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Jharkhand News

कुड़मी आदिवासी पहचान की लड़ाई और रेल टेका आंदोलन

झारखंड, बंगाल और उड़ीसा में कुड़मी समाज लंबे समय से अपनी आदिवासी पहचान की मांग को लेकर आंदोलनरत है। उनका मानना है कि इतिहास और संस्कृति दोनों ही स्पष्ट करते हैं कि कुड़मी समुदाय आदिवासी है, लेकिन सरकार और कई आदिवासी संगठन उन्हें मान्यता देने से बचते रहे हैं। इसी संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए 20 सितंबर से एक बड़े पैमाने पर रेल टेका आंदोलन की घोषणा की गई है।

कुड़मी समाज का तर्क – हम आदिवासी क्यों हैं?

कुड़मी समाज का कहना है कि उनकी संस्कृति, त्यौहार और भाषा आदिवासी परंपराओं से गहराई से जुड़ी हैं। सोहराई, कर्म, टूसू जैसे पर्व न केवल संथाल, मुंडा या उरांव मानते हैं, बल्कि कुड़मी भी इन त्योहारों को पीढ़ियों से मनाते आए हैं। दरअसल, इन पर्वों की जड़ें कुड़मी समाज से ही जुड़ी बताई जाती हैं।

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इतिहास की ओर देखें तो 1885 से 1891 के बीच एच.एच. रिजले ने पहला एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे किया था, जिसमें विभिन्न समुदायों की पहचान दर्ज की गई थी। 1913 में भारत सरकार के होम डिपार्टमेंट ने 13 जनजातियों को इंडियन सक्सेशन एक्ट से बाहर रखा था, जिनमें कुड़मी भी शामिल थे। इस आधार पर कुड़मी समाज का दावा है कि वे शुरू से ही आदिवासी पहचान रखते हैं।

आदिवासी संगठनों की आपत्ति

कई आदिवासी संगठन यह तर्क देते हैं कि कुड़मी हिंदू धर्म से जुड़े हैं और इसलिए उन्हें आदिवासी मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, कुड़मी नेताओं का कहना है कि यह पूरी तरह गलत है, क्योंकि झारखंड के गांवों में कुड़मी और अन्य आदिवासी समुदाय एक साथ रहते आए हैं, एक ही देवस्थानों पर पूजा करते हैं और एक जैसी परंपराएं निभाते हैं।

रेल टेका आंदोलन – पहचान की जंग

कुड़मी समाज ने ऐलान किया है कि अगर 20 सितंबर तक उनकी मांगों पर सरकार बातचीत नहीं करती है, तो झारखंड, बंगाल और उड़ीसा में 100 से अधिक जगहों पर ट्रेनें रोकी जाएंगी। आंदोलन का मकसद है कि केंद्र और राज्य सरकारें कुड़मियों को आधिकारिक रूप से एसटी सूची में शामिल करें

यह आंदोलन पहले भी कई बार हो चुका है, लेकिन इस बार इसका दायरा बड़ा होगा। कुड़मी समाज का कहना है कि यह सिर्फ राजनीतिक लड़ाई नहीं है बल्कि उनकी अस्तित्व और पहचान की लड़ाई है।

रेल टेका आंदोलन – पहचान की जंग

राजनीतिक दलों पर सवाल

कुड़मी नेताओं ने साफ कहा है कि वे केवल उन नेताओं को समाज का असली प्रतिनिधि मानेंगे जो खुलकर रेल टेका आंदोलन का समर्थन करेंगे। उनका मानना है कि चाहे बीजेपी हो, जेएमएम हो या आजसू – सभी पार्टियों में कुड़मी विधायक रहे हैं, लेकिन किसी ने कुड़मी समाज को आदिवासी दर्जा दिलाने के लिए निर्णायक पहल नहीं की।

कुड़मी युवाओं से अपील

आंदोलन के नेताओं ने झारखंड, बंगाल और उड़ीसा के युवाओं से अपील की है कि वे राजनीतिक दलों के बहकावे में न आएं और समाज की तीन बड़ी मांगों के लिए एकजुट हों –

  1. कुर्माली भाषा को प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षा में शामिल करना।
  2. कुर्माली भाषा को आठवीं अनुसूची में मान्यता दिलाना।
  3. कुड़मी समाज को शेड्यूल ट्राइब की सूची में शामिल करना।

निष्कर्ष

कुड़मी समाज का आंदोलन सिर्फ पहचान की बहस नहीं है, बल्कि यह उनकी संस्कृति, भाषा और अस्तित्व की सुरक्षा की लड़ाई है। 20 सितंबर का रेल टेका आंदोलन यह साबित करेगा कि यह केवल नेताओं का नहीं बल्कि आम कुड़मी जनता का आंदोलन है।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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