Ranchi | झारखंड के ऐतिहासिक लोकपर्व करम का रिश्ता सिंधु घाटी सभ्यता और अफ्रीका महाद्वीप के हजारों साल पुराने इतिहास से जुड़ता है। पड़हा समन्वय परिषद के प्रवक्ता एलएम उरांव ने समाज के उद्भव और इस पर्व की अनसुनी दास्तान साझा की है।
उरांव (कुडुख) समुदाय की उत्पत्ति गुमला जिले के चैनपुर प्रखंड स्थित सिरिता नाले से मानी जाती है। मान्यता है कि विखंडन के दौर में यह समाज अफ्रीका, मिस्र और जम्बू द्वीप होते हुए सिंधु घाटी पहुंचा, जहां खेती की शुरुआत के साथ धर्मेश (ईश्वर) के निर्देश पर करम और सरहुल पर्व शुरू हुए।
आर्यों के आगमन और बाद के संघर्षों के बाद यह समुदाय पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और रोहतासगढ़ होते हुए वापस छोटानागपुर पहुंचा। आज भी भादो शुक्ल एकादशी को पूरी निष्ठा से मनाया जाने वाला यह पर्व सिर्फ अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण और समाज के पुनर्जन्म का प्रतीक है।
सिरिता नाले से सिंधु घाटी तक: 70 हजार सालों का सफर
पड़हा समन्वय परिषद के प्रवक्ता एलएम उरांव के अनुसार, पृथ्वी के विखंडन के समय उरांव समुदाय अफ्रीका चला गया था। वहां हजारों साल रहने के बाद यह समाज मिस्र और एशिया महाद्वीप (जम्बू द्वीप) के रास्ते सिंधु घाटी पहुंचा।
सिंधु घाटी में घने जंगलों को साफ कर खेती शुरू की गई। खेती के लिए बीज रोपण से पहले ‘डंडा कटना’ पद्धति से निराकार धर्मेश की आराधना हुई। पूजा के बाद डिंबो फोड़ने पर ‘बारहों बिरही’ अनाज प्राप्त हुआ, जिससे हर मौसम में फसल की शुरुआत हुई।
“डंडा कटना के बाद समाज को अंतरात्मा से निर्देश मिला कि प्रकृति की कृपा के लिए दो मुख्य पर्व मनाए जाएं—पहला करम और दूसरा खद्दी (सरहुल)।”
— एलएम उरांव, प्रवक्ता, पड़हा समन्वय परिषद
सिंधु घाटी में संघर्ष के बाद यह आबादी पंजाब, तटीय राज्यों और रोहतासगढ़ पहुंची। करीब 185-184 ईसा पूर्व पुष्यमित्र शुंग के काल में हुए विस्थापन के बाद समाज प्रथम सदी के आसपास वापस छोटानागपुर में बसा, जहां उस समय मदिरा मुंडा का शासन था।
भादो चतुर्थी से जावा का संकल्प: शुद्धता और प्रकृति प्रेम
करम पर्व की मुख्य पूजा भले ही भादो एकादशी को होती है, लेकिन अनुष्ठान चतुर्थी से ही शुरू हो जाता है।
- जावा बीजारोपण: कुंवारी युवतियां नदी से महीन बालू लाकर जावा जगाती हैं। इस पात्र को अंधेरे कमरे में सुरक्षित रखा जाता है, जहां बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित रहता है।
- प्राकृतिक सुरक्षा: जावा को कीट-पतंगों से बचाने के लिए रोजाना हल्दी पानी का छिड़काव किया जाता है। युवतियां इस दौरान पूर्ण सात्विक दिनचर्या का पालन करती हैं।
- उपवास और सम्मान: एकादशी के दिन कुंवारे युवक और युवतियां निर्जला उपवास रखते हैं।
अखड़ा में करम राजा की स्थापना और 24 घंटे का अखंड रीझ-रंग
एकादशी की दोपहर उपवासी युवक गाजे-बाजे के साथ जंगल से करम पेड़ की तीन डालियां लेने निकलते हैं। पेड़ की पूजा के बाद बिना जमीन पर गिराए, डालियों को ऊपर ही हाथों में थाम लिया जाता है। उधर युवतियां नदी तट से लेंडा फूल चुनकर लाती हैं।
गाँव की सीमा पर मिलन के बाद डालियां पाहन/पड़हा राजा के यहां ले जाई जाती हैं। शाम को पूरे विधि-विधान से करम राजा को गांव के पारंपरिक अखड़ा में स्थापित किया जाता है।
- पल्खंजा (खीरा) का महत्व: पूजा के दौरान युवतियां खीरा को संतान रूप में गोद में रखती हैं, जो वंश वृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है।
- अखंड नाच-गान: पाहन द्वारा करम कथा सुनाने के बाद अखड़ा में रातभर सामूहिक नृत्य और मांदर की थाप पर उत्सव चलता है।
भेलवा की डाली से फसल सुरक्षा: द्वादशी का वैज्ञानिक आधार
द्वादशी को विसर्जन से पहले करम राजा की डालियों को गांव के हर घर में घुमाया जाता है। इसके साथ ही एक गहरा कृषि-वैज्ञानिक पक्ष भी सामने आता है।
गांव के पुरुष सदस्य खेतों में जाकर भेलवा, सिंधवार या खेंद की टहनियां गाड़ते हैं।
- जैविक कीटनाशक: सिंधवार और भेलवा की टहनियां फसलों को फंगस और हानिकारक कीटों से बचाती हैं।
- जैविक संतुलन: इन टहनियों पर पक्षी आकर बैठते हैं, जो फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को खाकर फसल की रखवाली करते हैं।
विसर्जन के बाद समाज में नए मांगलिक कार्य, रिश्ते तय करने और शादी-ब्याह की औपचारिक शुरुआत हो जाती है।
करम पर्व केवल लोक-परंपरा नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के लिए पर्यावरण संरक्षण और जैव-विविधता का जीवंत पाठ है। कंक्रीट के जंगलों में बदलती दुनिया के बीच, सिंधु घाटी से चली आ रही यह हरित विरासत आज सबसे ज्यादा प्रासंगिक है।











