रांची: झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी को लेकर सियासत गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने शनिवार को हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलते हुए पूरे मामले की CBI जांच कराने की मांग रखी है।
छात्र आंदोलन पर हुए लाठीचार्ज की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उन्होंने सरकार पर राज्य के युवाओं का भविष्य दांव पर लगाने का गंभीर आरोप लगाया।
सड़क पर उतरे हजारों छात्रों के समर्थन में आते हुए पूर्व सीएम ने स्पष्ट किया कि सिर्फ परीक्षाएं रद्द करना इस समस्या का हल नहीं है, बल्कि धांधली के असल चेहरों को बेनकाब करना जरूरी है।
‘झारखंड गठन के बाद छात्रों का सबसे बड़ा आक्रोश’
प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए चंपई सोरेन ने कहा कि यह कोई सामान्य विरोध नहीं है। राज्य के सुदूर गांवों और टोलों से युवा राजधानी रांची की सड़कों पर उतर आए हैं।
“राज्य गठन के बाद पहली बार छात्र इतनी बड़ी संख्या में एकजुट हुए हैं। जब CID जांच में अनियमितताएं पाई गईं और कार्रवाई हुई, तब सरकार पूरे मामले की निष्पक्ष CBI जांच कराने से पीछे क्यों भाग रही है?”
— चंपई सोरेन, पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा नेता
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने छात्रों की मांगों का स्थायी समाधान निकालने के बजाय आनन-फानन में कैबिनेट बैठक बुलाकर परीक्षाएं रद्द करने का फैसला लिया, जिस पर बाद में अदालत ने रोक लगा दी। सरकार ने युवाओं से तथ्य छुपाए और उन्हें भ्रमित किया।
लाठीचार्ज पर कड़ा ऐतराज: ‘दमनकारी नीति छोड़ें’
विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुए बलप्रयोग को चंपई सोरेन ने लोकतंत्र पर हमला बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं ने भी निहत्थे छात्रों के साथ मारपीट की।
- गैर-राजनीतिक आंदोलन: छात्र किसी राजनीतिक दल का झंडा लेकर नहीं आए थे, यह पूरे युवा वर्ग का साझा संघर्ष है।
- अनुशासन की मिसाल: लाठियां खाने के बावजूद छात्रों ने कानून हाथ में नहीं लिया और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाई।
- संवैधानिक संस्था की साख: JPSC जैसी प्रतिष्ठित संस्था की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों ने राज्य की साख को ठेस पहुंचाई है।
बाहरी नियुक्तियों के दावों पर सवाल
नियुक्ति प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने राजस्थान के भरतपुर से जुड़े दावों का विशेष रूप से उल्लेख किया, जहां से करीब 150 अभ्यर्थियों के चयन की बातें सामने आई थीं।
उन्होंने कहा कि ऐसे हर पहलू की गहन और निष्पक्ष पड़ताल आवश्यक है, ताकि योग्य और मेहनती स्थानीय युवाओं का हक न मारा जाए।
आगे क्या: 15 सितंबर की समयसीमा और सरकार का रुख
सरकार के पास न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखने के लिए 15 सितंबर तक का समय शेष है।
अब पूरी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या राज्य सरकार छात्रों के बढ़ते दबाव और विपक्ष के तीखे हमलों के बीच जांच एजेंसी को लेकर कोई बड़ा फैसला लेगी, या फिर यह गतिरोध आगे और तीव्र आंदोलन का रूप लेगा। युवाओं का रुख स्पष्ट है—उन्हें केवल आश्वासन नहीं, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और जवाबदेही चाहिए।











