
झारखंड की पावन माटी, यहाँ की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और मुंडा-संथाल-उरांव-हो-खड़िया जैसे समुदायों की विशिष्ट पहचान आज एक नए संकट के मुहाने पर खड़ी है। नागपुरी फिल्म ‘सेरेंग’ केवल एक सिनेमाई प्रयास नहीं, बल्कि उन संवैधानिक अधिकारों और सांस्कृतिक सुरक्षा घेरों को तोड़ने की एक गहरी साजिश प्रतीत होती है, जो आदिवासियों को उनकी जमीन और पहचान से जोड़े रखते हैं।
प्रेम की आड़ में ‘जनसांख्यिकीय आक्रमण’
यह फिल्म एक मुस्लिम युवक और मुंडा आदिवासी युवती के प्रेम प्रसंग को जिस तरह ‘ग्लैमराइज’ कर पेश कर रही है, वह वर्तमान परिस्थितियों में अत्यंत चिंताजनक है। एक ऐसे समय में जब झारखंड की डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) में तेजी से बदलाव आ रहा है, आदिवासी जमीनों की अवैध लूट मची है और भोली-भाली युवतियों का शोषण चरम पर है, ऐसी फिल्म का निर्माण घाव पर नमक छिड़कने जैसा है।
उल्लेखनीय है कि CNT (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम) और SPT (संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम) जैसे कानून आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। लेकिन आज ये कानून केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं। भू-माफिया, दलाल और बाहरी तत्वों की पैठ ने इन कानूनों की धज्जियां उड़ा दी हैं। 2011 की जनगणना के बाद के आंकड़े गवाह हैं कि किस तरह आदिवासी आबादी का प्रतिशत घट रहा है और घुसपैठियों का दबदबा बढ़ रहा है।
सांस्कृतिक आतंकवाद का नया चेहरा
लेख में ‘प्यार’ के उस खतरनाक जाल का विश्लेषण जरूरी है, जिसमें आदिवासी लड़कियों को फंसाकर न केवल उनकी अस्मिता, बल्कि उनके नाम पर मिलने वाली जमीन और आरक्षण का भी लाभ उठाया जा रहा है। ‘सेरेंग’ (जो कि आदिवासी भावनाओं और सुरों का प्रतीक है) जैसे पवित्र शब्द की आड़ में इस तरह के ‘सिस्टमैटिक गेम’ को बढ़ावा देना सांस्कृतिक आतंकवाद के अलावा और कुछ नहीं है।
जब जमीन हड़पने के लिए ‘शादी’ को हथियार बनाया जा रहा हो, तब फिल्मकारों की ‘क्रिएटिव फ्रीडम’ (रचनात्मक स्वतंत्रता) पर सवाल उठना अनिवार्य है। निर्देशक, निर्माता और कलाकार श्वेता प्रजापति को यह सोचना चाहिए कि पर्दे पर दिखाई जाने वाली यह ‘काल्पनिक’ रूमानी कहानी, वास्तविक जीवन में कितनी आदिवासी बेटियों के भविष्य और अस्तित्व को लील रही है।
अस्तित्व की रक्षा के लिए ‘उलगुलान’ जरूरी
आदिवासी समाज की नींव उसके परिवार, गोत्र और परंपराओं पर टिकी है। बाहरी प्रभाव और आधुनिकता के नाम पर इस ढांचे को योजनाबद्ध तरीके से तोड़ा जा रहा है। जब कोई आदिवासी युवती इस जाल में फंसती है, तो केवल एक व्यक्ति प्रभावित नहीं होता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की पहचान बदल जाती है। ST आरक्षण का दुरुपयोग होता है और धीरे-धीरे पूरा समुदाय हाशिए पर चला जाता है।
हमारा विरोध क्यों?
- वैधता प्रदान करना: यह फिल्म अंतर-जातीय/धार्मिक संबंधों को ‘आदर्श’ बनाकर युवा पीढ़ी को गुमराह कर रही है।
- वास्तविक मुद्दों से भटकाव: फिल्म निर्माता CNT/SPT उल्लंघन, विस्थापन या आदिवासी युवाओं के संघर्ष पर फिल्म क्यों नहीं बनाते?
- चिंताजनक रुझान: सोशल मीडिया पर आ रही प्रतिक्रियाएं स्पष्ट करती हैं कि यह फिल्म समाज में विभाजन और असुरक्षा का भाव पैदा कर रही है।
समय है जागने का
झारखंड सरकार, जो खुद को आदिवासियों की हितैषी कहती है, उसे इस संवेदनशील मुद्दे पर संज्ञान लेना चाहिए। आदिवासी संगठनों, छात्र संघों और बुद्धिजीवियों को एकजुट होकर इस फिल्म का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करना होगा। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक और कानूनी मंचों से लेकर सेंसर बोर्ड (CBFC) तक, हर स्तर पर अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।
यह लड़ाई सिर्फ एक फिल्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस बड़ी साजिश के खिलाफ है जिसमें भूमि माफिया, विस्तारवादी तत्व और वोट बैंक की राजनीति शामिल है। हमें समझना होगा कि ‘जोहार’ केवल एक अभिवादन नहीं, बल्कि संघर्ष का मंत्र है।
‘सेरेंग’ एक चेतावनी है। यदि आज हम चुप रहे, तो कल हमारी जमीन, पहचान और अधिकार—सब कुछ इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा। अपनी बेटियों और अपनी माटी की रक्षा के लिए आदिवासी समाज को अब एक अडिग प्रतिरोध दिखाना ही होगा।
जोहार! जय आदिवासी!










