भारत के स्वाधीनता संग्राम में जब भी आजादी की पहली चिंगारी की बात होती है, तो अक्सर इतिहास के पन्ने 1857 से शुरू किए जाते हैं। लेकिन सच यह है कि उससे करीब 90 साल पहले ही झारखंड के जंगलों से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका जा चुका था।
यह माटी केवल प्राकृतिक संपदा से समृद्ध नहीं है, बल्कि यहां के वीरों ने अपने खून से देश की आजादी की मजबूत इबारत लिखी है। ‘जल, जंगल, जमीन’ और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए झारखंड के लड़ाकों ने सीधे अंग्रेजी तोपों का मुकाबला पारंपरिक तीर-धनुष से किया।
जंग-ए-आजादी में झारखंड का योगदान ऐसा गौरवशाली अध्याय है, जिसने विदेशी हुकूमत को बार-बार यह अहसास कराया कि इस सरजमीं को कभी गुलाम नहीं बनाया जा सकता। आइए जानते हैं उस अनकही दास्तान को, जिसने अंग्रेजी सल्तनत की चूलें हिला दी थीं।
जब 1767 में गूंजा पहला विद्रोह: ढालभूम से शुरू हुई बगावत
ईस्ट इंडिया कंपनी जब बंगाल और बिहार के दीवानी अधिकार हासिल करने के बाद झारखंड के जंगलों में दाखिल होने लगी, तो उन्हें सबसे पहले तीखे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। 1767 में ढालभूम के राजा जगन्नाथ ढाल ने कंपनी को लगान देने से साफ इनकार कर दिया।
अंग्रेजों ने इसे मामूली बगावत समझा, लेकिन यह आंदोलन पूरे 10 वर्षों (1767 से 1777) तक चला। अंग्रेजों को आखिरकार पीछे हटना पड़ा और जगन्नाथ ढाल को दोबारा राजा स्वीकार करना पड़ा। यह भारतीय उपमहाद्वीप में औपनिवेशिक विस्तार के खिलाफ शुरुआती संगठित जीतों में से एक थी।
इसके तुरंत बाद छोटानागपुर के पठारी इलाकों में ‘चुआड़ विद्रोह’ (1769–1805) की ज्वाला भड़की। रघुनाथ महतो, श्याम गंजन और सुबल सिंह जैसे नायकों ने जंगलों की घेराबंदी कर अंग्रेजी सेना की रसद लाइनें काट दीं। इसी दौर में रघुनाथ महतो का वह ऐतिहासिक नारा गूंजा—“अपना गांव, अपना राज, दूर भगाओ बिदेसी राज।”
बाबा तिलका मांझी: जिन्होंने 1784 में अंग्रेजी अफसर को ढेर किया
1857 के सिपाही विद्रोह से 73 साल पहले संथाल परगना के जंगलों में एक ऐसा महानायक उठ खड़ा हुआ, जिसने ब्रिटिश कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड को दिनदहाड़े अपने तीर का निशाना बनाकर मार गिराया। उनका नाम था—बाबा तिलका मांझी (तिलका मुर्मू)।

तिलका मांझी ने पहाड़िया और संथाल समुदाय को एकजुट कर ‘भागलपुर और सुल्तानगंज’ के बीच अंग्रेजी खजाने पर छापे मारे और लूटा हुआ अनाज गरीबों में बांट दिया।
जब अंग्रेजी सेना ने उन्हें चारो तरफ से घेरा, तो उन्होंने कई हफ्तों तक गुरिल्ला युद्ध लड़ा। आखिरकार 1785 में उन्हें धोखे से पकड़ा गया और भागलपुर में सरेआम एक विशाल बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई। बाबा तिलका मांझी देश के पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी बने, जिन्होंने हंसते-हंसते मातृभूमि के लिए शहादत दी।
1831 का ‘कोल विद्रोह’: जिसने हिला दी थी फोर्ट विलियम की सल्तनत
अंग्रेज अफसरों ने छोटानागपुर के पारंपरिक मुंडा और मानकी प्रशासनिक व्यवस्था को खत्म कर बाहरी जमींदारों और महाजनों को मनमानी लगान वसूलने की छूट दे दी थी। आदिवासियों की जमीनें छीनी जा रही थीं और उनकी इज्जत पर हमले हो रहे थे।
