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झारखंड राज्यसभा चुनाव: क्‍या निशा उरांव होंगी बीजेपी की उम्‍मीदवार?

Ranchi | झारखंड की सियासत में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि क्या बीजेपी इस बार राज्यसभा चुनाव में कोई चौंकाने वाला नाम सामने लाने जा रही है? दिल्ली से लेकर रांची तक राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है।

पार्टी के भीतर से आ रही खबरें बताती हैं कि बीजेपी इस बार झारखंड से उच्च सदन के लिए बड़ा ‘आवासी कार्ड’ खेलने की पूरी तैयारी में है। वर्तमान में संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में झारखंड से भाजपा का कोई भी आदिवासी चेहरा नहीं है, यही वजह है कि इस बार रणनीति बदलने के साफ संकेत मिल रहे हैं।

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अगले महीने बीजेपी सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इस खाली हो रही सीट पर पार्टी किसी ऐसे दमदार आदिवासी चेहरे को दिल्ली भेजने पर गंभीरता से विचार कर रही है, जो राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख दे।

इन 5 बड़े चेहरों पर टिकी हैं सबकी निगाहें

रांची के प्रदेश मुख्यालय से लेकर दिल्ली के गलियारों तक, पांच बड़े नामों को लेकर कयासों का बाजार बेहद गर्म है। रेस में पूर्व मुख्यमंत्रियों से लेकर पूर्व नौकरशाह तक शामिल हैं।

1. अर्जुन मुंडा: अनुभव और बड़ा आदिवासी चेहरा

झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके अर्जुन मुंडा इस रेस में सबसे भारी नाम माने जा रहे हैं। 1980 के दशक में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले मुंडा बाद में बीजेपी का मुख्य आदिवासी चेहरा बने। वे खूंटी और जमशेदपुर से सांसद रहने के साथ-साथ केंद्र में जनजातीय कार्य और कृषि मंत्री जैसी बड़ी जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता बहुत व्यापक है।

2. आशा लकड़ा: जमीन से जुड़ी मुखर आवाज

रांची की दो बार मेयर रह चुकीं आशा लकड़ा इस वक्त राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की सदस्य हैं। एबीवीपी (ABVP) से अपने करियर की शुरुआत करने वाली आशा लकड़ा बीजेपी की राष्ट्रीय मंत्री भी रह चुकी हैं। झारखंड में डेमोग्राफी में बदलाव, आदिवासी हित और सामाजिक मुद्दों पर वे लगातार मुखर रही हैं। बंगाल चुनाव में सह-प्रभारी के रूप में उनके संगठनात्मक कौशल को आलाकमान देख चुका है।

3. निशा उरांव: प्रशासनिक अनुभव और नया समीकरण

पूर्व आईआरएस (IRS) अधिकारी निशा उरांव का नाम इस रेस में सबसे चौंकाने वाला और दिलचस्प है। वे कांग्रेस के दिग्गज नेता डॉ. रामेश्वर उरांव की बेटी हैं। झारखंड सरकार में पंचायती राज और कृषि निदेशक जैसे पदों पर काम कर चुकीं निशा इन दिनों डिलिस्टिंग, धर्मांतरण, ग्रामसभा और पारंपरिक शासन व्यवस्था जैसे कोर आदिवासी मुद्दों पर जमीन पर बेहद सक्रिय हैं।

4. समीर उरांव और अरुण उरांव

इनके अलावा एसटी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष समीर उरांव (जो पहले भी राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं) और पूर्व आईपीएस अधिकारी अरुण उरांव के नामों पर भी संगठन के भीतर चर्चा चल रही है।

दिल्ली के ‘महामंथन’ के बाद रांची में बैठी चुनाव समिति

इस पूरी स्क्रिप्ट की शुरुआत दिल्ली में आयोजित आदिवासियों के राष्ट्रीय समागम के बाद हुई, जहां राष्ट्रीय नेतृत्व ने झारखंड के इस ‘वैक्यूम’ को भरने की रणनीति बनाई। इसके तुरंत बाद रांची में प्रदेश चुनाव समिति की एक हाई-प्रोफाइल बैठक हुई।

इस बैठक में प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और प्रदेश संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह को तीन संभावित नामों का एक फाइनल पैनल तैयार करने के लिए अधिकृत किया गया है, जिसे जल्द ही केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) को भेज दिया जाएगा।

रांची बीजेपी दफ्तर के बाहर जुटे कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर साफ उत्साह है कि पार्टी इस बार किसी मूल आदिवासी चेहरे को ही मौका देगी। एक वरिष्ठ नेता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा, “झारखंड आदिवासियों का प्रदेश है, और संसद में हमारा प्रतिनिधित्व मजबूत होना वक्त की मांग है।”

आंकड़ों का गणित: ‘क्रॉस वोटिंग’ या अतिरिक्त समर्थन ही तय करेगा टिकट?

