झारखंड शराब आपूर्ति विवाद: बाबूलाल मरांडी के आरोपों से सियासत गरम, ACB जांच पर उठे सवाल

Ranchi। झारखंड में शराब आपूर्ति से जुड़े मामले को लेकर सियासी पारा तेज हो गया है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे बड़े घोटाले की ओर इशारा बताया है। उन्होंने कहा कि बिना टेंडर केवल लिखित आवेदन पर कंपनियों को आपूर्ति की अनुमति देना, पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

मरांडी के आरोपों के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की जांच की दिशा और दायरे को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। विपक्ष का कहना है कि अगर जांच निष्पक्ष नहीं हुई, तो सच्चाई सामने आने से पहले ही दबा दी जाएगी।

बाबूलाल मरांडी ने बयान जारी कर पूछा कि शराब जैसे संवेदनशील और राजस्व से सीधे जुड़े विषय में प्रक्रिया इतनी सरल कैसे हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन अधिकारी विनय चौबे ने अपनी मनमर्जी से चुनिंदा कंपनियों को काम सौंपा, जबकि उत्पाद मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था मौन रही।

उन्होंने यह भी कहा कि जब यह सब हो रहा था, तब किसी स्तर पर आपत्ति दर्ज नहीं की गई और न ही मुख्यमंत्री ने समय रहते मामले का संज्ञान लिया। मरांडी के अनुसार, यह चुप्पी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।

झारखंड में शराब राज्य के प्रमुख राजस्व स्रोतों में से एक है। सरकार की शराब नीति और आपूर्ति प्रणाली पर पहले भी पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इस मामले में आरोप है कि बिना खुली निविदा प्रक्रिया के कंपनियों को लाइसेंस और आपूर्ति की अनुमति दी गई।

सरकार की ओर से इस मुद्दे पर अब तक औपचारिक विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि ACB अपनी प्रक्रिया के तहत जांच कर रही है।

मरांडी ने ACB की जांच पर सीधा सवाल उठाते हुए कहा कि जिन बाल सुलभ उत्पाद आयुक्तों ने ट्रांसफर और दबाव के भय से कथित घोटाले में साथ दिया, उनकी संपत्तियों की जांच क्यों नहीं हो रही है। उन्होंने आशंका जताई कि सीमित या एकपक्षीय कार्रवाई से असली गुनाहगार बच सकते हैं।

उनका कहना है कि यदि सरकार यह सोचती है कि ACB की सीमित कार्रवाई से भ्रष्टाचार पर पर्दा पड़ जाएगा, तो यह उसकी बड़ी भूल होगी। न्यायालय में सच्चाई को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता।

शराब नीति से जुड़े घोटालों का सीधा असर राज्य की साख और राजस्व व्यवस्था पर पड़ता है। जनता के बीच यह संदेश जाता है कि यदि नीति निर्माण और आपूर्ति प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी, तो राजस्व का नुकसान और भ्रष्टाचार दोनों बढ़ेंगे।

झारखंड में पहले से ही आर्थिक चुनौतियां मौजूद हैं। ऐसे में यदि शराब जैसे बड़े राजस्व स्रोत में अनियमितता होती है, तो इसका असर विकास योजनाओं और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है।

मरांडी ने अपने बयान में छत्तीसगढ़ और दिल्ली का उदाहरण देते हुए कहा कि शराब से जुड़े घोटालों ने कई सरकारों की नींव हिला दी है। इन राज्यों में हुई जांच और अदालती कार्यवाहियों ने यह साबित किया कि ऐसे मामलों में अंततः सच्चाई सामने आती है।

उनका तर्क है कि झारखंड में भी यदि निष्पक्ष न्यायिक जांच हुई, तो असली दोषियों का चेहरा बेनकाब होगा, चाहे वे कितने ही प्रभावशाली क्यों न हों।

भाजपा ने स्पष्ट किया है कि वह इस मुद्दे को राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रखेगी। पार्टी का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई न्यायिक स्तर तक ले जाई जाएगी।

आने वाले दिनों में ACB की जांच की प्रगति, सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया और संभवतः न्यायालय की भूमिका इस मामले की दिशा तय करेगी। विपक्ष इस पर लगातार नजर बनाए रखने की बात कर रहा है।

झारखंड शराब आपूर्ति विवाद अब केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है। बाबूलाल मरांडी के आरोपों ने सरकार और जांच एजेंसियों दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब यह आने वाला समय बताएगा कि जांच कितनी निष्पक्ष होती है और क्या राज्य की राजनीति में यह मुद्दा बड़ा मोड़ लाता है।

Subhash Shekhar

एक अनुभवी डिजिटल पत्रकार, कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट और SEO-फोकस्ड न्यूज़ राइटर हैं। वे झारखंड और बिहार से जुड़े राजनीति, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, स्वास्थ्य और करंट अफेयर्स पर तथ्यपरक और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।

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