ब्रेकिंग न्यूज़
लोड हो रहा है... ताज़ा खबरों के लिए बने रहें...
Advertisement
Festival Special

होली का ‘हलाहल’ और शादी का ‘मिष्ठान’: कुंवारों से लेकर अधेड़ मजनुओं तक की दास्तान!

होली का त्योहार आते ही समाज दो गुटों में बंट जाता है। एक वो जिनके गालों पर गुलाल मलता कोई ‘अपना’ है, और दूसरे वो जो मोहल्ले भर के ‘परायों’ से कीचड़ में नहाने के बाद भी अकेले हैं। आइए, इस रंगीन जंग का आंखों देखा हाल जानते हैं।

कुंवारों की ‘वन-डे इंटरनेशनल’ होली

कुंवारों के लिए होली का मतलब है— स्वराज! ये सुबह से ही घर से ऐसे गायब होते हैं जैसे सीबीआई की रेड पड़ने वाली हो। इनके लिए होली का रंग नहीं, बल्कि ‘इन्वेंटरी’ मायने रखती है: ग्रीस, काला तेल, और वो रंग जो कम से कम तीन महीने तक न छूटे।

Advertisement

इनका मुख्य लक्ष्य उस बालकनी की तरफ पिचकारी मारना होता है, जहाँ मोहल्ले का ‘क्रश’ खड़ा हो। भले ही जवाब में वहां से चप्पल आए, पर कुंवारा इसे ‘होली का आशीर्वाद’ मानकर खुश हो जाता है।

शादीशुदा की ‘टेस्ट मैच’ होली

शादी के बाद होली का सारा रंग बीवी की साड़ियों और बच्चों की पिचकारियों के बीच ‘फिल्टर’ हो जाता है।

  • पति का काम: सुबह से धनिया लाना, दही जमाना और मेहमानों के लिए ‘टिशू पेपर’ की तरह तैनात रहना।
  • रंग का स्तर: इनकी होली सिर्फ एक ‘टीके’ तक सीमित है। अगर पति ने ज्यादा जोश दिखाया और गलती से बीवी के मेकअप वाले चेहरे पर हाथ लगा दिया, तो होली ‘दिवाली’ में बदल जाती है (यानी पटाखों की गूँज शुरू!)।

‘सीनियर’ कुंवारों की होली: सन्नाटे की गूंज

अब बात उनकी, जो ‘शादी की उम्र’ पार कर चुके हैं लेकिन अब भी ‘अपडेट’ का इंतजार कर रहे हैं। इनके लिए होली एक साइकोलॉजिकल वॉरफेयर है।

  • मोहल्ले के ताने: जब भी ये गुलाल लगवाने झुकते हैं, कोई न कोई आंटी कह देती है— “अगली बार भाभी के साथ आना, खाली हाथ अच्छे नहीं लगते!” * बचाव मुद्रा: ये लोग होली वाले दिन सबसे ज्यादा व्यस्त होने का नाटक करते हैं। हाथ में एक पुराना सा अखबार लेकर बालकनी में ऐसे बैठते हैं जैसे देश का बजट इन्हीं को पास करना हो।
  • अकेलेपन का आनंद: इनकी होली ‘भांग के लड्डू’ के भरोसे चलती है। दो लड्डू खाए और फिर खुद को ‘ब्रह्मांड का राजा’ समझकर सो गए।

मजेदार चुटकुले (होली स्पेशल)

(कुंवारा VS शादीशुदा) कुंवारा: भाई, होली पर क्या प्लान है? शादीशुदा: मेरा प्लान तो ‘वाशिंग मशीन’ जैसा है। कुंवारा: वो कैसे? शादीशुदा: बीवी मुझे रंगती है, और फिर मैं दिन भर सबके कपड़े धोता हूँ!

(अधेड़ कुंवारा) पड़ोसी: “शर्मा जी, इस उम्र में भी कुंवारे? होली सूखी नहीं लगती?” शर्मा जी: “भाई साहब, कम से कम मेरा रंग छुड़ाने के लिए कोई बेलन तो नहीं मारता!”

एक खास कविता: “होली के तीन अवतार”

कुंवारा डोले गली-गली, हाथ में लेकर कीचड़, सोचे आज तो बन जाऊं, मोहल्ले का मैं ‘फीचर’! कपड़ा फटा, चेहरा काला, फिर भी है अभिमान, यही है कुंवारेपन की, सबसे ऊंची शान!

शादीशुदा की होली देखो, हाथ में पकड़ी थाली, पनीर की सब्जी बन रही, और मिल रही है गाली! रंग लगा जो गाल पे ज्यादा, तो बीवी कर दे लाल, बेचारा पति सोचता, “होली है या बवाल?”

और जो कुंवारे रह गए, ज्यादा उम्र के ताऊ, वो कहते हैं, “रंग से दूर, मैं तो ‘शाकाहारी’ भाऊ!” मन ही मन वो कोसते, “ये कैसा है दस्तूर,” अकेले खाते गुजिया, और होते भांग में चूर!

चाहे आप कुंवारे हों, शादीशुदा हों या ‘सदाबहार’ सिंगल, होली का असली मजा भांग के नशे में नहीं, बल्कि अपनों के साथ (या उनकी खिंचाई करने में) है।

Related Stories & Ads

Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now

Leave a comment