New Delhi | झारखंड आंदोलन के महानायक और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन (गुरुजी) को आज मरणोपरांत देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से नवाजा जाएगा। राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू यह सम्मान प्रदान करेंगी।
गुरुजी की पत्नी रूपी सोरेन इस ऐतिहासिक पल की साक्षी बनने और उनकी तरफ से यह सर्वोच्च सम्मान ग्रहण करने के लिए दिल्ली पहुंच चुकी हैं। केंद्र सरकार ने इस साल गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर शिबू सोरेन को इस सम्मान से नवाजने की घोषणा की थी, जिसे पूरे झारखंड के गौरव के रूप में देखा जा रहा है।
4 अगस्त 2025 को 81 साल की उम्र में लंबी बीमारी के बाद गुरुजी का निधन हो गया था। यह सम्मान उनके दशकों लंबे संघर्ष, आदिवासी अधिकारों की लड़ाई और अलग झारखंड राज्य के निर्माण में उनकी ऐतिहासिक भूमिका को एक बड़ी राष्ट्रीय पहचान दे रहा है।
महाजनी प्रथा के खिलाफ हुंकार से ‘दिशोम गुरु’ बनने तक का सफर

रांची से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक आज सिर्फ ‘गुरुजी’ के योगदान की चर्चा है। 70 के दशक में जब छोटानागपुर के जंगलों और गांवों में महाजनी प्रथा का आतंक था, तब शिबू सोरेन एक मसीहा बनकर उभरे। उन्होंने न सिर्फ शोषकों के खिलाफ ‘धनकटनी आंदोलन’ चलाया, बल्कि आदिवासी समाज को एकजुट कर उन्हें अपने हक के लिए लड़ना सिखाया।
जमीन से जुड़े एक स्थानीय नेता ने भावुक होते हुए कहा:
“गुरुजी सिर्फ एक नेता नहीं, हमारे अस्तित्व की आवाज थे। रात में जब वे आदिवासियों के लिए रात्रि विद्यालय चलाते थे, तब किसी ने नहीं सोचा था कि जंगलों से शुरू हुआ यह सफर एक दिन राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल तक पहुंचेगा। आज हर झारखंडी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है।”
विधानसभा से उठी थी भारत रत्न की मांग, मिला पद्म भूषण
शिबू सोरेन का कद झारखंड की राजनीति और समाज में कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देने की मांग सालों से हो रही थी। झारखंड विधानसभा ने भी सर्वसम्मति से उन्हें भारत रत्न देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था।
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना कर अलग राज्य आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने वाले गुरुजी कई बार दुमका से लोकसभा सांसद रहे और उन्होंने केंद्रीय कोयला मंत्री व झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में भी प्रदेश की सेवा की।
शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण मिलना केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि झारखंड के उस 30 साल लंबे संघर्ष पर मुहर है जिसे गुरुजी ने अपने खून-पसीने से सींचा था। रांची के अलबर्ट एक्का चौक से लेकर दुमका के सुदूर गांवों तक आज उत्सव का माहौल है।
राज्य सरकार इस पल को यादगार बनाने के लिए आने वाले दिनों में विशेष कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार कर रही है। प्रशासन और राजनीतिक हलकों में अब भी यह चर्चा आम है कि आने वाले समय में गुरुजी के योगदान को स्कूली पाठ्यक्रमों में और व्यापक रूप से शामिल किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी दिशोम गुरु के संघर्षों से प्रेरणा ले सके।
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