

असल में सारा खेल उस छोटे से ‘फॉर्म’ का है जो जनगणना के वक्त आपके घर आता है। अभी तक आदिवासियों को धर्म वाले कॉलम में या तो ‘हिंदू’ लिखना पड़ता है या फिर ‘अन्य’ (Others)। हेमंत सोरेन का कहना है कि “भाई, हम न तो अन्य हैं और न ही कहीं फिट हो रहे हैं, हमारा अपना ‘सरना’ धर्म है, तो हमें अलग डिब्बा (Code) क्यों नहीं देते?”

हेमंत सोरेन का लॉजिक: जब हम डिजिटल इंडिया में रॉकेट उड़ा रहे हैं, तो जनगणना के सॉफ्टवेयर में एक ‘सरना’ नाम का बटन जोड़ना कौन सा रॉकेट साइंस है?

50 लाख लोगों का ‘स्वैग’ और 2011 का वो आंकड़ा

हेमंत सोरेन ने अपनी चिट्ठी में एक बड़ा मजेदार फैक्ट याद दिलाया है। उन्होंने कहा कि 2011 में जब कोई आधिकारिक कोड था ही नहीं, तब भी देश के 50 लाख आदिवासियों ने अपनी मर्जी से फॉर्म पर पेन चलाकर ‘सरना’ लिख दिया था।

आदिवासियों का कहना है कि “हम न मंदिर जाते हैं, न मूर्ति पूजते हैं। हम तो पेड़, पहाड़ और नदियों के भक्त हैं।” अब प्रकृति की पूजा करने वालों को आप किसी और कैटलॉग में कैसे डाल सकते हैं?

राष्ट्रपति मुर्मु को याद दिलाया ‘घर’ का रिश्ता

सोरेन ने इस बार इमोशनल कार्ड भी बहुत सलीके से खेला है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखते हुए याद दिलाया कि वह खुद इसी समाज और मिट्टी से आती हैं। सोरेन का इशारा साफ है—”अब तो अपनी वाली राष्ट्रपति हैं, अब हक नहीं मिलेगा तो कब मिलेगा?”

दिल्ली की टेंशन क्यों बढ़ी? (Analysis)

  1. सटीक निशाना: झारखंड में 26% आदिवासी वोट बैंक है। सरना कोड की मांग पर ना बोलना बीजेपी के लिए “आग का दरिया” पार करने जैसा है।
  2. 2027 का काउंटडाउन: जनगणना 2027 में होनी है, और सोरेन ने अभी से पिच तैयार कर दी है ताकि चुनाव तक यह मुद्दा गर्म रहे।
  3. आदिवासी अस्मिता: यह मुद्दा अब सिर्फ झारखंड का नहीं, बल्कि देश के 21 राज्यों तक फैल चुका है।

अब आगे क्या होगा? (Conclusion)

हेमंत सोरेन ने गेंद प्रधानमंत्री के पाले में डाल दी है। अब देखना ये है कि क्या दिल्ली से “मंजूरी की मुहर” लगती है या फिर यह मुद्दा एक बार फिर फाइलों के नीचे दब जाता है। लेकिन एक बात तो तय है—झारखंड की राजनीति में ‘सरना कोड’ का ये शॉट बाउंड्री के पार जाने के लिए खेला गया है!

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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