रांची/धनबाद: झारखंड में अवैध कोयला कारोबार के काले साम्राज्य को किसका संरक्षण मिला हुआ था? इस बड़े सवाल से पर्दा अब धीरे-धीरे हटने लगा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ताबड़तोड़ छापेमारी में एक ऐसी खौफनाक डायरी और दस्तावेज हाथ लगे हैं, जिसने पूरे प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है।
मिली जानकारी के मुताबिक, कोयला कारोबारियों के ठिकानों से 25 पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को हर महीने ‘लाखों रुपये’ की बंधी-बंधाई रकम (मासिक रिश्वत) पहुंचाने का कच्चा-चिट्ठा मिला है। इस खुलासे के बाद अब कई बड़े साहबों की रातों की नींद उड़ गई है।
नाम नहीं, पदनाम दर्ज: छोटे अफसर को हजार, बड़े को लाखों!
सूत्रों के मुताबिक, रेड के दौरान जब्त डायरी में अधिकारियों के सीधे नाम दर्ज नहीं हैं, बल्कि उनके ‘पदनाम’ (Designations) लिखे गए हैं। यह पूरी सूची किसी कॉरपोरेट पे-रोल की तरह तैयार की गई थी, जिसमें पद के हिसाब से रिश्वत का रेट तय था।
- छोटे अधिकारी: 20,000 रुपये से 50,000 रुपये प्रति माह।
- बड़े अधिकारी: लाखों रुपये प्रति माह की फिक्स बंधी-बंधाई रकम।
इन दस्तावेजों में धनबाद के अलावा झारखंड के उन अन्य जिलों के अफसरों के पदनाम भी शामिल हैं, जिन रास्तों से होकर अवैध कोयले से लदे ट्रक गुजरते थे। यानी काले कारोबार को बेखौफ चलाने के लिए पूरे रूट पर “ग्रीन कॉरिडोर” तैयार किया गया था।
160 करोड़ का म्यूचुअल फंड निवेश और 200 से अधिक सेल डीड
उल्लेखनीय है कि ED ने 28 जुलाई को धनबाद के डिप्टी मेयर, अरुण चौहान, उनके भाई हरेंद्र चौहान, चर्चित कोयला कारोबारी एलबी सिंह के साले रंजीत कुमार सिंह, महेंद्र सिंह, रोहित यादव, गणेश यादव और माधव सिंह समेत कई करीबियों के ठिकानों पर एक साथ छापा मारा था।
छापेमारी के दौरान केवल रिश्वत की लिस्ट ही नहीं, बल्कि काली कमाई को सफेद करने का बड़ा नेटवर्क पकड़ा गया है। ईडी को मौके से 160 करोड़ रुपये का म्यूचुअल फंड निवेश और 200 से अधिक बेनामी संपत्ति के सेल डीड मिले हैं।
सरकारी रिपोर्ट भी कारोबारियों की जेब में!
सब्सटेंशियल सबूतों के बीच सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब ED को कारोबारियों के ठिकानों से सरकारी जांच एजेंसियों की कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट्स भी बरामद हुईं।
इन रिपोर्ट्स में अवैध कोयला कारोबार की अंदरूनी जानकारी और कुछ छोटे व्यापारियों के नाम दर्ज थे। लेकिन हैरत की बात यह है कि सिंडिकेट चलाने वाले बड़े और चर्चित कोयला माफियाओं के नाम इन सरकारी रिपोर्टों से पूरी तरह गायब या नगण्य थे। इससे साफ जाहिर होता है कि सरकारी एजेंसियों की जांच रिपोर्ट भी इन्हीं माफियाओं के इशारे पर मैनेज की जा रही थी।
ED अब इन जब्त पदनामों और कोडवर्ड्स का मिलान संबंधित जिलों के तत्कालीन पदस्थापित अधिकारियों की सूची से कर रही है। बहुत जल्द इस ‘पे-रोल सिंडिकेट’ में शामिल अधिकारियों को समन भेजकर पूछताछ के लिए रांची दफ्तर बुलाया जा सकता है। कोयलांचल से शुरू हुई यह आंच अब राज्य के कई बड़े नौकरशाहों के दरवाजों तक पहुँचने वाली है।











