रांची में पत्रकारों का ‘स्वैग’: पुलिस ने की तारीफ, भारी भीड़ ने मचाया गदर… क्या अब राजधानी में पत्रकारों की ‘तूती’ बोलेगी?

​Ranchi | राजधानी की सड़कों पर जब कलम के सिपाही और वर्दी वाले धुरंधर एक साथ बैठें, तो समझ लीजिए मामला कुछ बड़ा है! रविवार को रांची में भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ (BSPS) के सदस्यता अभियान में कुछ ऐसा ही ‘धमाका’ हुआ। पत्रकारों की भीड़ इतनी कि हाल छोटा पड़ गया और अधिकारियों का उत्साह ऐसा कि लगा जैसे ‘खाकी’ और ‘प्रेस’ के बीच की पुरानी रंजिश अब बीते जमाने की बात हो गई है।

​विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आयोजित इस कार्यक्रम ने साबित कर दिया कि रांची के पत्रकार अब बिखरे हुए नहीं, बल्कि एक ‘सुपर-टीम’ बनने की राह पर हैं।

जब वर्दी वाले बने पत्रकारों के ‘फैन’!

​आमतौर पर पुलिस और पत्रकारों का रिश्ता ‘टॉम एंड जेरी’ जैसा होता है, लेकिन इस बार माहौल बिल्कुल गुलाबी था।

  • एसएसपी राकेश रंजन ने साफ़ कह दिया— “साहब, आपके बिना हमारा काम अधूरा है।”
  • ​वहीं सिटी एसपी, ट्रैफिक एसपी और ग्रामीण एसपी ने भी सुर में सुर मिलाते हुए मान लिया कि खबर की ‘धार’ ही समाज को सही रास्ते पर रखती है।

ग्राउंड रिपोर्ट की बात: रांची पुलिस के इन कप्तानों की मौजूदगी ने यह मैसेज क्लियर कर दिया है कि अगर पत्रकार संगठित हैं, तो प्रशासन को भी झुककर सलाम करना पड़ता है।

नई टीम का ‘पावरफुल’ कमबैक!

​संगठन ने केवल भीड़ नहीं जुटाई, बल्कि अपनी नई ‘फौज’ की घोषणा भी कर दी। धर्मेंद्र गिरी को कप्तानी (प्रदेश अध्यक्ष) मिली है, तो जावेद अख्तर को जिला की जिम्मेदारी। शकिल अख्तर और अंकुश यादव जैसे खिलाड़ियों को भी अहम रोल मिले हैं।

टीम की नई लिस्ट ऐसी है जैसे किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की स्टारकास्ट:

  • प्रदेश अध्यक्ष: धर्मेंद्र गिरी
  • जिला अध्यक्ष: जावेद अख्तर
  • महासचिव: शकिल अख्तर
  • मीडिया प्रभारी: अंकुश यादव

(पूरी फ़ौज तैयार है, बस अब फील्ड में एक्शन देखना बाकी है!)

आम आदमी को क्या मिला?

​आप सोच रहे होंगे कि पत्रकारों की मीटिंग से आपको क्या फायदा? फायदा बड़ा है! जब पत्रकार एकजुट होंगे, तो आपके मोहल्ले की नाली से लेकर राजधानी के बड़े घोटालों तक की आवाज अब और जोर से गूंजेगी। पुलिस और प्रेस के बीच का यह ‘सार्थक संवाद’ आपके लिए बेहतर सुरक्षा और सही खबरों की गारंटी है।

फ़िल्म अभी बाकी है…

​रांची के इस ‘शक्ति प्रदर्शन’ ने दूसरे संगठनों की नींद उड़ा दी है। अब देखना यह है कि यह जो ‘सार्थक संवाद’ का ढोल बजा है, वो फील्ड में कितनी दूर तक सुनाई देता है। क्या अगली बार जब कोई पुलिसवाला किसी रिपोर्टर को रोकेगा, तो यही ‘तालमेल’ याद आएगा?

Sunil Poddar

सुनील पोद्दार | वरिष्ठ पत्रकार 23 वर्षों के दीर्घ अनुभव के साथ, मैंने दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और झारखंड की जमीनी पत्रकारिता को बेहद करीब से देखा और कवर किया है। रांची मेरा गृह नगर है और निष्पक्ष रिपोर्टिंग ही मेरी पहचान है। संपर्क करें: 📧 Email: Sunil7poddar@gmail.com

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