1831 में इस शोषण के खिलाफ सिंहभूम, मानभूम, पलामू और रांची के कोल (हो, मुंडा, उरांव) समुदाय ने खुला विद्रोह कर दिया। बुद्धू भगत, जो सिलगाई (रांची) के रहने वाले थे, इस आंदोलन के सबसे प्रखर सेनापति बने।
बुद्धू भगत ने अपने हजारों समर्थकों के साथ अंग्रेजी छावनियों पर धावा बोल दिया। अंग्रेजी हुकूमत ने उन पर उस जमाने में 1,000 रुपये का भारी-भरकम इनाम रखा था। कैप्टन इमपे की सेना के साथ हुए भीषण युद्ध में बुद्धू भगत अपने बेटों और सैकड़ों साथियों सहित वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उन्होंने कभी घुटने नहीं टेके। इस विद्रोह ने अंग्रेजों को प्रशासन में बड़े बदलाव और ‘साउथ वेस्ट फ्रंटियर एजेंसी’ (SWFA) बनाने पर मजबूर किया।
1855 का ‘संथाल हूल’: जब 30,000 तीरों ने तोपों का मुंह मोड़ दिया
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की ठीक पूर्व संध्या पर 30 जून 1855 को भगीनाडीह (साहिबगंज) के मैदान में 400 गांवों के 20,000 से अधिक संथाल एकत्र हुए। यहां चार सगे भाइयों—सिदो, कान्हू, चांद और भैरव तथा उनकी वीर बहनों फूलो और झानो ने अंग्रेजों के खिलाफ ‘हूल’ (महाक्रांति) का ऐलान किया।
सिदो-कान्हू का स्पष्ट संदेश था—“जमींदार, महाजन, पुलिस और अंग्रेज अमलों का नाश हो और हमारा अपना राज कायम हो।”

संथाल लड़ाकों ने भागलपुर से लेकर राजमहल तक रेलवे निर्माण कार्य रोक दिया, डाक व्यवस्था ठप कर दी और ब्रिटिश थानों को आग के हवाले कर दिया। अंग्रेजी सरकार ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए ‘मार्शल लॉ’ लगाया और मेजर बुरो की सेना को भेजा, जिसे संथालों ने करारी शिकस्त दी।
हालांकि, आधुनिक हथियारों और तोपों के सामने पारंपरिक तीर-धनुष लंबे समय तक टिक नहीं सके। 15,000 से अधिक संथाल स्त्री-पुरुष शहीद हुए। सिदो और कान्हू को फांसी दे दी गई, लेकिन ‘हूल’ ने अंग्रेजी हुकूमत को कानून बदलकर ‘संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम’ की नींव रखने के लिए विवश कर दिया।
1857 का महासंग्राम: जब रांची से पलामू तक बना ‘मुक्ति वाहिनी’ का मोर्चा
जब 1857 में मेरठ और दिल्ली में क्रांति की आग सुलगी, तो झारखंड पीछे नहीं रहा। 30 जुलाई 1857 को हजारीबाग और 2 अगस्त 1857 को रांची के डोरंडा छावनी के देशी सैनिकों ने बगावत कर दी और कमिश्नर डाल्टन को जान बचाकर पिठोरिया के रास्ते भागना पड़ा।
झारखंड में 1857 की क्रांति का नेतृत्व समाज के हर वर्ग ने मिलकर किया:
- ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव एवं पांडेय गणपत राय: बड़कागढ़ के राजा विश्वनाथ शाहदेव ने ‘मुक्ति वाहिनी सेना’ का गठन किया। पांडेय गणपत राय उनके सेनापति बने। इन्होंने डोरंडा से लेकर चतरा तक अंग्रेजों से सीधा मोर्चा लिया।
- टिकैत उमराव सिंह एवं शेख भिखारी: खटंगा के जमींदार टिकैत उमराव सिंह और उनके दीवान शेख भिखारी ने रांची आने वाली ब्रिटिश सेना को रोकने के लिए ‘चुटुपालू घाटी’ की सड़क काट दी और पेड़ों को गिराकर रास्ता बंद कर दिया। कई दिनों तक अंग्रेजी सेना को रोके रखने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया और 8 जनवरी 1858 को चुटुपालू घाटी में बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई।
