Ranchi | झारखंडी सिनेमा (Jollywood) के इतिहास में ऐसा भूचाल पहले कभी नहीं देखा गया। एक तरफ सड़क पर जलते पुतले, तीखे विरोध और बहिष्कार की गूँज है, तो दूसरी तरफ सिनेमाघरों के बाहर ‘हाउसफुल’ के बोर्ड और टिकटों के लिए मची लंबी कतारें। नागपुरी फिल्म ‘सेरेंग’ (Sereng) ने अपनी रिलीज के साथ ही राज्य की राजनीति और संस्कृति के गलियारों में एक ऐसी बहस छेड़ दी है, जिसने आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक को झकझोर कर रख दिया है।
आखिर क्यों भड़की है विवाद की आग?
फिल्म ‘सेरेंग’ को लेकर हो रहे विरोध की जड़ें इतिहास और पहचान से जुड़ी हैं। प्रदर्शनकारी संगठनों का आरोप है कि फिल्म में आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास और उनके संघर्षों को व्यावसायिक फायदे के लिए ‘फिल्मी मसाला’ बनाकर पेश किया गया है। सोशल मीडिया पर विशेष रूप से ‘माघी मुंडा’ और ‘सिराज’ जैसे किरदारों के नाम और उनके चित्रण को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कुछ लोग इसे सांस्कृतिक अस्मिता पर चोट बता रहे हैं, तो कुछ इसे जानबूझकर दिया गया सांप्रदायिक रंग।
जब ‘बहिष्कार’ बन गया सबसे बड़ा ‘प्रमोशन’
डिजिटल मार्केटिंग के दौर में ‘सेरेंग’ ने एक अजीबोगरीब मिसाल पेश की है। अमूमन फिल्म मेकर्स करोड़ों रुपए खर्च कर जो ‘हाइप’ नहीं बना पाते, वह इस फिल्म को विरोधियों ने अनजाने में दे दी है।
- जिज्ञासा का दांव: जो लोग क्षेत्रीय फिल्में नहीं देखते थे, वे भी अब थिएटर पहुँच रहे हैं यह देखने के लिए कि आखिर ‘सेरेंग’ में ऐसा क्या है जिस पर इतना हंगामा बरपा है।
- डिजिटल सुनामी: फेसबुक लाइव, यूट्यूब रोस्ट वीडियो और ट्विटर (X) पर छिड़ी जंग ने फिल्म को झारखंड के हर मोबाइल स्क्रीन तक पहुँचा दिया है। गूगल डिस्कवर में फिल्म का नाम लगातार ट्रेंड कर रहा है।

JD Cinemas से सुजाता तक: हाउसफुल की गूँज
राँची के प्रमुख सिनेमाघरों जैसे JD Cinemas और सुजाता पिक्चर पैलेस में मंजर कुछ और ही है। विरोध के शोर के बीच टिकट खिड़की पर मारामारी मची है। ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि कई सालों बाद किसी नागपुरी फिल्म के लिए दर्शकों में ऐसा उन्माद देखा जा रहा है। फिल्म के निर्माता विवेक नायक और नितेश कच्छप का आत्मविश्वास डगमगाया नहीं है। उनका साफ कहना है— “कंटेंट ही असली किंग है।”

मेकर्स का तर्क: “फिल्म देखने के बाद ही राय बनाएं। हमने झारखंड की माटी और यहाँ की संवेदनाओं को ईमानदारी से पर्दे पर उतारा है। यह फिल्म नाच-गाने से आगे बढ़कर झारखंडी अस्मिता की एक गंभीर कहानी है।”
क्या यह जॉलीवुड (Jollywood) का टर्निंग पॉइंट है?
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘सेरेंग’ ने क्षेत्रीय सिनेमा की ताकत को एक नई पहचान दी है।
- गंभीर विषय: यह फिल्म साबित करती है कि नागपुरी सिनेमा अब केवल खेतों में होने वाले गानों तक सीमित नहीं है।
- आर्थिक मजबूती: विवादों के बावजूद हुई बम्पर कमाई ने निवेशकों को क्षेत्रीय सिनेमा की ओर आकर्षित किया है।
- सांस्कृतिक विमर्श: फिल्म ने एक ऐसी बौद्धिक चर्चा शुरू की है, जिससे भविष्य में ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित फिल्मों के लिए नए मानक तय होंगे।
आगे क्या होगा?
विवाद फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है, लेकिन ‘सेरेंग’ की सफलता ने यह साफ कर दिया है कि झारखंडी दर्शक अब अपनी कहानियों को बड़े पर्दे पर देखने के लिए बेताब हैं। प्रशासन की नजर कानून-व्यवस्था पर है, तो वहीं फिल्म पंडितों का मानना है कि यह ‘बवाल’ फिल्म को झारखंडी सिनेमा की अब तक की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बना सकता है। क्या यह फिल्म विरोधियों का दिल जीत पाएगी या यह विवाद एक लंबी कानूनी और सामाजिक लड़ाई का रूप लेगा? यह आने वाले कुछ दिन तय करेंगे।