1. विधानसभा में मौजूदा दलीय स्थिति (Party-wise Strength)

झारखंड विधानसभा में वर्तमान में दो मुख्य गठबंधन हैं। बहुमत का आंकड़ा 41 है।

गठबंधन / दलसीटेंकुल संख्या
महागठबंधन (INDIA Bloc)56
🔹 झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM)34
🔹 इंडियन नेशनल कांग्रेस (INC)16
🔹 राष्ट्रीय जनता दल (RJD)4
🔹 भाकपा-माले (CPI-ML)2
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA)24
🔹 भारतीय जनता पार्टी (BJP)21
🔹 आजसू (AJSU)1
🔹 जनता दल यूनाइटेड (JD-U)1
🔹 लोजपा-रामविलास (LJP-RV)1
अन्य01
🔹 झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM)1
कुल सीटें81

2. राज्यसभा चुनाव का वोटिंग गणित (The Math)

झारखंड की एक राज्यसभा सीट को सीधे तौर पर जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को प्रथम वरीयता (First Preference) के न्यूनतम वोटों की आवश्यकता होती है।

  • एक सीट के लिए जरूरी कोटा (Quota Formula):$$\text{आवश्यक वोट} = \left( \frac{\text{कुल विधायक (81)}}{\text{खाली सीटें (1) } + 1} \right) + 1 = 41.5 \implies \mathbf{41 \text{ या 42 वोट}}$$(यदि केवल एक सीट पर चुनाव हो रहा हो और सीधा मुकाबला हो, तो जीत के लिए साधारण बहुमत यानी 41 विधायकों का समर्थन अनिवार्य है)
  • बीजेपी (NDA) की चुनौती: बीजेपी के पास अपने 21 विधायक हैं। सहयोगियों (आजसू-1, जदयू-1, लोजपा-1) को मिलाकर एनडीए का कुल आंकड़ा 24 तक पहुंचता है।
  • अतिरिक्त वोटों की जरूरत: जीत के जादुई आंकड़े (41) तक पहुंचने के लिए बीजेपी उम्मीदवार को 17 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी।

3. राजनैतिक परिदृश्य और संभावनाएं (What it Means)

💡 वोटिंग का समीकरण: चूंकि सत्ताधारी महागठबंधन (INDIA Bloc) के पास 56 विधायकों का भारी बहुमत है, इसलिए वे आसानी से इस सीट को अपने पाले में रख सकते हैं। बीजेपी के लिए अपने बूते यह सीट निकालना मुमकिन नहीं है, जब तक कि सत्तापक्ष के खेमे में कोई बड़ी टूट या बड़े पैमाने पर ‘क्रॉस वोटिंग’ (Cross-voting) न हो। यही कारण है कि बीजेपी एक ऐसे कद्दावर या सामाजिक रूप से सर्वमान्य आदिवासी चेहरे की तलाश में है जो विपक्षी खेमे के मतों में सेंध लगा सके।

भले ही बीजेपी आदिवासी कार्ड खेलने की तैयारी में हो, लेकिन राह इतनी आसान नहीं है। वर्तमान में भाजपा के पास राज्यसभा सीट सीधे तौर पर निकालने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं है। पार्टी को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए कम से कम 4 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी।

यही वजह है कि टिकट केवल जाति देखकर नहीं, बल्कि ‘जिताऊ क्षमता’ (Winnablity) देखकर तय होगा। पार्टी आलाकमान ऐसे चेहरे पर दांव लगाना चाहता है जिसकी छवि और व्यक्तिगत संबंध ऐसे हों कि वे विपक्षी खेमे या निर्दलीय विधायकों से अतिरिक्त वोट जुटा सकें।

क्या होगा आलाकमान का अगला कदम?

झारखंड की राजनीति में आदिवासियों को साधना हर दल की मजबूरी और रणनीति दोनों है। बीजेपी के सामने चुनौती सिर्फ एक नाम तय करने की नहीं है, बल्कि एक तीर से कई निशाने साधने की है। अब गेंद पूरी तरह से दिल्ली दरबार (केंद्रीय चुनाव समिति) के पाले में है। देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी किसी विशुद्ध राजनीतिक चेहरे (जैसे अर्जुन मुंडा या आशा लकड़ा) पर भरोसा जताती है या फिर निशा उरांव जैसी पूर्व नौकरशाह को आगे कर कोई नया सामाजिक प्रयोग करती है।

इसे भी पढ़ें: झारखंड राज्यसभा चुनाव: BJP के इस दांव से JMM खेमे में क्यों मचा हड़कंप?

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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