- नीलांबर-पीतांबर (पलामू): पलामू के जंगलों में भोक्ता और चेरो समुदाय को संगठित कर नीलांबर और पीतांबर ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। इन्होंने गुरिल्ला युद्ध पद्धति से अंग्रेजी खजानों और थानों को तबाह किया।
- राजा अर्जुन सिंह (सिंहभूम): पोड़ाहाट के राजा अर्जुन सिंह ने कोल्हान के हो लड़ाकों के साथ मिलकर ब्रिटिश सत्ता को सीधी चुनौती दी और खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया।

1857 के इन वीरों को अंततः रांची के वर्तमान ‘शहीद चौक’ (जिला स्कूल के पास) पर खुलेआम फांसी दी गई, ताकि जनता में दहशत फैलाई जा सके, लेकिन इसने क्रांति की आग को और भड़का दिया।
भगवान बिरसा मुंडा और ‘उलगुलान’: जल, जंगल, जमीन का महासंग्राम
19वीं सदी के अंत में छोटानागपुर की धरती पर एक ऐसा युगपुरुष अवतरित हुआ, जिसे आज पूरा देश ‘धरती आबा’ (भगवान बिरसा मुंडा) के नाम से पूजता है। 1895 से 1900 के बीच बिरसा मुंडा ने ‘उलगुलान’ (महाविद्रोह) का नेतृत्व किया।
बिरसा मुंडा का आंदोलन केवल राजनीतिक आजादी का नहीं था, बल्कि यह सामाजिक सुधार, धार्मिक पुनरुत्थान और जल-जंगल-जमीन पर मूल निवासियों के पैतृक अधिकार की लड़ाई थी। उन्होंने नारा दिया:
“अबरुआ दिशोम रे, अबरुआ राज” (हमारे देश में हमारा शासन)

9 जनवरी 1899 को डोंबारी बुरु पहाड़ी पर जब बिरसा अपने अनुयायियों की सभा ले रहे थे, अंग्रेजी सेना ने चारों तरफ से घेरकर अंधाधुंध गोलियां चलाईं। सैकड़ों निर्दोष ग्रामीण, महिलाएं और बच्चे शहीद हुए। डोंबारी बुरु का यह नरसंहार जलियांवाला बाग कांड से भी भयानक था।
3 फरवरी 1900 को बिरसा मुंडा को जामकोपाई के जंगलों से सोते हुए पकड़ा गया। 9 जून 1900 को रांची सेंट्रल जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन इस उलगुलान का ही असर था कि ब्रिटिश सरकार को 1908 में ऐतिहासिक ‘छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम’ (CNT Act) लागू करना पड़ा, जिसने आदिवासियों की जमीन की गैरकानूनी खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी।
गांधीवादी दौर और टाना भगत: अहिंसा के सबसे निष्ठावान सिपाही
1914 में गुमला के नवाटोली से जतरा टाना भगत के नेतृत्व में शुरू हुआ ‘टाना भगत आंदोलन’ शुरुआत में एक धार्मिक-सामाजिक सुधार आंदोलन था, लेकिन जल्द ही यह ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ कर-ना-देने (No-Tax) के आंदोलन में बदल गया।
जब महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय स्तर पर असहयोग आंदोलन शुरू किया, तो टाना भगत बिना किसी शर्त के गांधीजी के सबसे बड़े और समर्पित अनुयायी बन गए। खादी पहनना, हाथ में तिरंगा थामना और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए ब्रिटिश नीतियों का विरोध करना इनकी पहचान बन गई।
