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क्लस्टर प्रणाली से संकट में झारखंडी भाषाएं, छात्रों का फूटा गुस्सा

Ranchi | झारखंड के विश्वविद्यालयों में लागू हो रही क्लस्टर प्रणाली ने सुदूर ग्रामीण इलाकों से आने वाले आदिवासी और मूलवासी छात्रों की चिंता बढ़ा दी है। रांची के नगराटोली स्थित आदिवासी छात्रावास में हुई एक आपात बैठक में छात्रों और भाषा प्रतिनिधियों ने इस व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

छात्रों का साफ कहना है कि अगर कॉलेजों से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं (TRL) हटाई गईं या सीटें कम हुईं, तो गांवों के गरीब बच्चे उच्च शिक्षा से पूरी तरह महरूम हो जाएंगे।

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सुदूर गांवों के बच्चों के लिए बंद हो जाएंगे कॉलेजों के दरवाजे?

आदिवासी छात्रावास नगराटोली के पुस्तकालय में बिरसा उराॅंव की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। इस बैठक में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा सहित दर्शनशास्त्र, मानवशास्त्र, मनोविज्ञान और होम साइंस के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

बैठक में चिंतित बैठे आदिवासी छात्रों और प्रतिनिधियों की तस्वीर
क्लस्टर प्रणाली से संकट में झारखंडी भाषाएं, छात्रों का फूटा गुस्सा 3

बैठक में मौजूद छात्रों ने भावुक और आक्रोशित लहजे में अपनी जमीनी हकीकत बयां की। गांव-देहात से आकर शहर में संघर्ष कर रहे छात्रों का दर्द सीधे तौर पर प्रशासनिक नीतियों की विसंगतियों को उजागर करता है।

छात्रों का साझा बयान: “हम सभी सुदूर जंगल-पहाड़ के गांवों से बेहद मुश्किल हालातों में अपनी मातृभाषा को पढ़कर यहां तक पहुंचे हैं। हमारे छोटे भाई-बहन भी जैसे-तैसे गांवों में पढ़ाई कर रहे हैं। अगर यूनिवर्सिटीज में क्लस्टर प्रणाली थोपी गई और सीटें कम की गईं, तो सुदूरवर्ती गांवों के बच्चे कॉलेजों का दरवाजा तक नहीं देख पाएंगे।”

किसान परिवारों पर दोहरी मार: महंगाई और नीतिगत बदलाव

मैदान से मिल रही रिपोर्ट के मुताबिक, इस विरोध के पीछे एक बड़ी आर्थिक मजबूरी भी है। झारखंड के ग्रामीण इलाकों से आने वाले अधिकांश छात्र किसान परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। उनके लिए शहरों में रहकर महंगी पढ़ाई करना पहले से ही एक चुनौती है।

  • महंगे विषयों से दूरी: छात्रों का कहना है कि वे भारी-भरकम फीस वाले साइंस या तकनीकी विषयों की पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ हैं।
  • शहरी महंगाई का बोझ: रांची जैसे शहरों में रहने, खाने और पढ़ाई का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में कला (Arts) और क्षेत्रीय भाषाएं ही उनके लिए उच्च शिक्षा का एकमात्र सहारा हैं।
  • पहचान पर संकट: क्षेत्रीय भाषाओं को क्लस्टर में डालने से स्थानीय संस्कृति और पहचान के विलोपन का खतरा मंडराने लगा है।
रांची यूनिवर्सिटी या नगराटोली छात्रावास के बाहर प्रदर्शन
क्लस्टर प्रणाली से संकट में झारखंडी भाषाएं, छात्रों का फूटा गुस्सा 4

प्राथमिक स्तर से मातृभाषा लागू करने की मांग

बैठक में न केवल क्लस्टर प्रणाली का विरोध हुआ, बल्कि एक बड़ा नीतिगत सुझाव भी सामने आया। भाषा प्रतिनिधियों और छात्रों ने सुर में सुर मिलाकर राज्य सरकार से मांग की है कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिक विद्यालयों (Primary Schools) के पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। उनका मानना है कि जब बच्चे बचपन से अपनी मातृभाषा पढ़ेंगे, तभी वे अपनी समृद्ध संस्कृति और जड़ों को बचा पाएंगे।

केवल क्षेत्रीय भाषाएं ही नहीं, बल्कि मानवशास्त्र (Anthropology), दर्शनशास्त्र (Philosophy), मनोविज्ञान (Psychology) और गृह विज्ञान (Home Science) के छात्र-छात्राओं ने भी इस बैठक में हिस्सा लिया। इन मानविकी विषयों के प्रतिनिधियों ने भी साफ किया कि क्लस्टर प्रणाली के तहत उनके विषयों को समेटने की साजिश बंद होनी चाहिए।

छात्रों और भाषा विशेषज्ञों के इस तीखे रुख के बाद अब गेंद राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के पाले में है। अगर सरकार ने क्लस्टर प्रणाली के नियमों में ढील नहीं दी या इसे वापस नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में यह शांतिपूर्ण बैठक एक बड़े राज्यव्यापी छात्र आंदोलन का रूप ले सकती है। प्रशासन को जल्द ही छात्र प्रतिनिधियों से वार्ता कर बीच का रास्ता निकालना होगा, ताकि झारखंड के आखिरी छोर पर बैठे छात्र का कॉलेज आने का सपना न टूटे।

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