Ranchi: धुरवा स्थित प्रभात तारा मैदान में शुक्रवार को आयोजित आदिवासी हुंकार रैली एकता की पुकार से ज्यादा हंगामे के लिए याद की जाएगी। कुर्मी समाज को एसटी सूची में शामिल करने के विरोध में बुलाई गई यह रैली आदिवासी अस्मिता की आवाज बनने वाली थी, लेकिन मंच पर हुआ विवाद इस उद्देश्य को पीछे छोड़ गया।
कुर्सी को लेकर मचा बवाल, मंच पर बढ़ा तनाव
रैली के दौरान उस वक्त माहौल बिगड़ गया जब आदिवासी नेत्री निशा भगत ने मंच पर पहुंचकर एक कुर्सी मांगी। सामान्य सी यह मांग राजनीतिक तनाव में बदल गई। मंच पर बैठे नेताओं ने उनके आग्रह को राजनीति की चाल समझ लिया। बात बढ़ी, आवाजें ऊंची हुईं और फिर निशा भगत और फूलचंद तिर्की को मंच से धक्का देकर नीचे उतार दिया गया।
इस घटना ने आदिवासी समाज की एकता पर गहरी चोट की। भीड़ में अफरातफरी मच गई और कुछ नेताओं ने स्थिति संभालने की कोशिश की, मगर तब तक आदिवासी एकजुटता की तस्वीर में दरारें पड़ चुकी थीं।
निशा भगत का आरोप: “धर्म और राजनीति का मिक्सचर चल रहा था”
मंच से उतारे जाने के बाद निशा भगत ने आरोप लगाया कि कुछ धर्मांतरित ईसाई समूह आदिवासी मंच का इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह रैली समाज की अस्मिता के लिए थी, लेकिन इसे धर्म और राजनीति के मिश्रण में बदल दिया गया।
निशा भगत ने कहा, “मैं पहले भी ईसाई समुदाय के नेताओं के खिलाफ बोलने पर धमकी झेल चुकी हूं। आज फिर वही हुआ। मंच पर आदिवासी बेटी को नीचे उतारना इस बात का प्रमाण है कि समाज में अब भी धर्म के नाम पर बंटवारा किया जा रहा है।”
‘कुर्सी’ बनी प्रतीकात्मक जंग
इस पूरे विवाद ने यह भी दिखाया कि आदिवासी राजनीति अब मुद्दों से ज्यादा कुर्सियों की लड़ाई में बदल रही है। रैली का मकसद था कुर्मी समाज को एसटी सूची में शामिल करने के विरोध को मज़बूत करना, लेकिन बहस इस बात पर अटक गई कि मंच पर कौन बैठेगा।
झारखंड की राजनीति में आदिवासी पहचान हमेशा एक केंद्रीय मुद्दा रही है। कुर्मी समाज को एसटी दर्जा मिलने से आदिवासी राजनीति का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है — और यही डर शायद इस रैली में उभरा।
सोशल मीडिया पर बहस, एकता पर सवाल
रैली के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए। कुछ लोगों ने इसे आदिवासी समाज में “फूट डालने की साजिश” बताया, तो कुछ ने महिला नेत्री के साथ हुए व्यवहार को “शर्मनाक” कहा।
अब सवाल यह उठ रहा है कि जब आदिवासी एकता की रैली में ही नेता आपस में भिड़ जाएं, तो समाज में एकता की उम्मीद कैसे की जाए?
एकता की रैली या राजनीति का मंच?
धुरवा की आदिवासी हुंकार रैली एक मिसाल बन सकती थी—आदिवासी अधिकारों की मज़बूत आवाज़ के रूप में। लेकिन “कुर्सी” के विवाद ने इसे हंगामे की कहानी बना दिया।
रांची की हवा में आज भी “हुंकार” और “हंगामा” दोनों गूंज रहे हैं। अब देखना यह होगा कि यह विवाद झारखंड की आदिवासी राजनीति को नया चेहरा देगा या फिर बस एक और भूली-बिसरी रैली बनकर रह जाएगा।










