सरायकेला में पुलिस की बर्बरता पर हाईकोर्ट सख्त: आखिर फिट कैसे थे तरुण महतो? एसपी और स्वास्थ्य सचिव से मांगा जवाब

सरायकेला में पुलिस की बर्बरता पर हाईकोर्ट सख्त: आखिर फिट कैसे थे तरुण महतो? एसपी और स्वास्थ्य सचिव से मांगा जवाब

Ranchi | झारखंड की कानून व्यवस्था और पुलिसिया कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। JLKM नेता तरुण महतो की पुलिस कस्टडी में हुई ‘बर्बरता’ के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक की खंडपीठ ने सीधे सरायकेला एसपी और राज्य के स्वास्थ्य प्रधान सचिव को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा है कि आखिर जिस व्यक्ति को थाने में ‘थर्ड डिग्री’ दी गई, उसे डॉक्टर ने ‘फिट’ कैसे घोषित कर दिया? कोर्ट की इस सख्ती ने न केवल पुलिस महकमे, बल्कि स्वास्थ्य विभाग में भी हड़कंप मचा दिया है।

क्यों मचा हड़कंप? हाईकोर्ट के दो तीखे सवाल

झारखंड हाईकोर्ट ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दो मुख्य बिंदुओं पर जवाब तलब किया है, जो सीधे तौर पर सिस्टम की जवाबदेही तय करते हैं:

  1. सीसीटीवी का सच: सरायकेला एसपी से पूछा गया है कि जिले के थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने की क्या स्थिति है? सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद थानों में ‘अंधेरे कोने’ क्यों हैं?
  2. डॉक्टर पर कार्रवाई: उस मेडिकल ऑफिसर पर अब तक क्या एक्शन हुआ, जिसने तरुण महतो को पुलिस कस्टडी के लिए ‘फिट’ सर्टिफिकेट दिया था? कोर्ट ने इसे एक गंभीर लापरवाही और मानवाधिकारों का उल्लंघन माना है।

क्या है पूरा मामला? 19 नवंबर की वो काली रात

बता दें कि साल 2024 के चुनाव में झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के ईचागढ़ प्रत्याशी रहे तरुण महतो को 19 नवंबर 2025 की रात पुलिस उठाकर थाने ले गई थी। आरोप है कि ईचागढ़ पुलिस ने हिरासत में उन्हें ‘थर्ड डिग्री टॉर्चर’ दिया। तरुण महतो की पत्नी ने इस बर्बरता के खिलाफ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखा था, जिस पर अदालत ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया।

मुआवजा मिला, पर न्याय का क्या?

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट को सूचित किया कि पीड़ित तरुण महतो को अंतरिम राहत के तौर पर 1.50 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया है। हालांकि, कोर्ट का रुख साफ है कि सिर्फ पैसे से इंसाफ नहीं होता। असली सवाल उस सिस्टम का है जिसने एक नागरिक को हिरासत में लहूलुहान कर दिया।

आम आदमी पर असर: क्या पुलिस का डर खत्म होगा?

यह मामला केवल एक नेता का नहीं है, बल्कि उस आम आदमी का है जो पुलिस स्टेशन जाने से डरता है। अगर किसी रसूखदार नेता के साथ थाने में ऐसा हो सकता है, तो साधारण नागरिक की क्या बिसात? हाईकोर्ट का सीसीटीवी पर सवाल पूछना यह सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम है कि भविष्य में कोई ‘ईचागढ़ कांड’ न हो।

18 जून की तारीख है बेहद अहम

कोर्ट ने एसपी सरायकेला और स्वास्थ्य प्रधान सचिव को 18 जून 2026 तक शपथ पत्र दाखिल करने का समय दिया है। इस दिन यह साफ होगा कि क्या दोषी पुलिसकर्मियों और उस डॉक्टर पर गाज गिरेगी जिसने गलत मेडिकल रिपोर्ट दी थी।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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