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Bhavishyam Review: क्या युवाओं को नशे से बचाने की कोशिश कामयाब हुई?

सोशल मीडिया रील्स की चकाचौंध के पीछे स्कूल-कॉलेज के युवाओं को कैसे ड्रग सिंडिकेट अपना शिकार बना रहे हैं? यूट्यूब चैनल ‘AARVI MUSIC’ पर रिलीज हुई 29 मिनट की शॉर्ट फिल्म ‘भविष्यम’ (Bhavishyam Review) इसी कड़वे सच पर सीधे चोट करती है।

झारखंड और रांची की पृष्ठभूमि पर आधारित यह एक्शन सोशल थ्रिलर केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हर अभिभावक और युवा के लिए आंखें खोलने वाली चेतावनी पेश करती है।

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कम बजट के बावजूद फिल्म उस गंभीर सवाल से टकराती है जिससे आज पूरा समाज जूझ रहा है—क्या हम अपने ‘भविष्य’ को नशे के दलदल से बचा पाएंगे?

पर्दे पर ग्राउंड रियलिटी: रील्स के चक्कर में ड्रग्स के जाल में फंसती पीढ़ी

फिल्म की शुरुआत एक तीखे सामाजिक संदेश के साथ होती है कि कैसे आज की युवा पीढ़ी को समय रहते नशे के चंगुल से बचाना अनिवार्य हो चुका है। कहानी मुख्य रूप से एक ईमानदार और अंडरकवर पुलिस अधिकारी के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका स्पष्ट एजेंडा है—’सिर्फ नशा करने वालों को पकड़ने से कुछ नहीं होगा, असली चोट ड्रग सप्लाई करने वाले बड़े हैंडलर्स की कमर पर करनी होगी।’

कहानी में गोविंद महतो और उसके गुर्गे गुड्डू के जरिए उस खौफनाक नेटवर्क को उजागर किया गया है, जो कोचिंग संस्थानों, कॉलेजों और रील्स बनाने के शौकीन किशोरों को टारगेट करता है।

सिस्टम के भीतर का ‘भेदी’ और पुलिस का आमना-सामना

Bhavishyam review के लिहाज से फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू विभाग के भीतर की गद्दारी है। पुलिस अधिकारी अपने गुप्त इनफॉर्मर नेटवर्क के जरिए माफिया तक पहुंचने की हर मुमकिन कोशिश करता है, लेकिन महकमे में छिपा मुखबिर बार-बार अपराधियों को सुरक्षित निकाल लेता है।

यह ट्रैक सीधे तौर पर उस जमीनी हकीकत को दर्शाता है जहां अक्सर प्रशासनिक स्तर पर मिलीभगत के कारण तस्कर बच निकलते हैं। हालांकि, क्लाइमेक्स में पुलिस और तस्करों के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिलता है, जो दर्शकों को बांधे रखने की पूरी कोशिश करता है।

क्या हैं फिल्म के मजबूत पहलू?

  • सार्थक और स्थानीय पृष्ठभूमि: झारखंड की वास्तविक लोकेशन और स्थानीय भाषा-शैली के साथ यह मुद्दा कागजी न लगकर बिल्कुल जमीनी लगता है।
  • संवादों में दम: पुलिस अधिकारी का यह संवाद सीधा दिल पर वार करता है—“बच्चे और छात्र किसी भी देश की सबसे बड़ी शक्ति और भविष्य होते हैं…” यह लाइन फिल्म के पूरे फलक को भावनात्मक ऊंचाई देती है।
  • संगीत का असर: अंत में बजने वाला थीम सॉन्ग ‘ये है भविष्य’ दर्शकों के जेहन में एक भारी सवाल छोड़कर जाता है।

कहाँ चूक गई रफ्तार? तकनीकी खामियां

एक स्वतंत्र (Indie) फिल्म के लिहाज से जहां नीयत साफ दिखती है, वहीं तकनीकी मोर्चे पर कुछ कमियां साफ झलकती हैं:

  1. धीमा स्क्रीनप्ले: 29 मिनट के रनटाइम में फोन कॉल और पीछा करने के लंबे शॉट्स थ्रिलर के जरूरी सस्पेंस और ग्रिप को बीच-बीच में ढीला कर देते हैं।
  2. एक्शन और एडिटिंग: चेज़ सीक्वेंस और एक्शन कोरियोग्राफी को अधिक चुस्त (crisp) करने की गुंजाइश थी।
  3. साउंड और डबिंग: संवादों के ऑडियो लेवल और बैकग्राउंड म्यूजिक के बीच का संतुलन कहीं-कहीं लड़खड़ाता नजर आता है।

फाइनल वर्डिक्ट : क्या यह फिल्म देखी जानी चाहिए?

सीमित बजट और संसाधनों के बावजूद ‘भविष्यम’ एक साहसिक और जरूरी स्वतंत्र प्रयास है। यह फिल्म कमर्शियल मसाला फिल्मों की तरह भव्य भले न हो, लेकिन इसका सामाजिक उद्देश्य पूरी तरह से साफ और ईमानदार है।

हमारा फैसला: यदि आप सामाजिक सरोकार, क्षेत्रीय सिनेमा और समाज को झकझोरने वाले कंटेंट को बढ़ावा देना चाहते हैं, तो 29 मिनट की यह शॉर्ट फिल्म आपके समय की पूरी हकदार है। इसे देखकर हर परिवार को अपने बच्चों की दिनचर्या और बदलते व्यवहार पर गौर करने की जरूरत महसूस होगी।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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