खूंटी की बेटी का भोपाल में डंका: प्रिया मुंडा को मिला ‘राष्ट्रीय मैत्रेयी पुरस्कार’, अंतरराष्ट्रीय मंच पर जनजातीय अधिकारों के लिए उठाई आवाज़

खूंटी की बेटी का भोपाल में डंका: प्रिया मुंडा को मिला 'राष्ट्रीय मैत्रेयी पुरस्कार', अंतरराष्ट्रीय मंच पर जनजातीय अधिकारों के लिए उठाई आवाज़

भोपाल/खूंटी | झारखंड के खूंटी की ज़मीन से निकलकर एक महिला ने देश और दुनिया के सामने अपनी सेवा का लोहा मनवाया है। बिरसा वाहिनी फाउंडेशन की संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्षा प्रिया मुंडा को भोपाल में आयोजित एक भव्य अंतरराष्ट्रीय समारोह में ‘राष्ट्रीय मैत्रेयी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष की जीत है, बल्कि झारखंड के जनजातीय समाज के गौरव का प्रतीक भी बनकर उभरा है।

भारतीय योगिनी संघ द्वारा आयोजित 6th इंटरनेशनल योगिनी अवार्ड एवं कॉन्फ्रेंस में प्रिया मुंडा को यह सम्मान उनके द्वारा कई राज्यों में किए जा रहे सामाजिक और धार्मिक कार्यों के लिए दिया गया। इस आयोजन में भारत सहित मस्कट, मलेशिया, सिंगापुर और कोरिया जैसे देशों के दिग्गजों ने शिरकत की, जिससे इस पुरस्कार की अहमियत और बढ़ गई है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर दहाड़ी ‘बिरसा की बेटी’

पुरस्कार वितरण से पहले आयोजित पैनल वार्ता में प्रिया मुंडा ने सिर्फ अपनी सफलता की कहानी नहीं सुनाई, बल्कि उन्होंने एक गंभीर मुद्दे पर दुनिया का ध्यान खींचा। उन्होंने देश भर की जनजातियों पर हो रहे विभिन्न प्रकार के हमलों और चुनौतियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जनजातीय संस्कृति का संरक्षण केवल एक समुदाय की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी मानवता के अस्तित्व के लिए ज़रूरी है।

क्यों खास है यह सम्मान?

प्रिया मुंडा लंबे समय से बिरसा वाहिनी फाउंडेशन के माध्यम से जनजातीय समाज के उत्थान, उनकी शिक्षा और उनके अधिकारों के लिए ज़मीनी स्तर पर काम कर रही हैं।

  • सामाजिक प्रभाव: कई राज्यों में फैले उनके नेटवर्क ने हज़ारों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है।
  • धार्मिक और सांस्कृतिक कार्य: उन्होंने लुप्त होती जनजातीय परंपराओं को सहेजने और युवाओं को उनकी जड़ों से जोड़ने का अभियान चलाया है।
  • वैश्विक मंच: मस्कट और सिंगापुर जैसे देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में खूंटी का नाम गूंजना झारखंड के लिए बड़ी बात है।

ग्राउंड रिपोर्ट: खूंटी से भोपाल तक का सफर

प्रिया मुंडा का यह सफर आसान नहीं था। खूंटी जैसे क्षेत्र से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाना यह साबित करता है कि यदि संकल्प मज़बूत हो, तो संसाधन कभी बाधा नहीं बनते। कार्यक्रम में मौजूद विशेषज्ञों ने माना कि प्रिया मुंडा का काम केवल चैरिटी नहीं है, बल्कि यह समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सशक्त बनाने की एक “मौन क्रांति” है।

क्या है आगे की रणनीति?

प्रिया मुंडा ने सम्मान ग्रहण करने के बाद संकेत दिया कि आने वाले दिनों में बिरसा वाहिनी फाउंडेशन जनजातीय युवाओं के कौशल विकास और महिलाओं की सुरक्षा के लिए बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू करेगा। उन्होंने कहा कि “पुरस्कार एक ज़िम्मेदारी है, जो हमें और अधिक मेहनत करने की प्रेरणा देती है।”

अगला कदम: सरकार और समाज की भूमिका

इस उपलब्धि के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि राज्य सरकार और केंद्र की जनजातीय कार्य मंत्रालय प्रिया मुंडा जैसे ज़मीनी नायकों को और अधिक संसाधन उपलब्ध कराएगी। समाज के लिए यह गर्व का क्षण है, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या हम अपने स्थानीय हीरो को वह सम्मान दे पा रहे हैं जिसके वे हकदार हैं?

Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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