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सेवा नियमों की धज्जियाँ उड़ाता झारखंड स्वास्थ्य विभाग, जनता भुगत रही है कीमत: राफिया नाज़

Ranchi | झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सियासी बहस और संवैधानिक सवालों के केंद्र में है। प्रदेश प्रवक्ता राफिया नाज़ ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफ़ान अंसारी के हालिया बयानों को संविधान, सेवा नियमों और कानून की मूल भावना के विरुद्ध बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज की है। आरोप है कि बयानों और दावों से जनता भ्रमित हो रही है और व्यवस्था की असल नाकामियाँ छिप रही हैं।

राफिया नाज़ ने कहा कि स्वास्थ्य मंत्री द्वारा सार्वजनिक मंचों पर नौकरी दिलाने, मनचाही पोस्टिंग कराने और वेतन से जुड़े दावे करना संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन है। संविधान के अनुसार मंत्री पद की शपथ लेने के बाद कोई भी मंत्री सीधे नियुक्ति या पोस्टिंग का अधिकार नहीं रखता।
उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे बयान न केवल सेवा नियमों को कमजोर करते हैं, बल्कि जनता के भरोसे को भी चोट पहुँचाते हैं।

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कानून और सेवा नियमों का सवाल

प्रदेश प्रवक्ता के अनुसार, यदि कोई जनप्रतिनिधि पद का दुरुपयोग करता है, तो उस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 13(1)(a) और 13(2) लागू हो सकती है।
इन धाराओं के तहत पद के दुरुपयोग की स्थिति में चार से दस वर्ष तक की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है, जो मंत्री, विधायक और अधिकारियों पर समान रूप से लागू होता है।

नौकरी और मुआवज़े पर उठे तीखे सवाल

राफिया नाज़ ने सवाल उठाया कि यदि नौकरी देने का इतना प्रभावशाली तंत्र उपलब्ध है, तो सड़क दुर्घटनाओं और चिकित्सीय लापरवाही में जान गंवाने वाले बच्चों के परिजनों को नौकरी क्यों नहीं दी गई।
उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री द्वारा वेतन से मुआवज़ा देने के दावे पर भी पारदर्शिता की मांग की और कहा कि यदि मुआवज़ा दिया गया है, तो उसका सार्वजनिक विवरण सामने आना चाहिए।

संवेदनशील मामलों में चुप्पी पर सवाल

रूबिका पहाड़िया की निर्मम हत्या का उल्लेख करते हुए राफिया नाज़ ने कहा कि इस मामले में मंत्री की चुप्पी बेहद चिंताजनक है।
उन्होंने पूछा कि पीड़ित परिवार को कितना मुआवज़ा मिला और इस पर सरकार की आधिकारिक स्थिति क्या है, इसकी जानकारी जनता के सामने क्यों नहीं रखी गई।

ज़मीनी हकीकत बनाम बयानबाज़ी

राफिया नाज़ ने आरोप लगाया कि मंत्री रील और बयानबाज़ी में व्यस्त हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि राज्य के कई हिस्सों में एंबुलेंस जैसी बुनियादी सुविधा तक समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती।
चाईबासा में चार माह की बच्ची की मौत का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उम्र पर बहस करना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चा किसी भी उम्र का हो, समय पर इलाज मिलना उसका अधिकार है।

ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की भयावह स्थिति

प्रदेश प्रवक्ता के अनुसार, झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में हालात बेहद खराब हैं।
गुमला, सिमडेगा, चाईबासा, रांची सहित कई जिलों में एंबुलेंस की कमी से मौतें हो रही हैं। कई मामलों में गर्भवती महिलाओं को कंधे पर उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ रहा है।
कुछ जगहों पर ऑपरेशन थिएटर में टॉर्च की रोशनी में सर्जरी और समय पर चिकित्सा सहायता न मिलने से जान जाने की घटनाएँ सामने आई हैं।

जेलों और विशेष रोगियों की स्थिति

राफिया नाज़ ने कहा कि जेलों में बंद महिला कैदियों के लिए नर्स तक उपलब्ध नहीं है।
थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को HIV पॉज़िटिव रक्त चढ़ाए जाने की घटनाओं ने स्वास्थ्य सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही की कमी को दर्शाता है।

अवैध गतिविधियाँ और बजट का उपयोग

उन्होंने अवैध कफ सिरप के ठिकानों पर हुई छापेमारी का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत अवैध गतिविधियाँ बेखौफ चल रही हैं।
बजट पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि लगभग ₹7,427.50 करोड़ के स्वास्थ्य बजट और ₹729 करोड़ के सप्लीमेंट्री बजट के बावजूद ज़मीनी स्तर पर प्रभावी उपयोग बेहद सीमित है।

सामाजिक सौहार्द और दोहरा रवैया

राफिया नाज़ ने आरोप लगाया कि एक ओर मुस्लिम आयुष डॉक्टर को नौकरी देने की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम बेटी के योग करने को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ सामने आती हैं।
उन्होंने इसे सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ बताया।

प्रदेश प्रवक्ता ने मांग की कि स्वास्थ्य विभाग में जवाबदेही तय हो, बयानों के बजाय ज़मीनी सुधार हों और कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई की जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जनता को खोखले वादों नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत है।

झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे ये सवाल केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय हैं। पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन ही जनता का भरोसा बहाल कर सकता है।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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