झारखंड में पेसा कानून (Panchayats Extension to Scheduled Areas Act) की नियमावली के अधिसूचित होते ही राज्य की राजनीति, प्रशासन और आदिवासी समाज में नई बहस शुरू हो गई है। यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आदिवासी स्वशासन के सदियों पुराने संघर्ष को संवैधानिक मान्यता देने वाला कदम माना जा रहा है। वहीं, इसके कुछ प्रावधानों को लेकर विरोध और आशंकाएं भी सामने आई हैं।
पेसा कानून का ऐतिहासिक संदर्भ
पेसा कानून वर्ष 1996 में संसद से पारित हुआ था, जब देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। इसका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को स्थानीय स्वशासन का अधिकार देना था। देश के अधिकांश आदिवासी बहुल राज्यों में यह कानून पहले ही लागू हो चुका था, लेकिन झारखंड में इसकी राह सबसे लंबी रही।
झारखंड सरकार ने 2023 में इसकी नियमावली का प्रारूप तैयार कराया। लंबे राजनीतिक उतार–चढ़ाव के बाद 23 दिसंबर 2025 को कैबिनेट ने इसे मंजूरी दी और 2 जनवरी 2026 को आधिकारिक रूप से अधिसूचित कर दिया गया। इसके साथ ही राज्य के 13 पूर्ण और 3 आंशिक अनुसूचित जिलों, 136 प्रखंडों, 206 ग्राम पंचायतों और लगभग 16,000 गांवों में पेसा कानून लागू हो गया।
क्या है पेसा कानून की मूल भावना?
पेसा कानून का मूल उद्देश्य यह है कि:
- ग्राम सभा को निर्णय की सर्वोच्च इकाई माना जाए
- धोखाधड़ी से छीनी गई आदिवासी भूमि की वापसी में ग्राम सभा की भूमिका हो
- स्थानीय संसाधनों, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा हो
- विकास योजनाओं की निगरानी और गुणवत्ता जांच में ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित हो
सरल शब्दों में, यह कानून “ठेकेदारी सिस्टम” से “ग्राम सभा सिस्टम” की ओर बदलाव का संकेत देता है।
सरकार का पक्ष: आदिवासी स्वशासन की जीत
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार इस नियमावली को आदिवासी समाज के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है। सरकार का कहना है कि इससे:
- गांवों में सरकारी धन का सीधा प्रवाह होगा
- शहरी केंद्रीकरण पर लगाम लगेगी
- आदिवासी क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ेगी
- निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी मजबूत होगी
सरकार समर्थकों का मानना है कि जिन राज्यों में पेसा पहले से लागू है, वहां आदिवासी समाज की सामाजिक–आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर हुई है।
विरोध की आवाज: क्या यह आदिवासियों के साथ धोखा है?
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और खासतौर पर वरिष्ठ आदिवासी नेता चंपई सोरेन ने इस नियमावली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि:
- नियमावली पेसा एक्ट 1996 की मूल भावना से भटक गई है
- ग्राम सभा के अधिकारों को सीमित किया गया है
- “रूढ़िजन्य परंपरा” और धार्मिक–सांस्कृतिक अधिकारों को कमजोर किया गया है
- सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों (जैसे नियमगिरी मामला) की अनदेखी हुई है
चंपई सोरेन का कहना है कि यह बदलाव आदिवासी अधिकारों को सशक्त करने के बजाय, उन्हें कमजोर कर सकता है।
ग्राम सभा की भूमिका: असली पेंच
पेसा कानून की सबसे बड़ी बहस ग्राम सभा की परिभाषा और अधिकारों को लेकर है। नियमावली के अनुसार:
- गांव का मतदाता ही ग्राम सभा का सदस्य होगा
- विभिन्न आदिवासी समुदायों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलेगा
- विकास कार्यों की निगरानी और गुणवत्ता जांच का अधिकार ग्राम सभा के पास होगा
- बाहरी व्यक्ति की पहचान और गांव में प्रवेश को लेकर ग्राम सभा की भूमिका होगी
समर्थकों का तर्क है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, जबकि आलोचकों को डर है कि इससे सामाजिक टकराव और प्रशासनिक उलझनें बढ़ सकती हैं।
आदिवासी राजनीति में बदलाव के संकेत
पेसा कानून लागू होने के बाद आदिवासी राजनीति में भी नया समीकरण बनता दिख रहा है। लंबे समय से बंटी हुई आदिवासी राजनीति—भाजपा, कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के खेमों में—अब किसी साझा मुद्दे पर एकजुट होने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आदिवासी समाज अब पार्टी लाइन से ऊपर उठकर एक सामूहिक नेतृत्व को स्वीकार करने की ओर बढ़ रहा है, और इस प्रक्रिया में हेमंत सोरेन एक प्रमुख चेहरा बनकर उभर रहे हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और व्यापक परिप्रेक्ष्य
इस पूरे घटनाक्रम को देश के व्यापक आदिवासी विमर्श से जोड़कर देखा जा रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं आदिवासी समुदाय से आती हैं, और उनके कार्यकाल में आदिवासी मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर अधिक चर्चा हो रही है। जानकारों के अनुसार, यह केवल झारखंड नहीं, बल्कि पूरे देश के 11 करोड़ आदिवासियों के भविष्य से जुड़ा मामला है।
बीच का रास्ता या अधूरा समाधान?
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान पेसा नियमावली “बीच का रास्ता” है। इसमें:
- आदिवासी हितों की रक्षा का प्रयास है
- विकास और कॉर्पोरेट निवेश की जरूरतों को भी पूरी तरह नकारा नहीं गया है
यह स्पष्ट है कि आदिवासी समाज अब पीछे लौटने के बजाय आगे बढ़ना चाहता है—तकनीक, शिक्षा और रोजगार के साथ। ऐसे में पेसा कानून को संघर्ष और समझौते के संतुलन के रूप में देखा जा रहा है।
पेसा कानून 2026 झारखंड के लिए सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का संकेत है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि:
- प्रशासनिक इच्छाशक्ति कितनी मजबूत है
- ग्राम सभा को वास्तविक अधिकार और प्रशिक्षण मिलता है या नहीं
- राजनीतिक दल इसे वोट की राजनीति से ऊपर उठकर लागू करते हैं या नहीं
यदि यह नियमावली सही ढंग से जमीन पर उतरी, तो झारखंड आदिवासी स्वशासन का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है। लेकिन यदि यह सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई, तो यह भी एक अधूरा सपना बनकर रह जाएगी।









