रांची: झारखंड के शराब बाजार में इस वक्त जबरदस्त हड़कंप मचा हुआ है। एक तरफ जहां भारी-भरकम ‘सेल्स टारगेट’ के बोझ तले दबकर राज्य भर की 84 से ज्यादा शराब दुकानों पर ताला लटक गया है, वहीं दूसरी ओर उत्पाद विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ताजा आंकड़ों और विभाग की गोपनीय बैलेंस शीट ने वह सच उजागर किया है, जिसे अब तक फाइलों में दबाकर रखा गया था। नियम कहते हैं कि एक रुपये का बकाया होने पर भी दुकान नहीं खुलनी चाहिए, लेकिन राजधानी रांची में करोड़ों के ‘नेगेटिव बैलेंस’ के बावजूद दुकानें धड़ल्ले से चल रही हैं। आखिर विभाग की इस ‘खास मेहरबानी’ के पीछे का खेल क्या है?
नियमों की धज्जियां: क्या कागजों तक सीमित रह गई नियमावली 19?
झारखंड उत्पाद विभाग की नियमावली की धारा 19 स्पष्ट रूप से कहती है कि 31 मार्च तक शून्य बकाया (Zero Dues) होने पर ही नए वित्तीय वर्ष के लिए लाइसेंस का नवीनीकरण होगा। इसमें दिसंबर तक का उत्पाद परिवहन कर (ETD) और न्यूनतम प्रत्याभूत कर (MGQ) का पूरा भुगतान अनिवार्य है।
लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट और उपलब्ध दस्तावेजों की मानें तो हकीकत इसके उलट है। रांची की अधिकांश दुकानों की बैलेंस शीट ‘लाल’ (Negative) है। कई दुकानों पर ₹30 लाख से लेकर ₹85 लाख तक का बकाया है। कायदे से इन दुकानों को 1 अप्रैल की सुबह बंद हो जाना चाहिए था, लेकिन विभाग ने आंखें मूंद ली हैं। यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सरकारी राजस्व को सीधे तौर पर चपत लगाने जैसा है।
“व्यापारी बर्बाद हो रहे हैं…”— सुबोध कुमार जायसवाल का बड़ा बयान
झारखंड शराब व्यापारी संघ के महासचिव सुबोध कुमार जायसवाल ने इस संकट पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कहा:
“विभाग ने जो डेली सेल्स टारगेट तय किए हैं, वे जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। जिस दुकान की क्षमता 1.2 लाख रुपये की है, उसे 1.8 लाख का टारगेट दिया जा रहा है। व्यापारी अपनी जेब से पैसे कब तक भरेगा? इसी घाटे और मानसिक दबाव के कारण दुकानदारों ने चाबियां सौंप दी हैं। अगर विभाग ने अपनी हठधर्मी नहीं छोड़ी, तो आने वाले दिनों में बंद दुकानों की संख्या 84 से बढ़कर सैकड़ों में पहुंच जाएगी।”
करोड़ों का खेल: कौन है इस ‘नेगेटिव बैलेंस’ का जिम्मेदार?
डिजिटल न्यूज की पड़ताल में सामने आया है कि रांची के लालपुर, पंडरा और नामकुम जैसे इलाकों की दुकानों का बकाया रिकॉर्ड स्तर पर है। एक दुकान पर ₹85.60 लाख का नेगेटिव बैलेंस दिख रहा है, फिर भी वह दुकान संचालित हो रही है।
- सवाल 1: क्या विभाग ने इन दुकानों से रिकवरी की कोशिश की?
- सवाल 2: क्या चुनिंदा रसूखदार दुकानदारों को नियमों में ढील दी जा रही है?
- सवाल 3: जो 84 दुकानें बंद हुईं, क्या उन पर दबाव ज्यादा था या वे सिस्टम के ‘खास’ नहीं थे?
आगे क्या? सिस्टम का अगला कदम और जनता पर असर
उत्पाद विभाग के अधिकारी अब डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं। विभाग का तर्क है कि जो दुकानें बंद हुई हैं, उनके लाइसेंस रिन्यू नहीं हुए थे और जल्द ही नए आवंटन की प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नए खिलाड़ी इस ‘असंभव टारगेट’ को पूरा कर पाएंगे?
जानकारों का मानना है कि अगर यह गतिरोध नहीं थमा, तो राज्य में अवैध शराब की तस्करी बढ़ सकती है। जब वैध दुकानें बंद होंगी या घाटे में चलेंगी, तो सिंडिकेट सक्रिय होकर सरकारी राजस्व को और ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा। आने वाले कुछ दिन झारखंड के आबकारी राजस्व के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं।











