Ranchi | झारखंड में प्रकृति और भाई-बहन के अटूट प्रेम का सबसे बड़ा लोकपर्व करमा (Karma Puja) दस्तक दे चुका है। गांवों से लेकर शहरों के अखड़ा तक मांदर की थाप गूंजने लगी है।
भादों महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाए जाने वाले इस महापर्व को लेकर लोगों में तारीख और शुभ मुहूर्त को लेकर उत्सुकता है।
पंचांग गणना और आदिवासी-मूलवासी परंपरा के मुताबिक, यह पर्व भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन विधि-विधान से मनाया जाता है। झारखंड सरकार के कैलेंडर और पारंपरिक पाहन-पुजारियों की व्यवस्था के तहत इस पावन तिथि की तैयारियां अब अंतिम चरण में हैं।
करमा पूजा 2026: तिथि, एकादशी मुहूर्त और पंचांग स्थिति
झारखंड की लोक-संस्कृति में करमा एकादशी का विशेष महत्व है। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ और उदया तिथि का संयोग ही पूजा का मुख्य आधार बनता है।
- पर्व की मुख्य तिथि: भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी
- पूजा का समय: संध्या काल (प्रदोष वेला) से लेकर देर रात तक
- जावा जागरण: एकादशी की पूरी रात अखड़ा में पारंपरिक नृत्य-गीत
पाहनों के अनुसार, एकादशी तिथि के दिन शाम को करम डाल की स्थापना की जाती है। बहनें दिनभर निर्जला उपवास रखकर अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छी फसल के लिए करम देव से प्रार्थना करती हैं।

अखड़ा में मांदर की गूंज: क्या कह रहे हैं जमीन के जानकार?
रांची के हरमू, करमटोली और ग्रामीण इलाकों के अखड़ा में पाहन और करमइतियों की रौनक देखने लायक है। जमीन पर परंपरा का निर्वहन कर रहे पाहन बताते हैं कि करमा सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जीने का संकल्प है।
“करम राजा से हम अपनी धरती की रक्षा, अच्छी फसल और परिवार की खुशहाली मांगते हैं। सात-नौ दिन पहले से डाली में उगाया गया ‘जावा’ अब पूरी तरह खिल चुका है। एकादशी की शाम को विधि-विधान से करम डाल लाकर अखड़ा में स्थापित किया जाएगा।”
— बबलू मुंडा, अध्यक्ष केन्द्रीय सरना समिति
स्थानीय स्तर पर तैयारियां जोरों पर हैं। बाजारों में पूजा की सामग्री, खीरा, धूप-धुवन और पारंपरिक परिधानों की खरीदारी तेज हो गई है।
जावा जगाने से विसर्जन तक: ऐसे निभती है परंपरा
करमा पूजा का विधान एकादशी से कई दिन पहले ही ‘जावा’ उठाने के साथ शुरू हो जाता है:
- जावा उठाना: कुंवारी लड़कियां नदी या तालाब से शुद्ध बालू लाकर बांस की टोकरी में रखती हैं और उसमें सात प्रकार के अनाज बोती हैं।
- करम डाल का स्वागत: एकादशी की शाम गांव के युवक जंगल से करम पेड़ की तीन डालियां काटकर लाते हैं, जिनका स्वागत बहनें पैर धोकर करती हैं।
- कथा और जागरण: पाहन द्वारा करमा-धरमा की पारंपरिक कथा सुनाई जाती है। इसके बाद पूरी रात मांदर, ढोल और नगाड़े की थाप पर सामूहिक नृत्य होता है।
- विसर्जन: द्वादशी की सुबह करम डाल को नदी या तालाब में प्रवाहित कर जावा फूल को भाइयों के कान में खोंसकर आशीर्वाद दिया जाता है।

प्रशासन अलर्ट: सुरक्षा और ट्रैफिक को लेकर क्या है तैयारी?
राजधानी रांची सहित जमशेदपुर, धनबाद, हजारीबाग और दुमका में जिला प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। त्योहार के दौरान अखड़ा स्थलों पर भीड़ नियंत्रण और रात के समय गश्त बढ़ाने के निर्देश जारी किए गए हैं।
नगर निगम की टीमें पूजा स्थलों और प्रमुख तालाबों के आसपास साफ-सफाई व लाइटिंग दुरुस्त करने में जुटी हैं। ट्रैफिक पुलिस ने विसर्जन के रूट चार्ट और पार्किंग को लेकर एडवाइजरी तैयार की है, ताकि आम जनता को आवाजाही में किसी तरह की परेशानी न हो।











