रांची: राजधानी के बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से सटे हुंड्रू गांव में इन दिनों भारी हड़कंप मचा हुआ है। यहां एक सड़क निर्माण परियोजना के कारण रांची एयरपोर्ट सड़क विवाद इस कदर गहरा गया है कि ग्रामीण अपनी जान देने पर आमादा हैं। जिला प्रशासन की एक सड़क योजना के चलते इलाके के करीब 25 गरीब और आदिवासी परिवारों के कच्चे-पक्के मकानों पर बुलडोजर चलने का खतरा मंडरा रहा है।
मोबाइल स्क्रीन पर खबर पढ़ रहे पाठकों को यह जानकर हैरानी होगी कि यह इन ग्रामीणों का पहला विस्थापन नहीं है। यहां का हर दूसरा परिवार रोते हुए यही कह रहा है कि उनके परदादा, दादा और पिता के बाद अब वे खुद चौथी पीढ़ी के रूप में इस विस्थापन के जानलेवा दर्द को झेलने जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब विभाग के पास सड़क बनाने के लिए पास में ही सरकारी खाली जमीन उपलब्ध है, तो आखिर किसका फायदा कराने के लिए गरीबों के आशियाने उजाड़ने की जिद पकड़ी गई है? ग्राउंड जीरो से आई यह रिपोर्ट तंत्र की संवेदनशीलता और भू-माफियाओं के गठजोड़ की पोल खोलती है।
चौथी पीढ़ी का दर्द: ‘जान दे देंगे, लेकिन आशियाना नहीं टूटने देंगे’
ग्राउंड जीरो पर जब हमारी टीम पहुंची, तो माहौल में गुस्सा और बेबसी साफ महसूस हो रही थी। एक टूटे हुए खपैल घर के बाहर खड़ी लीला देवी ने रोते और चीखते हुए कहा:
“हम लोग बाजार में माथा पर टोकरी ढो-ढोकर, एक-एक आना कमाकर यह घर बनाए हैं। अभी तक यह पूरा भी नहीं हुआ है। क्या सरकार फिर इसे तोड़ने आएगी? हम अपनी जान दे देंगे, गोली खा लेंगे, लेकिन सड़क के लिए अपना घर किसी कीमत पर नहीं टूटने देंगे।”
वहीं स्थानीय महिला मंजू देवी ने बताया कि उनके पास अब दूसरी जगह सिर छिपाने के लिए एक इंच भी जमीन नहीं बची है। बिरसा मुंडा एयरपोर्ट के पिछले विस्तारीकरण के वक्त भी उनकी जमीनें ले ली गई थीं, और तब मिले मामूली मुआवजे से उन्होंने जैसे-तैसे यह नया आशियाना खड़ा किया था। अब इसे भी उजाड़ने की तैयारी है।
क्या है रांची एयरपोर्ट सड़क विवाद का तकनीकी पेंच?
इस पूरे मामले को समझने के लिए हमने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे स्थानीय नागरिक आनंद शंकर साहू से बात की। उन्होंने आरसीडी (पथ निर्माण विभाग) के आधिकारिक नक्शे और दस्तावेजों को दिखाते हुए अंदरूनी कहानी बयां की।
पुराना बनाम संशोधित आरेखन (Alignment) का खेल
- परियोजना की लंबाई: बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से कोचबांग तक कुल 6.9 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण हो रहा है।
- विवादित क्षेत्र: इस सड़क का लगभग 900 मीटर हिस्सा मौजा हुंड्रू (ग्राम हरटाण) से होकर गुजरना है।
- पुराना आरेखन: आरसीडी के पुराने नक्शे के मुताबिक, सड़क सीधे ग्रामीणों के 25 चालू मकानों के बीच से निकल रही है।
- संशोधित आरेखन (नया नक्शा): ग्रामीणों के भारी विरोध के बाद विभाग ने साल 2025 में स्थलीय निरीक्षण किया। तत्कालीन अधीक्षण अभियंता ने एक संशोधित नक्शा तैयार किया, जिसके तहत सड़क को बिना किसी घर को नुकसान पहुंचाए पास की खाली जमीन से निकाला जा सकता है।
आनंद शंकर साहू का आरोप है कि, “जूनियर इंजीनियर से लेकर चीफ इंजीनियर तक ने संशोधित आरेखन पर अपनी सहमति दे दी थी और फाइल प्रशासनिक स्वीकृति के लिए विभाग के सचिव महोदय के पास भेजी गई थी। लेकिन दुर्भाग्य से सचिव स्तर पर यह फाइल लंबे समय से विचाराधीन रखी गई है। अब अफवाह है कि सड़क पुराने नक्शे पर ही बनेगी।”
सरकारी सिस्टम पर हावी ‘भू-माफिया और दलाल’
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि सरकारी विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और स्थानीय जमीन दलालों की मिलीभगत के कारण इस योजना को जानबूझकर उलझाया जा रहा है। खाली जमीन पर सड़क न बनाकर गरीबों के घरों को टारगेट किया जा रहा है ताकि कुछ खास लोगों के निजी व्यावसायिक हितों को फायदा पहुंचाया जा सके।
स्थानीय निवासी सुषमा देवी ने ग्राउंड पर एक चौंकाने वाला खुलासा किया:
“गांव के ही कुछ दलाल किस्म के लोग हमारे घर आकर धमकी देते हैं। वे कहते हैं कि जमीन दे दो, नहीं तो तुम लोगों की वजह से पूरे गांव का विकास और पैसा रुक जाएगा। वे हमसे जबरदस्ती कागजों पर अंगूठा और साइन कराने की कोशिश कर रहे हैं।”
राजनीतिक सरगर्मी: ‘गरीबों पर बुलडोजर चला तो ईंट से ईंट बजा देंगे’
इस बड़े मानवीय संकट को देखते हुए विपक्षी खेमे के दिग्गज नेता और भाजपा नेता दीपक प्रकाश भी हुंड्रू गांव पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों के साथ एक बड़ी बैठक की और सीधे राज्य सरकार को चेतावनी दे डाली।

दीपक प्रकाश ने कड़े शब्दों में कहा:
“यह विकास नहीं, विनाश है। सरकार के पास जब बगल में ही प्रचुर मात्रा में खाली जमीन उपलब्ध है, तो सचिव महोदय संशोधित फाइल को दबाकर क्यों बैठे हैं? अगर प्रशासन ने इन गरीबों के आशियाने पर एक भी बुलडोजर चलाया, तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे। यह लड़ाई अब सिर्फ ग्रामीणों की नहीं, हमारी भी है। हम मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक इस बात को लिखित रूप में ले जा रहे हैं।”
आगे क्या: नीतिगत संवेदनशीलता या फिर बड़ा आंदोलन?
रांची एयरपोर्ट सड़क विवाद अब महज एक बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विकास का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे-सीधे मानवाधिकार और गरीब जनता के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। विकास की रफ्तार जरूरी है, लेकिन उसकी कीमत किसी गरीब की झोपड़ी या उसकी चौथी पीढ़ी का मानसिक उत्पीड़न नहीं हो सकती।
अब देखना यह होगा कि क्या पथ निर्माण विभाग के सचिव और मुख्य सचिव मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इंजीनियर-इन-चीफ द्वारा स्वीकृत ‘संशोधित नक्शे’ को हरी झंडी देते हैं, या फिर हुंड्रू गांव की यह सुलगती चिंगारी रांची में एक बड़े उग्र आंदोलन का रूप अख्तियार करेगी।











