New Delhi | सरकार ने अचानक एक बड़ा फैसला लेते हुए डीज़ल और एटीएफ (हवाई ईंधन) के एक्सपोर्ट पर ड्यूटी में भारी बढ़ोतरी कर दी है। इस नए आदेश के बाद अब देश से बाहर डीज़ल और जेट फ्यूल भेजना काफी महंगा हो जाएगा।
इस फैसले के तहत डीज़ल के एक्सपोर्ट पर ड्यूटी की दर बढ़ाकर 14 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है। वहीं, हवाई ईंधन यानी एटीएफ (ATF) के एक्सपोर्ट पर अब 12.5 रुपये प्रति लीटर की दर से ड्यूटी वसूली जाएगी।
राहत की बात यह है कि घरेलू इस्तेमाल के लिए मंज़ूर पेट्रोल और डीज़ल पर मौजूदा एक्साइज़ ड्यूटी दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। साथ ही पेट्रोल के एक्सपोर्ट ड्यूटी ढांचे को भी यथावत रखा गया है।
वैश्विक बाजार और घरेलू आपूर्ति का संतुलन
महानगरों के औद्योगिक इलाकों और रिफाइनरी हब से मिल रही जमीनी रिपोर्ट के मुताबिक, इस फैसले से तेल कंपनियों के मुनाफे (ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन) पर सीधा असर पड़ेगा। यूक्रेन संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के बाद से भारतीय रिफाइनिंग कंपनियां विदेशों में ईंधन बेचकर मोटा मुनाफा कमा रही थीं।

“कंपनियां घरेलू बाजार में तेल बेचने के बजाय विदेशों में एक्सपोर्ट करने को प्राथमिकता दे रही थीं, जिससे देश के कई हिस्सों में ईंधन की किल्लत की खबरें आ रही थीं। सरकार का यह कदम डोमेस्टिक मार्केट में सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया एक कड़ा लेकिन जरूरी कदम है।”
क्या आम जनता की जेब पर पड़ेगा असर?
इस फैसले का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह है कि घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीज़ल पर एक्साइज़ ड्यूटी में कोई बदलाव नहीं हुआ है। यानी आम आदमी के लिए पेट्रोल-डीज़ल के दाम स्थिर रहेंगे। सरकार का पूरा ध्यान इस बात पर है कि देश के भीतर ईंधन की कोई कमी न हो और महंगाई काबू में रहे।
एक्सपर्ट एनालिसिस: क्यों लिया गया यह सख्त फैसला?
इस नीतिगत बदलाव के पीछे दो मुख्य वजहें नजर आ रही हैं:
- घरेलू स्टॉक को मजबूत करना: देश के कई राज्यों में पिछले दिनों पेट्रोल पंपों पर ‘नो स्टॉक’ के बोर्ड देखे गए थे। एक्सपोर्ट ड्यूटी बढ़ने से कंपनियां अब बाहर तेल भेजने के बजाय उसे घरेलू पंपों पर सप्लाई करने के लिए मजबूर होंगी।
- विंडफॉल टैक्स की रणनीति: वैश्विक स्तर पर अप्रत्याशित मुनाफा कमा रही कंपनियों पर लगाम कसना और सरकारी राजस्व को बढ़ाना भी इसका एक बड़ा उद्देश्य है।
सिस्टम की तैयारी और अगला कदम: इस फैसले के बाद अब पेट्रोलियम मंत्रालय और राजस्व विभाग कंपनियों के एक्सपोर्ट डेटा पर पैनी नजर रखेंगे। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या तेल कंपनियां अपने रिफाइनिंग आउटपुट को कम करती हैं या घरेलू बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाती हैं। प्रशासन का यह कदम साफ संकेत देता है कि सरकार के लिए ‘नेशन फर्स्ट’ यानी घरेलू उपभोक्ताओं की संतुष्टि सर्वोपरि है।











