Ranchi | झारखंड में शराब सिंडिकेट और उत्पाद विभाग के गठजोड़ का एक ऐसा चौंकाने वाला खेल सामने आया है जिसने पूरे सरकारी तंत्र को हिलाकर रख दिया है। रामगढ़ में टाटा योद्धा वाहन (निबंधन संख्या BR01 GL-7621) से पकड़ी गई 170 पेटी अवैध शराब (966.60 लीटर विदेशी शराब और 390.00 लीटर अवैध बीयर) के मामले की कड़ियां अब सीधे विभाग के बड़े अधिकारियों की साठगांठ से जुड़ती नजर आ रही हैं। यह शराब रांची के हरमू बाईपास रोड स्थित मुक्तिधाम कंपोजिट शराब दुकान (अनुज्ञप्ति संख्या 080_COM_RNC_25-26) के लिए JSBCL गोदाम (नगड़ी) से परमिट पर निर्गत थी, जिसे रामगढ़ जिले के कोठार ओवरब्रिज के पास संदिग्ध स्थिति में पकड़ा गया।
उत्पाद नियमावली 52 की धज्जियां: लॉटरी से लेकर अवैध निवेश का पूरा क्रोनोलॉजी
ग्राउंड जीरो से मिली खुफिया जानकारी और शराब व्यापारियों के इनपुट्स के अनुसार, राज्य में परदे के पीछे से एक सुनियोजित सिंडिकेट काम कर रहा है। शराब के इस पूरे अवैध कारोबार और सिंडिकेट का खेल बेहद शातिर ढंग से खेला जाता है:
1. घाटे का सौदा और ‘तीसरी पार्टी’ की एंट्री
लॉटरी या ई-लॉटरी के जरिए कोई भी लाइसेंसी शराब दुकान का आवंटन तो ले लेता है, लेकिन 5-6 महीने दुकान संचालित करने के बाद जब उसे भारी घाटा होने लगता है, तो वह सरकार का राजस्व (राजस्व का नुकसान) चुकाने में असमर्थ हो जाता है।
2. अधिकारियों का वरदहस्त और अवैध एग्रीमेंट
इस नाजुक मोड़ पर जिला के अधिकारी और प्राधिकारी मिलकर पर्दे के पीछे से खेल शुरू करते हैं। नियमों को ताक पर रखकर किसी भारी पैसे वाले ‘दूसरे इन्वेस्टर्स या पार्टी’ को बुलाया जाता है। उस पैसे वाले सिंडिकेट से दुकान का गुप्त एग्रीमेंट कराया जाता है और दुकान में मोटी रकम का निवेश करवाकर वहां से अवैध शराब का धंधा धड़ल्ले से शुरू कर दिया जाता है।
3. बकरा बनता है मूल लाइसेंसी
कागजों पर नाम मूल लाइसेंसी (जैसे इस मामले में गुलशन कुमार) का ही रहता है, जबकि वास्तविक संचालन और मलाई कोई और काट रहा होता है। जब भी कोई बड़ी अनियमितता या तस्करी पकड़ी जाती है, तो भारतीय न्याय संहिता और उत्पाद अधिनियम के तहत केस मूल लाइसेंसी पर दर्ज होता है, जबकि पर्दे के पीछे के असली खिलाड़ी (मजा मारने वाले बिचौलिए) साफ बच निकलते हैं।
क्या कहता है कानून?
उत्पाद नियमावली की धारा 52 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि कोई भी आवेदक दुकानों को किसी अन्य व्यक्ति को Sub-lease (सब-लीज) या संचालन के लिए हस्तांतरित नहीं कर सकता। ऐसा पाए जाने पर जमा प्रतिभूति राशि जब्त करने और सभी अनुज्ञाप्तियां विखंडित करने का नियम है। लेकिन चंद पैसों की खोट में इस नियम को पूरी तरह दबा दिया गया है।
रामगढ़ न्यायालय में वाद दर्ज: गिरफ्तार चालकों के बयान से खुले राज
इस पूरे सिंडिकेट का पर्दाफाश तब हुआ जब रामगढ़ के अवर निरीक्षक उत्पाद (प्रहार दल) ने वाहन चालक राहुल कुमार (वल्द शंकर पासवान) और राजा आलम (वल्द अली हुसैन) को गिरफ्तार किया। माननीय न्यायालय मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, व्यवहार न्यायालय रामगढ़ में उत्पाद वाद संख्या Comp. (Excise) 484/2026 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
गिरफ्तार अभियुक्तों ने अपने फर्द बयान में स्वीकार किया है कि वे तो महज मोहरे थे। इस पूरी अवैध खेप को रांची से रामगढ़ लाने की मुख्य साजिश और प्लान के पीछे सुशील झा, विनोद कुमार गुप्ता, और विवे विवेकानंद प्रसाद जैसे सिंडिकेट संचालकों का हाथ था, जिनके कहने पर शराब उतारी और चढ़ाई जानी थी। सहायक आयुक्त उत्पाद रामगढ़ ने अब इस गंभीर मामले में सहायक आयुक्त उत्पाद रांची को पत्र लिखकर अपने स्तर से सशक्त जांच कराने की मांग की है ताकि न्यायालय को रिपोर्ट सौंपी जा सके।
झारखंड शराब व्यापारी संघ के महासचिव सुबोध कुमार जायसवाल समेत आम जनमानस की अब एक ही मांग है कि इस सिंडिकेट की जांच उत्पाद आयुक्त या उपायुक्त (DC) के स्तर से बेहद पारदर्शी और सशक्त तरीके से हो। जब तक बैक-एंड में पैसा लगाने वाले और उन्हें संरक्षण देने वाले जिला अधिकारियों पर सीधी चोट नहीं होगी, तब तक सरकार को राजस्व का नुकसान होता रहेगा और असली अपराधी ‘मजा मारकर’ निकलते रहेंगे।











