रांची। मांदर की थाप, ढोल-नगाड़ों की गूंज और सोहराय के गीतों के बीच बुधवार, 4 नवंबर को रांची में डहरे सोहराय की सांस्कृतिक यात्रा निकली। बृहद झारखंड कला संस्कृति मंच की विज्ञप्ति के अनुसार, मोरहाबादी मैदान से अल्बर्ट एक्का चौक तक निकली यात्रा में झारखंड के अलग-अलग इलाकों से विभिन्न जातियों, धर्मों और समुदायों के लोग शामिल हुए।
पारंपरिक वेशभूषा में आए प्रतिभागियों ने सोहराय गीतों और लोकनृत्य की प्रस्तुति दी। मंच के मुताबिक, खेती-किसानी, पशुधन और प्रकृति से जुड़े इस पर्व की परंपराओं को शहर के लोगों के बीच लाना और नई पीढ़ी को उनसे जोड़ना आयोजन के उद्देश्यों में शामिल था।

बेबी महतो ने नई पीढ़ी तक परंपराएं पहुंचाने पर जोर दिया
बेबी महतो ने कहा कि लोग चाहे किसी भी समुदाय से हों और पढ़ाई में कितने भी आगे बढ़ें, उन्हें अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूर्वजों से मिली परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आज की पीढ़ी की है। उन्होंने संस्कृति को अपनी पहचान का आधार बताया।
कुड़माली भाषा और कुड़मी समाज की मांगें भी उठीं
आयोजन समिति के पप्पू महतो ने अपने संबोधन में कुड़मी समाज की आदिवासी पहचान की बात उठाई। बोकारो के झुमरा पहाड़ से आए पूर्व मुखिया आनंद सागर ने कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने और कुड़मी समाज को जनजातीय सूची में शामिल करने की मांग रखी। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से इन मांगों को केंद्र के पास भेजने का आग्रह किया।
मंच की विज्ञप्ति के अनुसार, आयोजन में समिति के ऋषि महतो, पप्पू महतो, राजकिशोर महतो, डोला महतो, रक्छित महतो, बंशीधर पटेल, सुजीत महतो, राज किशोर चौधरी, किरण देवी, मुकेश महतो, रत्नालाल महतो और सत्येंद्र महतो की मुख्य भूमिका रही।
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