छिंदवाड़ा। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के दूर-दराज के गांवों में अब एक नई उम्मीद की किरण जगी है। बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की संस्था ‘द लाइव लव लाफ फाउंडेशन’ (LLL) और दिग्गज कंपनी बिसलेरी इंटरनेशनल ने एक बड़ी साझेदारी का ऐलान किया है। अगले तीन सालों तक चलने वाली इस सीएसआर (CSR) पार्टनरशिप का सीधा मकसद ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) की देखभाल को घर-घर तक पहुंचाना है। यह खबर इसलिए खास है क्योंकि अब तक मानसिक स्वास्थ्य को केवल बड़े शहरों का मुद्दा माना जाता था, लेकिन अब छिंदवाड़ा के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में भी इसका इलाज संभव होगा।
सौसर से बिछुआ तक: 1,595 लोगों को मिल चुका है जीवनदान
छिंदवाड़ा के सौसर ब्लॉक में यह मुहिम जनवरी 2023 में महज 60 गांवों से शुरू हुई थी, जो अब बढ़कर 134 गांवों तक फैल चुकी है। आंकड़ों की मानें तो अब तक 1,595 लोग इस प्रोग्राम के जरिए अपनी मानसिक परेशानियों का समाधान पा रहे हैं। इतना ही नहीं, इस साल इस पहल ने बिछुआ ब्लॉक में भी दस्तक दे दी है, जहाँ 42 नए गांवों को जोड़कर 200 से अधिक मरीजों की पहचान की जा चुकी है।
बिसलेरी इंटरनेशनल के सहयोग से अब इस अभियान को इतनी मजबूती मिलेगी कि गांव के लोग भविष्य में इस सिस्टम को खुद चलाने के काबिल बन सकेंगे। यह केवल इलाज नहीं, बल्कि ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने की एक बड़ी कोशिश है।
“ग्रामीण भारत को पहचान की ज़रूरत”: जयंती चौहान और दीपिका पादुकोण का विज़न
इस पार्टनरशिप पर बात करते हुए बिसलेरी इंटरनेशनल की वाइस चेयरपर्सन जयंती चौहान ने एक कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि असली बदलाव तब आता है जब समाज जागरूक हो। ग्रामीण भारत में मानसिक स्वास्थ्य को वह पहचान नहीं मिली है, जिसकी उसे सख्त ज़रूरत है। छिंदवाड़ा का यह मॉडल पूरे देश के लिए एक उदाहरण बनेगा।
वहीं, फाउंडेशन की फाउंडर दीपिका पादुकोण ने अपनी निजी लड़ाई और इस मिशन के जुड़ाव को साझा करते हुए कहा:
“हमारा लक्ष्य देशभर में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती और सुलभ बनाना है। बिसलेरी के साथ आने से हमें एक ऐसा टिकाऊ सिस्टम बनाने में मदद मिलेगी जिसे समाज खुद चला सके।”
कैसे काम करता है यह रूरल मॉडल?
छिंदवाड़ा के गांवों में यह प्रोग्राम केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर काम कर रहा है। ‘द लाइव लव लाफ फाउंडेशन’ का मॉडल चार स्तंभों पर टिका है:
- जागरूकता: अंधविश्वास और ‘पागलपन’ जैसे शब्दों को हटाकर इसे एक बीमारी के रूप में समझाना।
- जल्द पहचान: गांव के ट्रेंड वॉलंटियर्स घर-घर जाकर लक्षणों की पहचान करते हैं।
- सस्ता इलाज: जिला स्वास्थ्य तंत्र के साथ मिलकर इलाज को मरीजों की पहुंच में लाना।
- समाज की भागीदारी: केयरगिवर ग्रुप्स बनाना ताकि परिवार एक-दूसरे का सहारा बन सकें।
क्यों अहम है छिंदवाड़ा का यह प्रयोग?
भारत के ग्रामीण इलाकों में मानसिक रोगों को अक्सर झाड़-फूंक या सामाजिक कलंक से जोड़कर देखा जाता है। दीपिका पादुकोण का फाउंडेशन फिलहाल कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सक्रिय है, लेकिन मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में बिसलेरी के साथ यह गठबंधन एक ‘गेम-चेंजर’ साबित हो सकता है। यहाँ का मॉडल ‘सस्टेनेबिलिटी’ पर आधारित है—यानी एक समय ऐसा आएगा जब संस्था वहां से हट जाएगी और गांव के लोग खुद अपना क्लिनिक और सपोर्ट ग्रुप चलाएंगे।
निष्कर्ष: क्या छिंदवाड़ा बनेगा देश का रोल मॉडल?
प्रशासन और सिस्टम के लिए यह खबर एक संकेत है कि कॉर्पोरेट और सोशल फाउंडेशन मिलकर सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की कमियों को भर सकते हैं। अगर छिंदवाड़ा के 176 गांवों में यह मॉडल सफल रहता है, तो वह दिन दूर नहीं जब मध्य प्रदेश के अन्य जिलों और पूरे भारत के गांवों में ‘मेंटल हेल्थ’ पर खुलकर बात होगी। अब सवाल यह है कि क्या अन्य कॉर्पोरेट घराने भी बिसलेरी की तरह ग्रामीण स्वास्थ्य के इस ‘अछूते’ विषय पर निवेश करने का साहस दिखाएंगे?










