एलीट क्लास की राजनीति बनाम मेहनतकश मजदूर-किसान कुड़मी/कुरमी समुदाय की बुनियादी लड़ाई

20 सितंबर 2026 को पुरुलिया जिले के कोड़ाडीह मैदान में कुड़मी/कुरमी समाज द्वारा आयोजित करम महोत्सव सचमुच जनसैलाब में बदल गया। झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के दूर-दराज के गांवों से माताएं-बहनें, बुजुर्ग और युवा सभी अपने खर्च पर पहुंचे थे। इसमें हजारों करम नृत्य दल और कलाकार पारंपरिक ढोल-नगाड़ा-मांदर की गूंज के साथ शामिल हुए। कुड़मी/कुरमी समुदाय के लोग उम्मीद लेकर आए थे कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी इस मंच से कुड़मी/कुरमी जाति को अनुसूचित जनजाति (ST) सूची में शामिल करने की घोषणा करेंगे। लेकिन मंच पर जो नाटकीय राजनीति खेली गई, उसने सभी की खुशी को निराशा में बदल दिया।
अजीत महतो की घोषणा और हास्यास्पद प्रसंग
कुड़मी/कुरमी समाज के नेता एवं मूलखूंटी-मूलमांता अजीत प्रसाद महतो ने विशाल भीड़ के सामने आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को झारखंड का “एकमात्र कुड़मी/कुरमी नेता” घोषित कर दिया। यह घोषणा किसी ने नहीं सोची थी। कुड़मी/कुरमी समाज के लोग इससे आश्चर्यचकित रह गए। झारखंड की जनता पहले ही तय कर चुकी है कि जो लड़ेगा, वही नेता बनेगा। वर्तमान में झारखंड के सवालों पर सबसे मुखर लड़ाई लड़ने वाला चेहरा जयराम कुमार महतो दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा साफ था—चुनावी नेताओं के बहकावे में न आएं। इस मंच पर जमशेदपुर सांसद विद्युत वरण महतो, पुरुलिया सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे, लेकिन उन्हें भी भाषण देने का मौका नहीं मिला। यह मंच धीरे-धीरे भारतीय जनता पार्टी का होकर रह गया और सामाजिक आयोजन राजनीतिक सभा में तब्दील हो गया। यह कोई अचानक हुआ घटनाक्रम नहीं था; यह भाजपा की रणनीति, अजीत महतो की मंत्रणा और दांव-पेंच के गठजोड़ का खेल था।
एलीट क्लास की ठगी वाली राजनीति
कुड़मी/कुरमी समुदाय के अंदर एक संपन्न प्रभुत्वशाली तबका (एलीट क्लास) उभर चुका है। ये लोग मेहनतकश कुड़मी/कुरमी समुदाय के किसान, मजदूर और ग्रामीण युवाओं की बुनियादी व ज्वलंत समस्याओं को दरकिनार कर अपनी राजनीतिक सत्ता और प्रभाव बढ़ाने में लगे हैं। एसटी दर्जा, कुड़माली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करना, जमीन-जंगल के अधिकार, और शिक्षा-रोजगार के अवसर—ये कुड़मी/कुरमी समाज के वास्तविक मुद्दे हैं। लेकिन मंच पर इन विषयों को पीछे छोड़कर कुड़मी/कुरमी समुदाय का “नेता कौन है”, इसे जबरन स्थापित करने की कोशिश की गई।
गौरतलब है कि सुदेश कुमार महतो लंबे समय से कुड़मी/कुरमी समाज के स्थापित चेहरे रहे हैं। आजसू के जरिए उन्होंने राजनीतिक जगह बनाई। लेकिन सवाल यह है कि उनके नेतृत्व में कुड़मी/कुरमी समाज की मूल मांगों पर ठोस प्रगति कितनी हुई? अजीत महतो द्वारा उन्हें “एकमात्र नेता” घोषित करना हास्यास्पद इसलिए है क्योंकि झारखंड की जनता ने बार-बार साबित किया है कि नेता घोषणा से नहीं, संघर्ष से बनते हैं। जयराम कुमार महतो जैसे नए चेहरे ठीक इसीलिए उभर रहे हैं क्योंकि वे मेहनतकश वर्ग और जनमानस की भाषा बोलते हैं।
भाजपा का खेल भी साफ है। पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी सरकार ने आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने और यूसीसी से बाहर रखने जैसी घोषणाएं कीं, लेकिन एसटी दर्जे जैसी उनकी मूल मांग पर उन्होंने चुप्पी साध ली। इस मंच को भाजपाई नेताओं से भरकर सामाजिक आयोजन को राजनीतिक पूंजी में बदल दिया गया।
इससे कुड़मी/कुरमी समुदाय को क्या मिला?
इसका जवाब है—कुछ खास नहीं।
इस कार्यक्रम में करम नृत्य की गूंज और विशाल भीड़ की ताकत तो दिखी, लेकिन असली मुद्दे पर आगे बढ़ने का कोई ठोस रास्ता नहीं मिला। मेहनतकश कुड़मी/कुरमी समाज अभी भी उसी जगह खड़ा है जहाँ सालों से खड़ा था। केंद्र सरकार के जनजातीय मंत्रालय को राज्य सरकारों की रिपोर्ट अभी तक नहीं मिली है। फरवरी 2024 में प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र (पीएमओ आईडी 5768078) पर भी मामला अटका हुआ है।
कुड़मी/कुरमी समुदाय के अंदर उभरे एलीट क्लास की इस राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान कुड़मी/कुरमी समुदाय के मेहनतकश मजदूर-किसान वर्ग को हो रहा है। वे अपनी जेब से खर्च करके ऐसे कार्यक्रमों और आंदोलनों में शामिल होते हैं। गौर करने की बात है कि सामाजिक एकता को राजनीतिक दांव-पेंच में बदल देना कुड़मी/कुरमी समाज के भविष्य के लिए घातक है।
अब फैसला झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा (छोटा नागपुर पठार) के कुड़मी/कुरमी समुदाय के लोगों को करना है। इसमें नेता कौन होगा—यह घोषणा से नहीं, लड़ाई से तय होता है। जो बुनियादी समस्याओं, भाषा, जमीन, रोजगार और समाज की बेहतरी के लिए ईमानदारी से लड़ेगा, वही असली नेता बनेगा। कुड़मी/कुरमी समुदाय को एलीट क्लास की ठगी वाली राजनीति की पहचान करना जरूरी है।
सबसे बेहतर, ईमानदार और निर्विवाद तरीका यह होगा कि कुड़मी/कुरमी समुदाय को विशेष ओबीसी (Special OBC) में शामिल कर अलग से विशेष कोटा आरक्षित किया जाए। यह कदम केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों (झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल) को उठाना चाहिए। इससे आदिवासी समुदाय भी किसी तरह का विरोध नहीं करेगा और एक सर्वमान्य समाधान निकल आएगा।