महात्मा गांधी ने स्वयं कहा था कि “टाना भगत मेरे सबसे प्रिय और निष्ठावान सत्याग्रही हैं।” इन्होंने अपनी कीमती जमीनें नीलाम करवा लीं, जेल की यातनाएं सहीं, लेकिन कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया और न ही अंग्रेजों को लगान दिया।
1940 का रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन: जिसने तय की 1942 की रूपरेखा
झारखंड का रामगढ़ शहर मार्च 1940 में देश की आजादी की राजनीति का केंद्र बन गया। यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 53वां ऐतिहासिक वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की।
इस अधिवेशन में महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सुभाष चंद्र बोस समेत देश के तमाम बड़े नेता शामिल हुए।
इसी अधिवेशन में अंग्रेजों के युद्ध प्रयासों का विरोध करने और व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू करने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसने आगे चलकर 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की नींव रखी। उस समय रामगढ़ की धरती ने पूरे देश को एकता और संघर्ष का कड़ा संदेश दिया था।
1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’: हजारीबाग जेल से देवघर के मैदान तक
8 अगस्त 1942 को जब बंबई में ‘करो या मरो’ का नारा गूंजा, तो झारखंड में भी क्रांति की ज्वाला धधक उठी। ब्रिटिश हुकूमत ने शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। जयप्रकाश नारायण (जेपी) को हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया था।
9 नवंबर 1942 (दीपावली की रात) को जयप्रकाश नारायण अपने पांच साथियों (रामानंदन मिश्र, योगेंद्र शुक्ल, सूरज नारायण सिंह, गुलाब चंद गुप्त और शालिग्राम सिंह) के साथ हजारीबाग जेल की ऊंची दीवारें फांदकर फरार हो गए। इस ऐतिहासिक घटना ने पूरे देश में भूमिगत आंदोलन को एक नई ऊर्जा दी।
झारखंड के अलग-अलग हिस्सों में आंदोलन का स्वरूप:
- पलामू: यदुवंश सहाय और मिथिलेश कुमार सिन्हा के नेतृत्व में समानांतर शासन चलाया गया।
- संथाल परगना: विनोदानंद झा, कृष्ण प्रसाद और प्रफुल्ल चंद्र पटनायक ने युवाओं को संगठित कर संचार व्यवस्थाएं ध्वस्त कर दीं।
- टाटानगर: जमशेदपुर में मजदूरों ने हड़ताल कर इस्पात कारखानों का चक्का जाम कर दिया, जिससे ब्रिटिश युद्ध सामग्री का उत्पादन ठप हो गया।
- देवघर: अशर्फी लाल और कई क्रांतिकारियों ने सरकारी दफ्तरों पर तिरंगा फहराते हुए गोलियां खाईं।
जंग-ए-आजादी में झारखंड की विरासत
जंग-ए-आजादी में झारखंड का योगदान केवल तारीखों और लड़ाइयों का ब्योरा नहीं है; यह उस अदम्य साहस की मिसाल है जहां सीमित संसाधनों के बावजूद एक पूरी कौम विदेशी हुकूमत के सामने सीना तानकर खड़ी रही।
तिलका मांझी से लेकर सिदो-कान्हू, भगवान बिरसा मुंडा, टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी, बुद्धू भगत और टाना भगतों तक—इन वीरों ने यह साबित किया कि आजादी की कीमत कभी भी समझौते से नहीं चुकाई जाती। आज जब हम एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सांस ले रहे हैं, तो झारखंड की इस माटी और इसके अमर शहीदों के बलिदान को नमन करना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।











